नोटबंदी: बढ़ती दुश्वारियों के बीच फर्ज निभाने से भागती सरकार

शीतला सिंह : नोटबंदी से दुर्निवार होती जा रही आम लोगों की दुश्वारियां उसके महीने भर बाद भी इस सवाल को बड़ा ही कर रही हैं कि अगर उसका उद्देश्य कालेधन को मिटाना और उसका उपयोग करने वालों को चिन्हित करना था, ...

शीतला सिंह

नोटबंदी से दुर्निवार होती जा रही आम लोगों की दुश्वारियां उसके महीने भर बाद भी इस सवाल को बड़ा ही कर रही हैं कि अगर उसका उद्देश्य कालेधन को मिटाना और उसका उपयोग करने वालों को चिन्हित करना था, तो क्या उस दिशा में कुछ भी हो पाया? जो लोग नोटबंदी के महीने भर बाद भी बैंकों/एटीएमों में कतार लगाये खड़े हैं, क्या वे सभी कालेधन के अनुगामी हैं? अगर सरकार की निगाह में ये कतार लगाने वाले ही कालेधन के वास्तविक उत्पादक या प्रयोक्ता हैं तब तो यकीनन, उनकी पहचान का उद्देश्य पूरा हो गया है और अब इन सभी के खिलाफ मुकदमा चलाने से लेकर इनकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की सोची जानी चाहिए। लेकिन आम आदमी की दृष्टि से पहचाना जाये तो ये सभी गरीब, पिछड़े, किसान व मजदूर हैं जो महज हजार- दो हजार या कि कुछ सौ रुपये निकालने की कोशिश में संलग्न होने के बावजूद सरकार की नीतिगत असफलता और बैंकों द्वारा अपने दायित्वों का निर्वहन करने में की जा रही चूक के शिकार हैं। कोई बड़ा आदमी, जिसे कालाधन व्यापारी कहा जा सके, इनकी भीड़ में दिखाई ही नहीं देता। भले ही प्रधानमंत्री दिखावे के लिए कभी अपनी मां को कतार में भेज देते हों और राहुल गांधी जैसे कुछ नेता अवसर का लाभ उठाने के लिए उसमें जा खड़े होते हों, उनकी संख्या नगण्य ही है। इस महीने भर में बैंकों से अपना ही जमा धन पाने के प्रयत्न में जिन 80 से लेकर 100 लोगों तक की जानें गई हैं, कुल मिलाकर वे आम आदमी ही थे। पूछा जाये कि क्या वे किसी राजनीतिक आन्दोलन से प्रेरित थे, तो जवाब नहीं में ही हासिल होता है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन व अस्तित्व की रक्षा के लिए मजबूर होकर जानें दीं। फिर भी उनके प्रति सरकार का दृष्टिकोण ऐसा बेरहमीभरा है कि वह उनके प्रति सहानुभूति के दो शब्द भी नहीं कहना चाहती।
 इस नोटबंदी की ‘सफलता’ इस रूप में भी दिख रही है कि सरकारी नौकरियां करने वाले, यहां तक कि सांसद भी अपनी तनख्वाह बैंक से निकालने में असफल हो गये हैं। संसद के कैंटीन में कैशलेस व्यवस्था शुरू करनी पड़ी है क्योंकि सांसद नकदी भुगतान में असमर्थता जता रहे थे। क्या पता जानबूझ कर या नीयतन! सैकड़ों शादियां इसलिए नहीं हो पाईं कि सरकार द्वारा घोषित मात्रा में धन उसकी सारी शर्तें पूरी करने के बाद भी नहीं मिल पाया। इसके विपरीत अपनी बेटी की 650 करोड़ की शादी करने वाले कर्नाटक के खननमाफिया व भाजपा नेता जनार्दन रेड्डी को अपना कालाधन सफेद करने में कोई असुविधा नहीं हुई। नोटबंदी से विदेशी दूतावास और राजनयिक भी त्रस्त हैं। उनका कहना है कि हम निर्धारित 50 हजार रुपयों की निर्धारित निकासी में एक भोज भी नहीं कर सकते।
