नोटबंदी या एक और विफल सर्जिकल स्ट्राइक

राजेंद्र शर्मा : संसद के शीतकालीन सत्र का हंगामाई होना तय है। नरेंद्र मोदी की सरकार के नोटबंदी के फैसले ने वह काम कर दिया है, जो विपक्षी एकता की सारी पुकारें ढाई साल में नहीं कर पाई थीं।...

राजेंद्र शर्मा

संसद के शीतकालीन सत्र का हंगामाई होना तय है। नरेंद्र मोदी की सरकार के नोटबंदी के फैसले ने वह काम कर दिया है, जो विपक्षी एकता की सारी पुकारें ढाई साल में नहीं कर पाई थीं। सरकार के इस फैसले ने लगभग सारे के सारे विपक्ष को ही अपने खिलाफ एकजुट कर दिया है। बेशक, यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा कि विपक्ष की यह एकजुटता संसद में और संसद के गिर्द किंतु उसकी चारदीवारी से बाहर, कहां तक जाती है। फिर भी इतना तय है कि संसद का सत्र शुरू होने से पहले से ही इस मुद्दे पर विपक्ष की जैसी एकता देखने को मिली है, इससे पहले भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ ही देखने को मिली थी। याद रहे कि वह अध्यादेश मोदी राज के ऐसे बहुत ही दुर्लभ कदमों में से सबसे प्रमुख है, जिन्हें वापस लेने के लिए इस राज को मजबूर किया जा सका है। यह भी गौरतलब है कि नोटबंदी के खिलाफ  कायम हुई विपक्षी एकता, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ कायम हुई एकता के मुकाबले कुछ न कुछ और व्यापक ही कही जाएगी। यह संयोग ही नहीं है कि इस मुद्दे पर अगर उत्तर प्रदेश से सपा और बसपा एक मंच पर आ रही हैं, तो बंगाल से तृणमूल कांग्रेस और सीपीआई (एम) एक पाले में खड़ी न•ार आ रही हैं। और आखिरी मामले में ऐसा तृणमूल सुप्रीमो ममता बैनर्जी की पहल पर हुआ है, जो इससे पहले पिछले ढाई साल में, खासतौर पर राज्यसभा में जहां मोदी सरकार बहुमत से काफी दूर बनी रही है, कई मौकों पर सरकार के लिए संकटमोचक की भूमिका अदा करती आई थी।
लेकिन, विपक्ष के इस तरह एक मंच पर आने का अर्थ यह हर्गिज नहीं है कि मोदी सरकार इस मुद्दे पर रक्षात्मक हो गई है।  इसके ठीक विपरीत, नोटबंदी के फैसले से आम जनता को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा होने की सच्चाई को स्वीकार करने के बावजूद, नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का रुख, कम से कम संसद के बाहर तो ‘मुकाबला करने’ का ही बना हुआ है। संसद के स्तर पर इसी के विस्तार के तौर पर, संसद के सत्र की पूर्वसंध्या में हुई सत्ताधारी एनडीए के घटक दलों की बैठक में, शिव सेना तथा शिरोमणि अकाली दल को भी, नोटबंदी पर ‘विपक्षी हमले का डटकर जवाब देने’ की घोषणा में लामबंद किया जा चुका था। याद रहे कि सत्ताधारी गठजोड़ में भाजपा की सहयोगी इन दोनों पार्टियों ने इससे पहले, नोटबंदी के फैसले से आम आदमी पर पड़ रही मार को देखते हुए, इस कदम के औचित्य पर ही सवाल खड़े किए थे। कहने की जरूरत नहीं कि विपक्षी कतारबंदी के जवाब में इस मुद्दे पर सत्ताधारी गठजोड़ की यह एकजुटता, इस मुद्दे पर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लड़ाकू मुद्रा के दबाव से ठोक-पीटकर कायम की गई है। नोटबंदी से हो रही परेशानियों पर बढ़ते जन-असंतोष पर पहले जापान में अनिवासी भारतीयों के सामने अपने संबोधन में और उस यात्रा से लौटने के फौरन बाद पहले गोवा में और फिर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में गाजीपुर में जनसभाओं में अपने संबोधनों में, प्रधानमंत्री ने पहले ही साफ कर दिया था कि वह इसे विपक्ष से राजनीतिक टक्कर एक बड़ा मुद्दा बनाना चाहते हैं।
वास्तव में प्रधानमंत्री के खासतौर पर गोवा और गाजीपुर के भाषणों से न सिर्फ यह साफ हो गया है कि इस कदम के जरिए वह क्या संदेश देना चाहते हैं बल्कि यह भी साफ हो गया है कि इस संदेश के लिए किस तरह की भावना जगाने की कोशिश की जा रही है। यह संयोग ही नहीं है कि  कथित‘काले धन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक’ की व्याख्या में निशाने के तौर पर कालेधन वालों से आगे जाकर, सभी धन वालों को समेट लिया गया है। खुद प्रधानमंत्री  गरीबों की पचास दिन की तकलीफें बनाम पैसेवालों की रातों की नींद उडऩे का द्वंद्व स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। गरीबों से अपनी थोड़ी सी तकलीफ की परवाह न करने के लिए कहा जा रहा है क्योंकि पैसेवालों को बड़ी तकलीफ होने जा रही है! हालांकि, बहुत ही सरल बनाकर कहें तो यह दूसरे की दोनों आंखें फुड़वाने के लिए, अपनी एक