निराश किया ओबामा ने

डॉ. गौरीशंकर राजहंस : अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवाद के नाम पर लडऩे के लिए जो एफ-16 लड़ाकू विमान देने का फैसला किया है वह सरासर शत्रुतापूर्ण रवैया है। हम आज तक यही समझते आ रहे थे कि जॉन एफ कैनेडी के बाद ओबामा ही भारत के सबसे बड़े हितैषी हैं।...

डॉ गौरीशंकर राजहंस

अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवाद के नाम पर लडऩे के लिए जो एफ-16 लड़ाकू विमान देने का फैसला किया है वह सरासर शत्रुतापूर्ण रवैया है। हम आज तक यही समझते आ रहे थे कि जॉन एफ  कैनेडी के बाद ओबामा ही भारत के सबसे बड़े हितैषी हैं। परन्तु ओबामा ने पता नहीं किसकी सलाह पर यह शत्रुतापूर्ण निर्णय ले लिया और अब हमें यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि ओबामा अब हमारे मित्र नहीं रहे। 
जब से 1947 में भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान भारत से अलग हुआ तभी से अंग्रेजों के कहने पर अमेरिका ने पाकिस्तान का साथ दिया और हमें हर तरह से परेशान करने का प्रयास किया। द्वितीय विश्वयुद्व के बाद  शीतयुद्ध शुरु हो गया। एक खेमे का मुखिया अमेरिका और दूसरे का मुखिया सोवियत यूनियन बना। अंग्रेजों ने खासकर लार्ड माउंटबेटन ने भारत को बेवकूफ बनाकर कश्मीर का मामला सुरक्षा परिषद में ले जाने के लिए भारत को बाध्य किया जहां ब्रिटेन और अमेरिका ने मिलकर भारत को तबाह कर दिया। वह तो भारत के तत्कालीन विदेश नीति के जो पोषक थे उन्होंने सोवियत रूस का साथ लिया जिसके कारण सुरक्षा परिषद में अमेरिका हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सका। 
पाकिस्तान के बारे में अमेरिका का शुरु से दोहरा चरित्र रहा है। 50 के दशक में जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति आइजन हावर ने यह घोषणा की कि वह पाकिस्तान को अस्त्र-शस्त्र और धन से मदद कर रहे हैं जिससे वह साम्यवादी चीन का मुकाबला कर सके तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू हतप्रभ रह गये। उन्होंने भारत की संसद में इस रहस्य का उद्घाटन करते हुए कहा कि अमेरिका जो अस्त्र-शस्त्र और धन की मदद पाकिस्तान को कर रहा है वह कभी भी चीन के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होगा। वह पूर्णत: भारत के खिलाफ इस्तेमाल होगा। बाद की घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि उन्होंने जो कुछ कहा था वह सही था और जब-जब पाकिस्तान के साथ भारत का युद्ध हुआ उसमें अमेरिका अस्त्र-शस्त्र का कसकर प्रयोग हुआ। यह अलग बात है भारत के जांबाजों ने पाकिस्तान के दांत खट्टे कर दिये थे। 
1971 में जब बंाग्लादेश युद्ध हुआ तब भारत को नीचा दिखाने के लिए निक्सन ने एटमी बेड़ा बंगाल की खाड़ी तक भेज दिया था। उस समय सोवियत रूस ने यह चेतावनी दी थी कि यदि इस बेड़े से एक भी फायर किया गया तो तृतीय विश्वयुद्ध शुरु हो जाएगा और सोवियत रूस इस ऐटमी बेड़े को मिनटों में ध्वस्त कर देगा। उसके बाद यह बेड़ा पीछे हट गया। भारत के दृढ़ निश्चय ने पाकिस्तान के क्रूर रवैये पर पानी फेर दिया था और लाचार होकर पूर्वी पाकिस्तान जो बाद में बांग्लादेश कहलाया पश्चिमी पाकिस्तान से अलग हो गया। 
