नवउदारवाद के युग में आर्थिक समीक्षा

गिरीश मिश्र : वर्ष 2015-16 की आर्थिक समीक्षा संसद में पेेश की गई है और उसकी चर्चा देश और विदेश में हर जगह हो रही है। यह चर्चा तभी सार्थक हो सकती है...

डॉ. गिरीश मिश्र

वर्ष 2015-16 की आर्थिक समीक्षा संसद में पेेश की गई है और उसकी चर्चा देश और विदेश में हर जगह हो रही है। यह चर्चा तभी सार्थक हो सकती है जब हम इस बात को न भूलें कि डॉ. मनमोहन सिंह के वित्त मंत्रित्व काल में देश ने नेहरूवादी सोच को छोड़ कर नवउदारवाद को अपनाया जिसके अंतर्गत बाजार सर्वोपरि बन गया। उसी को देखकर यह तय किया जाने लगा कि क्या, कैसे और किनके लिए उत्पादन हो। पं. जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रीय आंदोलन ने कभी नवउदारवादी सोच को ठुकराया था।
नवउदारवाद को अमेरिकी नेतृत्व ने बढ़ावा दिया और कहा गया कि नवउदारवाद का कोई विकल्प नहीं है क्योंकि सोवियत संघ के विघटन के बाद समाजवाद के दुर्दिन आ गए हैं। यह प्रक्रिया वर्ष 1991 से डॉ. मनमोहन सिंह के प्रथम बजट के साथ आरंभ हुई। डॉ. सिंह ने विक्टोर ह्यूगो को उद्धृत करते हुए कहा था कि जिस विचार का समय आ जाय उसे दुनिया की कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती। इस प्रकार नेहरू और इंदिरा की वैचारिक विरासत को कूड़ेदान में डाल दिया गया और डॉ. सिंह ने नवउदारवाद को उसकी जगह प्रस्थापित किया। इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, अमेरिकी सरकार और विश्व बैंक के प्रयास सफल हो गए।
वर्ष 2015-16 की आर्थिक समीक्षा इंगित करती है कि भारत ने नवउदारवाद के पथ पर कितनी प्रगति की है। कहना न होगा कि भाजपा-नीत सरकार की जो वर्षों से चाहत रही है उसे डॉ. मनमोहन सिहं ने विरासत के तौर पर दिया है। डॉ. सिंह की सरकार रही हो या मोदी की सरकार, उसकी दिलचस्पी कतई इस बात में नहीं है कि भारतीय समाज में व्याप्त असमानता को देखते हुए विकास के फल हर वर्ग तक पहुंचे।
वर्ष 2015-16 की आर्थिक समीक्षा का दावा है कि 'जामÓ शब्द भारत के शब्दकोश में शामिल हुआ है। दूसरे शब्दों में जन, धन, आधार और मोबाइल को लोगों ने अपनाया है। उनका विश्वास है कि प्रौद्योगिकी पर आधारित सामाजिक क्रांति ही गरीबों की जिंदगी बदल देगी। समीक्षा में देश व्यापी सामाजिक-आर्थिक असमानता का कोई जिक्र नहीं मिलता है।
समीक्षा का दावा है कि यद्यपि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक वातावरण डांवाडोल है फिर भी भारत की स्थिति स्थिर है और बाहर से निवेशक उसकी ओर दौड़े आ रहे हैं। उसकी समष्टिगत अर्थव्यवस्था स्थिर है क्योंकि राजकोषीय स्थिरता कायम है पर मुद्रास्फीति की दर काफी कम है। वहां पर आर्थिक संवृद्धि की दर दुनिया में काफी ऊंची है। क्योंकि भारत सरकार सार्वजनिक आधारभूत ढांचे को ठीक ठाक बनाए रखने के लिए कृत संकल्प है। दावा किया गया है कि विश्वव्यापी उतार-चढ़ाव और देश में लगातार दूसरे वर्ष भी पर्याप्त वर्षा न होने के बावजूद उसने अपनी उच्च संवृद्धि दर बना रखी है। मोदी सरकार का दावा है कि इससे भी अधिक कठिन है कि भूमंडलीय आर्थिक वातावरण में वह सफलता के मार्ग पर बढ़ती ही जाएगी।