फुड़वाने के लिए तैयार होने की अपील है। फिर भी नरेंद्र मोदी ठीक ऐसा कर रहे हैं क्योंकि यह वह जगह है जहां से, कहीं छुटपुट तौर पर नकदी पकड़ी जाने या बंद कर दिए गए नोट फेंके या नष्टï किए जाने को आसानी से, न सिर्फ इस कदम के सही होने की दलील में बदला जा सकता है बल्कि कालेधन के विरोध के नाम पर, खासतौर पर गरीबों के बीच एक तरह का उन्माद जगाया जा सकता है। नरेंद्र मोदी का यह बहुत बड़ा दांव है। इस दांव के जरिए वह कालेधन के मामले में अपनी घोर विफलता को ढांपने की और अपने ढाई साल के धनिकपरस्त आचरण से बनती छवि को बदलने की ही कोशिश नहीं कर रहे हैं, इसके जरिए अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ राजनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक भी करने कोशिश कर रहे हैं।
यह इसके बावजूद है कि नोटबंदी के इस फैसले ने आम आदमी पर और उसमें भी खासतौर पर बैंक-क्रेडिट/ डेबिट कार्ड आदि की सुविधाओं के उपयोग से आम तौर पर दूर, ग्रामीण गरीबों पर, मुसीबतों का जैसा पहाड़ तोड़ा है, वह सब के सामने है। नये नोटों में भुगतान न कर पाने के चलते उपचार के अभाव में कम से कम चार बच्चों का दम तोडऩा या नोट न बदलवा पाने की हताशा में आत्महत्या की दो से अधिक घटनाएं, बेशक इन तकलीफों के अतिवादी सबूत हैं। जानकारों के अनुसार इस नोटबंदी की और बुरी मार, खाद-बीज आदि के लिए नकदी न जुटा पाने के चलते, किसानों के और इसी तरह अन्य छोटे काम-धंधे करने वालों के, उत्पादन तथा उनकी आय पर पड़ेगी। वास्तव में यह साधारण जन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक ही ज्यादा न•ार आती है। दूसरी ओर, इस नोटबंदी का कालेधन पर वास्तव में कोई खास असर पडऩा संदिग्ध है, जबकि आतंकवाद तथा जाली नोटों के चलन पर, फौरी उलट-पुलट के अलावा कोई और असर न पडऩा तय है।
वास्तव में इस कदम से कालेधन पर अंकुश लगने के बढ़े-चढ़े दावे, कालेधन की ही बहुत ही सरलीकृत समझ पर आधारित हैं। भ्रष्टïाचार के संबंध में आम धारणा की ही तरह, कालेधन की आम धारणा भी साधारण कर चोरी आदि और उसके चलते होने वाली अतिरिक्त आय को ही देख पाती है, जिसे नकदी के रूप में और जाहिर है कि ज्यादातर बड़े नोटों के रूप में ही, जमा कर के रखा जाता है। वास्तव में यह कदम ज्यादा से ज्यादा ऐसी नकदी के रूप में रखे जाने वाले कालेधन तक ही पहुंच सकता है और वह भी उन्हीं मामलों में, जहां इससे भी बचने के लिए चोर दरवाजे नहीं निकाल किए जाते हैं, जैसे अपने कर्मचारियों के खातों में पुराने नोटों में धन जमा कराना, दिहाड़ी पर लोगों को अपने लिए पुराने नोट बदलने के लिए लाइन में लगाना, आदि। यह वास्तव में कालेधन का बहुत छोटा सा अंश ही बैठेगा, जबकि काले धन और काली कमाई का मुख्य हिस्सा तो देशी-विदेशी बैंकों तथा देशी-विदेशी खातों के जरिए कारोबार में पैदा हो रहा है और निरंतर बढ़ती काली कमाई पैदा कर रहा है। यह काली कमाई नकदी में कोई जमा कर के नहीं रखता क्योंकि ऐसा करना घाटे का ही सौदा होगा, जबकि इस पैसे को चलन में रखकर उस पर और कमाई की जा सकती है। साफ है कि यह सर्जिकल स्ट्राइक सिर्फ छोटे कालेधन वालों के लिए है। दो हजार का नोट जारी किया जाना इस कदम के लिए दिए जाने वाले तर्कों को ही खारिज करता न•ार आता है। सीमा पर सर्जिकल स्ट्राइक से क्या हासिल हुआ, इसका अब कोई जिक्र नहीं करता है। कारण स्वत: स्पष्टï है। यह सॢजकल स्ट्राइक मोदी सरकार की छप्पन इंच की छाती दिखाने के सिवा और कुछ हासिल नहीं कर पाई है, जबकि सीमा पर स्थायी रूप से तनाव तथा गोलाबारी बढऩे के रूप में देश को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। इस कीमत चुकाने को सिर्फ इसी दलील से सही ठहराया जा सकता है कि पाकिस्तान को इससे भी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही होगी। कालेधन आदि पर अंकुश लगाने का अपना घोषित उद्देश्य हासिल करने में मोदी सरकार की यह दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक भी वैसे ही विफल रहेगी। लेकिन, क्या यह स्ट्राइक राजनीतिक विरोध को ध्वस्त कर, मोदी सरकार को मजबूत करने के अपने लक्ष्य में भी विफल रहेगी, उत्तर प्रदेश आदि के चुनाव जिसका एक हिस्सा भर हैं? इस सवाल का जवाब तो काले धन पर अंकुश लगाने के लिए इस कदम की निरर्थकता को जनता के बीच उजागर करने मेंं विपक्ष की सफलता/ विफलता ही तय करेगी!



 


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