पाकिस्तान ने कभी भी भारत को इस बात के लिए माफ  नहीं किया कि भारत ने उसके दो टुकड़े करा दिये और तभी से पाकिस्तान लगातार भारत की सीमा पर आतंकवादी हरकतें करता आ रहा है। 1965 की लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान का बहुत बड़ा भूभाग अपने कब्जे में कर लिया था। भारतीय फौज लाहौर तक पहुंच गई थी। सोवियत संघ के दबाव में आकर तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ताशकन्द में भारत के साथ समझौता करना स्वीकार कर लिया और इस बात पर भी वे तैयार हो गये कि भारत ने इस लड़ाई में जो क्षेत्र जीता था उसे वह वापस कर देगा। दुर्भाग्यवश ताशकंद में ही लाल बहादुर शास्त्री की अकाल मृत्यु हो गई। परन्तु ताशकन्द में जो समझौता हुआ था उसके कारण पाकिस्तान ने यह वायदा किया था कि भविष्य में वह कभी भारत पर चढ़ाई नहीं करेगा और सारी समस्याओं का समाधान मिलजुल कर करेगा। बाद में जब 1971 में पाकिस्तान से दुबारा लड़ाई हुई तो शिमला समझौते के तहत तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भुट्टो ने कहा कि पाकिस्तान भविष्य में भारत के साथ शत्रुतापूर्ण रवैया नहीं अपनायेगा और सभी समस्याओं का समाधान मिल बैठकर करेगा। परन्तु पाकिस्तान लौटकर भुट्टो अपनी बातों से मुकर गये और कहा कि पाकिस्तान 1000 वर्षों तक भारत के साथ लड़ाई करने को तैयार है। उसके बाद की कहानी सर्वविदित है। 
कहने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कई बार इस बात को दोहराया कि आतंकवादी भारत की सीमा में पाकिस्तान से ही घुसते हैं और अब जब हेडली की गवाही अमेरिका में हुई है तो सारी दुनिया को यह पता चल गया है कि आतंकवादियों के पीछे पाकिस्तान की फौज, पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी और सच कहा जाए तो पाकिस्तान की सरकार है। परन्तु यह सब जानते हुए भी बराक ओबामा ने आंखें मूंद लीं। मुम्बई में जो आतंकी हमला हुआ था उसको पाकिस्तान किसी न किसी तरह से ढंकता रहा है और आज तो सारी दुनिया को यह पता चल गया है कि पाकिस्तान की सरकार और उसकी फौज हक्कानी नेटवर्क तालिबान, लश्कर, जैश समेत आतंकी संगठनों को पाल-पोस रहा है। ऐसे में अमेरिका का आश्वासन बिल्कुल खोखला लगता है।
हम यह समझ बैठे थे कि एशिया की राजनीति में चीन का मुकाबला करने में अमेरिका हमारा साथ देगा। परन्तु यह हमारा भ्रम था। सच यह है कि आज की तारीख में भारत को अमेरिका की जितनी जरूरत है उससे ज्यादा जरूरत अमेरिका को भारत की है। समय आ गया है जब हर भारतवासी बदली हुई परिस्थितियों को समझें और पाकिस्तान से होने वाले आतंकवादी हमले का मुकाबला करने के लिए तैयार जो जाएं। भारत को आर्थिक दृष्टिकोण से भी मजबूत बनाना होगा तभी दुनिया भारत को पूछेगी। यह मानकर चलना चाहिए कि अमेरिका की इस हरकत से एशिया की राजनीति बदल गई है। अमेरिका में भारतीय मूल के लाखों लोग हैं। वे अमेरिकी सरकार पर दबाव बना सकते हैं। जनमत के आगे ही अमेरिका वियतनाम से निकलकर भागा था। आशा करनी चाहिए कि पाकिस्तान के मामले में अमेरिका का रवैया बदलवाने में अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग और वहां की जनता पूरा साथ देगी। 
आने वाले दिन भारत के लिए कठिनाईयों से भरे हैं। अब हम अमेरिका की मित्रता पर भरोसा नहीं कर सकते हैं।  
(लेखक पूर्व सांसद एवं राजदूत हैं)


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