पिछले वर्ष की आर्थिक समीक्षा में दावा किया गया था कि दो कारकों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी है। पहला कारक था आम चुनाव में मोदी सरकार को भारी बहुमत प्राप्त होना। दूसरा कारक था देश के बाहर का वातावरण अनुकूल होना। जहां तक पहले दावे का प्रश्न है: असलियत यह है कि मोदी को भारतीय मतदाताओं में से मात्र 31 प्रतिशत का समर्थन मिला था। दूसरे शब्दों में, 69 प्रतिशत उनके खिलाफ थे। इस वर्ष की समीक्षा ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीने काफी कठिन हो सकते हैं क्योंकि देश के बाहर का वातावरण अनुकूल नहीं है। भूमंडलीय आर्थिक गतिविधियां काफी कमजोर दिख रही हैं जिस कारण मोदी सरकार को ऊंची आशाएं और अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए। समीक्षा ने चेतावनी दी है कि यदि विश्व अर्थव्यवस्था संकट में चली जाती है तो भारत की आर्थिक संवृद्धि पर काफी बुरा असर पड़ेगा। इसलिए आने वाले वर्षों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रगति को लेकर कोई भी दावा बेधड़क नहीं किया जा सकता। भारत की आंतरिक अर्थव्यवस्था पर बाहरी परिस्थितियों का असर जरूर पड़ेगा।
समीक्षा में भारत और उसके लोगों की समस्याओं की चर्चा उसके लक्ष्यों और उद्देश्यों के संदर्भ में की गई है। उसका मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की उपलब्धियों की चर्चा दो दृष्टियों से  की जा सकती है। भारत को अन्य देशों के साथ रखकर तथा उसकी मध्यमकालीन संभावनाओं के संदर्भ में। दावा किया गया है कि विदेशी निवेश द्रुत गति से भारत में आ रहा है क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था स्थिर होने के साथ ही तेजी से संवृद्धि पथ पर आगे बढ़ रही है। यह अब तक स्पष्ट नहीं किया गया है  कि विदेशी अपनी पूंजी शेयर बाजार में खरीद-बिक्री के लिए ला रहे हैं या उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश कर रहे हैं। यदि वे स्टॉक मार्केट की ओर लपक रहे हैं तो कोई भी उन पर भरोसा नहीं कर सकता क्योंकि यदि अन्यत्र मुनाफादायकता बढ़ती है तो वे तुरंत अपनी पूंजी लेकर वहां चले जाएंगे। यहां यह बतलाना चाहिए कि कितनी विदेशी पूंजी देश की उत्पादक क्षमता बढ़ाने में लग रही है। तभी उसकी दिलचस्पी और प्रतिबद्धता दीर्घकालीन होगी।
समीक्षा ने अपनी अनेक उपलब्धियों को गिनाया है मगर इनमें से किसी का भी जनता की आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ सीधा संबंध नहीं है। उसकी उपलब्धियों में शामिल हैं, केंद्र के स्तर पर भ्रष्टाचार का सार्थक रूप से मुकाबला किया गया है; प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मार्ग प्रशस्त किया गया है; देश में कारोबार करने की लागत कम हुई है; कराधान के क्षेत्र में काफी हद तक अनिश्चितता दूर हुई है; आधारभूत ढांचे को मजबूत करने तथा निजी निवेश की कमी को पूरा करने के लिए कदम उठाए गए हैं; एक बड़ी फसल बीमा कार्यक्रम की शुरुआत होनी है; जन धन योजना के तहत करीब बीस करोड़ लोगों के बैंक खाते खोले जाने हैं; जन धन आधार, मोबाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाना है; बिजली के क्षेत्र में व्यापक सुधार किए जाने हैं; खुले में शौच को रोकने तथा सब्सिडी त्यागने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। कहना न होगा कि बेझिझक मोदी सरकार की उपलब्धियों में हर प्रकार की चीजों को गिनाया जा रहा है।
