ध्वस्त हो गयी मोदी की सोशल इंजीनियरिंग

एच.एल. दुसाध प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार डेढ़ सप्ताह पूर्व अपने सत्तारूढ़ होने का सौ दिन का दिन का जश्न मना चुकी है। इस बीच उसने जुलाई, अगस्त और सितम्बर में कुल मिलाकर तीन-तीन उपचुनावों का सामना भी कर लिया है। यूँ तो राजनीति के पंडितों का मानना है कि सामान्यतया राज्यों में काबिज सत्तारूढ़ दलों को ही उपचुनावों में सफलता मिलती है।...

एच.एल. दुसाध
एच.एल. दुसाध

प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार डेढ़ सप्ताह पूर्व अपने सत्तारूढ़ होने का सौ दिन का दिन का जश्न मना चुकी है। इस बीच उसने जुलाई, अगस्त और सितम्बर में कुल मिलाकर तीन-तीन उपचुनावों का सामना भी कर लिया है। यूँ तो राजनीति के पंडितों का मानना है कि सामान्यतया राज्यों में काबिज सत्तारूढ़ दलों  को ही उपचुनावों में सफलता मिलती है। किन्तु मोदी तो सामान्य नहीं, अपनी चुनावी सफलता के जोर से पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे स्वाधीन भारत के असाधारण प्रधानमंत्रियों की कतार में खुद को शामिल करवा चुके थे, लिहाजा आम लोग यह मान बैठे थे कि उपचुनावों में भी महान मोदी का जादू चलेगा और प्रतिपक्षी दलों का बचा खुचा वजूद भी खतरे में पड़ जायेगा। किन्तु इन उपचुनावों ने उनके करिश्मे और असाधारणत्व बड़े सवाल खड़ा कर दिए।
जुलाई से सितम्बर के बीच कुल 53 विधानसभा सीटों पर जो उपचुनाव हुए इनमें ज्यादातर सीटें ही भाजपा के कब्जे में थी, जिनमें महज 19 सीटें ही जीतने में वह सफल हो पाई। इनमें गत लोकसभा चुनाव का परिणाम सामने आने के बाद राजनीति के ढेरों पंडितों ने जिस कांग्रेस के अंत की घोषणा कर दिया था, उसने उत्तराखंड में क्लीन स्वीप के साथ कुल 14 सीटें जीत कर दिखा दिया है कि राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका को शेष मानना मूर्खतापूर्ण बात है। लेकिन उपचुनावों से भविष्य की राजनीति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सन्देश उस यूपी-बिहार से आया है, जो राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में सबसे प्रभावी भूमिका अदा करते हैं। इन दोनों राज्यों में कुल 21 सीटों पर चुनाव हुए जिनमें बिहार में 5 और उप्र में 8 सीटें मंडलवादियों के हिस्से में आईं, जबकि गत लोकसभा चुनाव में यहां की 120 में से 104 सीटें जितने वाली भाजपा को सिर्फ सात सीटों से संतोष करना पड़ा। ऐसे में भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण इलाके से आये चुनाव परिणाम के आधार पर कहा जा सकता है कि मोदी के जिस सोशल इंजीनियरिंग ने भाजपा के ऐतिहासिक जीत में सबसे बड़ा रोल अदा की वह ध्वस्त हो चुकी है।