 ऐसे में यह सवाल भी अपनी जगह पर है ही कि सरकार दूतावासों तक पर नोटबंदी के नियम लादकर अन्तरराष्ट्रीय मान्यताओं के विपरीत आचरण तो नहीं कर रही? हां, तो क्या इसे उचित की संज्ञा दी जा सकती है? क्यों भाजपा के नेताओं को इस नोटबंदी के फलस्वरूप या पहले भी रुपये की कमी नहीं पड़ी? मान लिया जाये कि उन्हें नोटबंदी की पूर्वसूचना होने का उनके खिलाफ झूठा राजनीतिक प्रचार किया गया था, तो उनमें से कई के पास आयकर विभाग और पुलिस द्वारा करोड़ों के जो नये नोट पकड़े जा रहे हैं, वे आखिर कहां से और कैसे उन तक पहुंचे और सम्बन्धित प्रतिबंधों से वे मुक्त कैसे हो गए? कालेधन की पोषक प्रवृत्तियों को लाभ पहुुंचाने वालों की सूची में जो बैंक आये हैं, उनमें कोई टुटपुजिया सहकारी बैंक नहीं बल्कि सारे के सारे बड़े बैंक ही हैं। अगर 27 बैंक अधिकारियों को कालाधन सफेद करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है तो क्या इससे यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि कालेधन के संयोजक व प्रयोक्ता वही लोग हैं, जिनके पास साधन व अधिकार थे और अभी भी हैं?
इस देश में 85 प्रतिशत मजदूर असंगठित हैं और उन्हें पूरे वर्ष में दो महीने भी काम नहीं मिलता। न उनके पास बैंक खाते हैं। जो लोग उन्हें मेहनत की मजदूरी या मेहनताना देते थे वे खुद ही परेशान हैं, इसलिए उनकी मजदूरी भी चौपट हो गयी है। इन लोगों को नोटबंदी से कहां और किस प्रकार लाभ पहुंचा है, कुछ देखने में नहीं आ रहा। लेकिन जो नुकसान हो रहा है, क्या सरकार उसकी भरपाई करेगी? यदि नहीं तो क्या यह शपथग्रहण के समय उसके द्वारा ली गई शपथ के परिपालन का परिचायक है? विपक्षी दलों की, जो पखवाड़े भर से संसद नहीं चलने दे रहे, यह कहकर आलोचना की जा सकती है कि वे लोकतांत्रिक परम्पराओं का उपहास कर रहे हैं, जिसके फ लस्वरूप संसद अपने उद्देश्यों के अनुरूप कार्य नहीं कर पा रही है। लेकिन यह भी मान लिया जाये कि वे इस अवसर का भरपूर लाभ उठाना चाहते हैं, जिसके फलस्वरूप देश की जनता महीनों से कतारों में खड़ी है, तो आखिर उन्हें यह अवसर किसने दिया है?
 नोटबंदी सरकार का अधिकार है और वह उसका इस्तेमाल कर सकती है। लेकिन बैंकों में विश्वासपूर्वक जमा किया गया अपना धन निकालना क्या जनता का अधिकार नहीं है? इस अधिकार पर पाबंदी लगाना कितना उचित है? इसका फैसला तो न्यायिक विवेचन से ही हो सकता है कि सरकार ने जो मांग के अनुसार भुगतान का नोट जारी किया था, उसके उल्लंघनकर्ता को क्या दण्ड मिलना चाहिए? क्या वह वादा खिलाफी नहीं कर रहा है? प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा के साथ एक दिन बैंक बन्द करने के साथ उन्हें खोलने और एटीएम से धन निकालने की सुविधा देने का वादा किया था। लेकिन नये नोटों को व्यवहार में लाने में ये एटीएम तकनीकी रूप से असफल सिद्ध हुए तो इसका दोष