नोटबंदी और काले धन के विरुद्घ युद्घ का प्रहसन

राजेंद्र शर्मा : नोटबंदी के छठे सप्ताह में प्रवेश करने तक सरकार की हड़बड़ी अगर कम होने के बजाय बढ़ ही रही है,...

राजेंद्र शर्मा

नोटबंदी के छठे सप्ताह में प्रवेश करने तक सरकार की हड़बड़ी अगर कम होने के बजाय बढ़ ही रही है, तो यह सिर्फ संयोग ही नहीं है। छठे सप्ताह की शुरूआत रिजर्व बैंक तथा वित्त मंत्रालय द्वारा नोटबंदी के सिलसिले मेंं अपना 59वां आदेश जारी किए जाने के साथ हुई है। इस आदेश के जरिए बैंक खातों में पांच सौ और हजार रुपए के नोट जमा कराने के लिए, एक तरह से पांच हजार रुपए की अधिकतम सीमा तय कर दी गई है। इससे ज्यादा राशि के नोट सिर्फ एक बार जमा कराए जा सकेंगे और वह भी बैंक अधिकारियों को संतुष्टï करने के बाद कि पहले ही ये नोट क्यों जमा नहीं करा दिए गए। वास्तव मेंं इस आदेश के जरिए सरकार, खुद प्रधानमंत्री से लेकर लेकर रिजर्व बैंक के प्रवक्ता तक, सभी स्तरों से बार-बार की गई इस आशय की घोषणाओं से पलट गई है कि बंदीशुदा नोट 30 दिसंबर तक बैंकों में जमा कराए जा सकते हैं और ढाई लाख रुपए तक जमा कराने पर कोई रोक-टोक नहीं होगी। सच तो यह है कि ‘अब तक नोट जमा न कराने’ के कारण की कथित पूछताछ इसलिए और भी अनुचित है कि खुद सरकार में शीर्ष स्तर से लोगों को यह सलाह दी गई थी कि किसी हड़बड़ी की जरूरत नहीं है 30 दिसंबर तक का समय है और अपनी सुविधा से बैंकों में नोट जमा कर सकते हैं।
अगर कड़ी भाषा का उपयोग करें तो इसे सरकार की धोखाधड़ी ही कहा जाएगा कि पहले लोगों को यह सलाह दी गयी कि हड़बड़ी के बजाय आराम से बाद तक पुराने नोट जमा कराएं और अब न सिर्फ उनसे यह पूछा जा रहा है कि अब तक नोट क्यों नहीं जमा कराए बल्कि नोट जमा कराने पर ऐसी पाबंदियां भी लगा दी गई हैं, जो पहले पांच हफ्तों में लागू नहीं रही थीं। वैसे यह नोटबंदी के मामले में, नियमों में फेरबदल से अलग, सरकार की बाकायदा वादाखिलाफी का कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले, नोट बदलने के मामले में भी खुद प्रधानमंत्री द्वारा किया गया वादा तोडक़र, पहले नोटबदली की राशि घटाई गई थी और उसके बाद, घोषित अंतिम तिथि से कई हफ्ते पहले ही नोटबदली पूरी तरह से बंद भी कर दी गई। इस तरह एक ही झटके में देश की मुद्रा तथा बैंकिंग प्रणाली ही नहीं, सरकार और यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री पद की भी विश्वसनीयता पर भारी चोट की गई है। इसके बावजूद, कम से कम नरेंद्र मोदी को इसकी कोई परवाह नहीं है। उल्टे वे नोटबंदी के इस पूरे प्रसंग में अपने ‘नायकत्व’ की ही पुष्टिï देख रहे हैं, जिसके लिए उन्हें शासन की किसी भी संस्था की साख दांव पर लगाने में कोई हिचक नहीं होगी, खुद प्रधानमंत्री पद की साख दांव पर लगाने में भी नहीं।     
जाहिर है कि यह सारी हड़बड़ी सबसे बढक़र प्रधानमंत्री की नायकीय छवि को बचाने के लिए, नोटबंदी को घोषित रूप से विफल होने से बचाने की ही है। छठे सप्ताह की शुरूआत तक इतना तो स्पष्टï हो ही चुका है कि नोटबंदी के प्रहार से नष्टï होने के लिए कोई खास काला धन छनकर अलग नहीं होने जा रहा है और बंदीशुदा नोटों लगभग 90 फीसद हिस्सा, आर्थिक चलन की व्यवस्था में लौट भी चुका था। इस स्थिति में नोटबंदी को पूर्ण विफलता से बचाने के लिए, कैशलेस अर्थव्यवस्था के लक्ष्य का जुमला उछालने के अलावा दो ही रास्ते बचते हैं। पहला, आम लोगों के लिए पुराने नोट जमा कराना मुश्किल से मुश्किल कर दिया जाए ताकि कम से कम कुछ हजार करोड़ रुपए का काला धन नष्टï हुआ दिखाया जा सके। दूसरे, अब तक कोई और उपाय नहीं कर पाए काले धनवालों को सरकार की नई काले धन को फिफ्टी-फिफ्टी के आधार पर सफेद करने की योजना की ओर धकेला जाए ताकि इससे होने वाली प्राप्तियों से जुड़ी कथित गरीब कल्याण योजना के आंकड़ों के जरिए, प्रधानमंत्री की नोटबंदी के ‘गरीब कल्याणकारी’ होने का दावा किया जा सके!