मोदी सरकार का दावा है कि भारत अब बाजार विरोधी और राज्य परस्त नहीं है। उसे संदेह है कि राज्य के मार्फत ही देश की तरक्की हो सकती है। वह उद्योग परस्त हो गई है। वह प्रतिद्वंद्विता को तरजीह देने लगी है। हमें समीक्षा में कहीं भी यह बात नहीं दिखती कि राज्य जनता परस्त बन गई है और जनता के हितों का ध्यान रख रही है। वह आम लोगों को अधिकाधिक रोजगार उपलब्ध करा रही है। यदि आप ध्यान से देखें तो पाएंगे कि निजी कारोबारियों का मुख्य उद्देश्य अधिकाधिक पैसे कमाना है। मोदी सरकार चाहती है कि राज्य दुबला-पतला और कमजोर हो जिससे वह उद्योगपतियों के बीच प्रतिद्वंद्विता में कोई दखलंदाजी न कर सके। निजी उद्योगपति जब चाहें तब आएं, निवेश करें और वे अपनी मनमर्जी से वापस चले जाएं। समीक्षा में चक्रव्यूह शब्द का इस्तेमाल इस अर्थ में किया गया है कि उद्योगपतियों को बाहर जाने का रास्ता नहीं होता।
जहां तक श्रमिकों का प्रश्न है समीक्षा में उनके विषय में कुछ खास नहीं कहा गया है। उसका जोर ठेके पर मजदूरों को रखने पर है। जब चाहे, तब श्रमिकों को काम पर लगाया और जरूरत न होने पर उनको भगा दिया। समीक्षा का मानना है कि ठेके के मजदूरों को रखने पर ही अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ सकती है। ऐसा होने पर धड़ल्ले से विदेशी पूंजी हमारे यहां आएगी। माना जा रहा है कि अर्थव्यवस्था में अनौपचारिक क्षेत्र का विकास होने पर ही रोजगार का सृजन होगा तथा बेरोजगारी घटेगी। सरकार का इस बात की ओर कोई ध्यान नहीं है कि अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत लोगों की हालत में कैसे सुधार किया जाए।
यदि समीक्षा के आंकड़ों को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार का ध्यान आम लोगों की हालत सुधारने के लिए बिल्कुल नहीं है। सकल घरेलू उत्पाद में शिक्षा के ऊपर व्यय 2008-09 से लेकर 2014-15 तक मात्र तीन प्रतिशत बना हुआ है। उसमें वृद्धि की कोई मंशा नहीं न•ार आ रही। इसी काल के दौरान सकल घरेलू उत्पाद में स्वास्थ्य के ऊपर होने वाले व्यय का हिस्सा दो प्रतिशत से भी कम है। जनसंख्या में वृद्धि के बावजूद सरकार ने इसे बढ़ाने को लेकर कोई सोच-विचार नहीं किया है। वर्ष 2013-14 में सामाजिक सेवाओं पर खर्च होने वाली कुल राशि में शिक्षा और स्वास्थ्य पर कुल व्यय क्रमश: 11.6 और 4.6 प्रतिशत ही था। अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो मोदी के नेतृत्व में गुजरात का भी यही हाल था। वहां एक धनी राज्य होने के बावजूद शिक्षा और स्वास्थ्य की ओर कोई भी ध्यान नहीं दिया गया। मोदी के शासनकाल के दौरान मात्र 6.67 प्रतिशत बजट में आबंटित राशि शिक्षा पर खर्च हुई जब कि उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य में कहीं अधिक खर्च किया गया। भारतीय जनता पार्टी शासित राजस्थान और मध्यप्रदेश में शिक्षा पर बहुत कम खर्च हुआ।
वर्ष 2014 में प्रकाशित शिक्षा वार्षिक स्थिति संबंधी रिपोर्ट में बतलाया गया है कि पांचवी कक्षा के विद्यार्थियों की स्थिति दूसरी कक्षा के विद्यार्थियों जैसी है। वे ठीक से पढ़-लिख नहीं पाते हैं। सारे देश में शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इसका पूरा ब्यौरा आर्थिक समीक्षा खंड-2 के नौंवे अध्याय में दिया गया है। यह रिपोर्ट मोदी सरकार द्वारा ही अभी-अभी प्रकाशित की गई है।
वर्ष 2015 में प्रकाशित ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 188 देशों में भारत 130वें नंबर है। मलेशिया, श्रीलंका, चीन, मिस्र, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका हमसे काफी ऊपर हंै। प्रश्न है कि क्या मोदी सरकार ने कभी इस ओर ध्यान देने की जहमत उठाई है? ऐसा क्यों हो रहा है? क्या केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री ईरानी मैडम ने इस ओर ध्यान दिया है?


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