बैंकों में धन जमा करने वालों का है या उन लोगों का जिन्होंने अपनी मनमानी कल्पनाओं के आधार पर नये नोट जारी कर दिये? नोटबंदी में तो नये नोट की व्यवस्था पहले ही कर ली जानी चाहिए थी, ताकि यह जाना जा सके कि उन्हें कौन ले और दे रहा है? साढ़े 14 लाख करोड़ के पुराने नोटों में लगभग 12 लाख करोड़ बैंकों में वापस आ चुके हैं। क्या इस राशि को किसी भी दृष्टि से कालाधन कहा जा सकता है? ये  तो सरकार के रिजर्व बैंक द्वारा विधिक व्यवस्था के तहत जारी किये गये नोट थे। इनके विपरीत कालेधन की खोज हो रही है तो वह किस रूप में और कहां है, क्या उसका पता लग पाया?
इस काम में कौन सी बाधाएं आ सकती थीं और उनसे कैसे निपटा जाना था, यह तय करना सरकार का दायित्व था। अगर इसमें उसे सफलता नहीं मिल पाई, तो उसको अपने गिरेबान में झांकना चाहिए, न कि उन लोगों को दण्ड देना जो माह भर से सडक़ों पर असहाय खड़े होकर अपना जमा धन पाना चाहते हैं और वे एक बार में कितना धन निकाल सकते हैं, सरकार इसमें कमी ही करती जा रही है। उसकी घोषणाओं में परिवर्तन का सिलसिला भी अभी समाप्त नहीं हुआ है।  इस सिलसिले में वह जो घोषणाएं करती है, उनमें से ज्यादातर का पूरा न होना क्या उसकी प्रतिष्ठा का भंजक नहीं है? सरकार और उसका राजनीतिक प्रतिपक्ष इस बाबत एक दूसरे पर दोष लगा सकते हैं लेकिन इन नीतियों के फलस्वरूप जो लोग परेशान होकर अपनी जानें तक गंवा रहे हैं, उन्हें कैसे दोषी ठहराया जा सकता है? अन्यायी के बजाय निर्दोष को दण्ड देना न्याय की दृष्टि से कैसे उचित माना जा सकता है? तिस पर विडम्बना यह कि इन सारी परेशानियों और अपनी असफलताओं के लिए सरकार ने अभी तक एक बार भी खेद तक नहीं प्रकट किया है। उल्टे प्रधानमंत्री अपने दल के नेताओं से कह रहे हैं कि वे नोटबंदी की खूबियों को चुनाव अभियान की तरह जनता में ले जाएं। लेकिन व्यवस्था संचालन का दायित्व तो राज्य का है, जिसकी संचालक सरकार है। तो क्या इन सभी कमियों के लिए उस पर उंगली नहीं उठाई जा सकती?
सरकार का नजरिया कुछ भी हो, जिन्हें जनता कालेधन वालों के रूप में जानती है और जिन्होंने अरबों-खरबों के लाभकारी धन्धे, सोने-चांदी, रत्नों, भू-सम्पत्तियों और विदेशी बैंकों तक में उसका ‘निवेश’ किया है, वे तो नोटबंदी और उसके बाद कालेधन पर तथाकथित अंकुश के कानूनी प्रावधानों  से जरा भी विचलित नहीं हैं। इसलिए इस प्रश्न पर सरकार को राजनीति से हटकर उस जनता के हित को ध्यान में रखना चाहिए, जिसका 46 प्रतिशत हिस्सा अभी भी गरीबी की रेखा के नीचे हंै और 40 प्रतिशत अशिक्षित। उसके उत्थान या उसे कष्ट सेे बचाने में नोटबंदी या कैशलेस व्यवस्था कितनी सहायक है, यह तो सरकार को ही बताना चाहिए। लेकिन क्या भूखों, कमजोरों और बेकारों को काम देने का दायित्व राज्य का नहीं है? इस दिशा में कितनी प्रगति हुई, इस पर विचार या व्यवस्था करना क्या अनुचित है?


 

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