नोटबंदी के प्रधानमंत्री के इस दांव के दूरगामी तानाशाहीपूर्ण निहितार्थ ही नहीं हैं, उतने ही स्पष्टï फौरी राजनीतिक मंतव्य भी हैं। प्रधानमंत्री ने चंद रोज पहले समाप्त हुए संसद के शीतकालीन सत्र मेंं कोई खास काम-काज न होने और नोटबंदी पर बहस भी न हो पाने का भी ठीकरा सीधे-सीधे विपक्ष के ही सिर पर फोड़ दिया। यह तब था जबकि सभी जानते हैं कि संसद के इस सत्र के अंतिम दिनों में और खासतौर पर लोकसभा में, जहां विपक्ष किसी भी नियम के तहत और यहां तक कि नियम के बिना ही नोटबंदी पर बहस कराए जाने की मांग कर रहा था, सत्तापक्ष ने ही संसद की कार्रवाई नहीं चलने दी थी। इस सब के ऊपर से प्रधानमंत्री ने यह झूठा दावा और जोड़ दिया कि उनकी सरकार तो राजनीतिक पार्टियों के चंदे में काले धन पर अंकुश लगाने के जरिए राजनीतिक व्यवस्था को पाक-साफ बनाए जाने के पक्ष मेें है, विपक्षी पार्टियां ही इसमें बाधक बनी हुई हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री ने इसका भी ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी, चुनाव आयोग की इस सिफारिश के पक्ष में है कि राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग को 2000 रुपए से ऊपर के सभी चंदों का विवरण दें, जबकि फिलहाल यह नियम 20,000 रुपए से ऊपर के चंदों पर ही लागू होता है। वास्तव में चुनावी चंदे के संदर्भ में प्रधानमंत्री की अपना कुर्ता औरों से ज्यादा सफेद दिखाने की इस कोशिश का एक फौरी संदर्भ भी है। नोटबंदी के पांचवे सप्ताह में अचानक सरकार की ओर से यह स्पष्टïीकरण आया कि राजनीतिक पार्टियों के चंदे की राशि के तौर पर पुराने बंदशुदा नोटों में पैसा जमा कराने पर कोई सीमा नहीं लगाई गई है। हालांकि यह स्पष्टïीकरण पहले से चली आ रही व्यवस्था में कोई बदलाव न होने का ही ऐलान था, फिर भी चूंकि यह स्पष्टïीकरण नोटबंदी से ऐन पहले भाजपा द्वारा बिहार, ओडिशा तथा अन्य राज्यों में भी बड़ी संख्या में अचल संपत्तियां खरीदे जाने और कोलकाता में व अन्य जगहों पर भी नोटबंदी से ठीक पहले बंदीशुदा नोटों में बड़ी रकमें बैंकों में जमा कराए जाने यानी संक्षेप में भाजपा के एक कालाधन वाली पार्टी के रूप में आचरण किए जाने के आरोपों की पृष्ठïभूमि में आया था, खासतौर पर सोशल मीडिया में इसे राजनीतिक पार्टियों को खुली छूट दिए जाने के रूप में लिया गया, वह भी तब जबकि आम जनता नोटबंदी की भारी तकलीफें झेल रही है। बेशक, बाद में सरकार ने यह ऐलान कर के चीजों को और भी उलझा दिया कि राजनीतिक पार्टियां नोटबंदी के बाद, बंदशुदा नोटों को वैध चंदे के रूप में नहीं ले सकती हैं, फिर भी उक्त स्पष्टïीकरण से नुकसान तो हो चुका था।
 सच्चाई यह है कि भाजपा के नेताओं को नोटबंदी की सुनगुन पहले से लग जाने के आरोप चाहे सच हों या न हों, अचल संपत्तियों और बैंकों में बंदशुदा नोट जमा कराने के उक्त प्रसंगों मेंं सत्ताधारी पार्टी खुद जितने बड़े पैमाने पर नकदी हाथ में रखकर चल रही थी, उससे न सिर्फ ‘कैशलैस अर्थव्यवस्था’ के मोदी सरकार के, नोटबंदी की विफलता को ढांपने के स्वांग का सच सामने आ जाता है बल्कि उसके सामान्यत: काले धन का इस्तेमाल करने का संदेह भी पुख्ता होता है। सच्चाई यह है कि  नरेंद्र मोदी की पार्टी ने चुनाव में खर्च को उस स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां आम तौर पर उसके उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले चुनाव खर्च का, दूसरी पार्टियों के उम्मीदवार दूर-दूर तक मुकाबला नहीं कर सकते हैं। वास्तव में खुद नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान में जिस तरह से पैसा बहाया गया था और नकदी तथा अन्य संसाधनों के रूप में यह पैसा जिन स्रोतों से आया था, उसके बाद प्रधानमंत्री को कम से कम राजनीतिक चंदे व चुनाव में खर्च की शुचिता की बात नहीं करनी चाहिए। जिस मोदी सरकार ने विदेशी चंदा कानून में संशोधन किया है ताकि एक विदेशी कंपनी से लाखों रुपए का चंदा लेने के एक पुराने मामले से भाजपा और कांग्रेस, दोनों की गर्दन छुड़ाई जा सके, क्या उससे राजनीतिक पार्टियों के लिए कार्पोरेट चंदों पर रोक लगाने की उम्मीद की जा सकती है? यही क्यों क्या भाजपा इसके लिए भी तैयार होगी कि चुनाव में कथित रूप से राजनीतिक पार्टियों द्वारा किए जाने वाले खर्चे को, उनके उम्मीदवारों के चुनाव खर्च में जोड़ा जाए? राजनीतिक चंदे तथा चुनाव खर्च के मामले में इन दो मोटे सुधारों के बिना, राजनीतिक चंदे तथा चुनावी खर्च के कानूनों में मामूली हेर-फेर से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। लेकिन, नरेंद्र मोदी को इसकी परवाह ही कहां है? उन्हें तो बस जनता के बीच यह झूठ चलाना है कि वह अकेले काले धन और भ्रष्टïाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं।


 

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