बहरहाल प्रधानत: सोशल इंजीनियरिंग के सहारे प्रचंड बहुमत से सत्ता में आये मोदी अपनी ताजपोशी के बाद कुछ बुनियादी बातें विस्मृत कर गए। वह भूल गए कि उनकी सुनामी में यूपी-बिहार के माया-मुलायम, लालू-नीतीश जैसे सामाजिक न्याय के दिग्गज जमींदोज हुए तो इसलिए कि भारत के लोकतंत्र को सबकी हिस्सेदारी वाला लोकतंत्र बनाने तथा देश के संपदा-संसाधनों में वंचितों को हिस्सेदारी दिलाने के अभियान से पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव के पहले ही विमुख हो चुके थे। इसकी जगह वे पीएम बनने की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के वशीभूत होकर गरीब सवर्णों को आरक्षण दिलाने में एक-दूसरे से होड़ लगाने लगे थे। मंडलोत्तर काल में जाति चेतना की राजनीति के चलते महाबली बने इन नेताओं की सवर्णपरस्ती सामाजिक न्याय के समर्थकों को रास नहीं आई। अत: उन्होंने 2009 में ही सामाजिक न्याय के स्थापित नायक/नायिकाओं को सबक सीखा दिया। किन्तु सोलहवीं लोकसभा चुनाव में भी वे सवर्णपरस्ती  से बाज नहीं आए। वैसे में जब मोदी ने सामाजिक न्याय के दूसरी पंक्ति के जनाधार वाले नेताओं को जोड़ा, सामाजिक न्याय के समर्थक उन्हें वोटों से लाद दिए। किन्तु अपनी ताजपोशी के बाद मोदी अपने करिश्मे से इतना आत्म-मुग्ध हो गए कि अपने साथ आए उन दलित-पिछड़े नेताओं की पूरी तरह अनदेखी कर दी, जो 21 वीं सदी की बहुजन राजनीति का केंद्र बिंदु बनने की हैसियत रखते हैं।
मोदी सरकार में डॉ. संजय पासवान, आठवले, डॉ.उदित राज, अनुप्रिया पटेल, छेदी पासवान, रामकृपाल यादव, जनक चमार जैसों को योग्य सम्मान न मिलने तथा संपदा-संसाधनों में वंचितों की भागीदारी लायक नीति न बनने के फलस्वरूप दलित-पिछड़ों के मन में फिर यह यकीन पुख्ता हुआ कि भाजपा अपना सवर्णवादी एजेंडे से कभी पीछे नहीं हट सकती तथा मोदी ने खुद को नीची जाति का बताकर उनको छला है। उनको यह भी याद आ गई कि यह वही भाजपा है जिसने मंडल की काट के लिए राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन छेड़ कर राष्ट्र की अपार संपदा और असंख्य लोगों की प्राणहानि के सहारे सत्ता दखल किया एवं सत्ता में आने के बाद उन सरकारी उपक्रमों का बेचने का अंधाधुध  अभियान चलाया, जहां बहुजनों को आरक्षण का लाभ मिलता रहा है। भाजपा के प्रति वंचित जातियों में पनपे इस निराशा को लालूप्रसाद यादव जैसे राजनीति के पुराने घाघ ने ताड़ लिया और बिना देर के बिहार विधानसभा चुनाव के पूर्व मंडल के एक नए दौर का ऐलान करते हुए कह दिया-'मंडल ही कमंडल की काट होगी।Ó सिर्फ नारा ही नहीं उछाला बल्कि उसको जमीनी स्तर पर उतारने के लिए निजी क्षेत्र सहित सरकारी ठेकों में दलित-आदिवासी, पिछड़ों और अकलियतों के लिए 60 प्रतिशत आरक्षण की मांग भी उठा दिया। लालू की इस मांग ने देश भर के सामाजिक न्याय समर्थकों को स्पर्श किया। ऐसे में जब वह नीतीश कुमार के साथ गठबंधन बनाकर बिहार विधानसभा उपचुनाव में उतरे, 25 अगस्त को उसका परिणाम देखकर सामाजिक न्याय समर्थक खुशी से झूम उठे। बिहार विधासभा उपचुनाव की मंडलवादी छाया यूपी में और दीर्घतर हुई। फलस्वरूप मोदी की सोशल इंजीनियरिंग और अमित शाह की चुनावी रणनीति धरी की धरी रह गई।
शेष में यही कहा जा सकता कि उपचुनाव के दूसरे चरण में बिहार से शुरू हुई नई मंडलवादी राजनीति हिंदी पट्टी में मोदी के लिए बुरे दिन का संकेत दे चुकी है। अब भारतीय राजनीति की दिशा तय करने वाले यूपी-बिहार में सामाजिक न्याय के पुराने महाबलियों का नए सिरे से उभार का संकेत मिल चुका है। इसका फौरी इलाज यही है कि  मोदी अपने साथ आए यूपी-बिहार के नेताओं को योग्य सम्मान देकर इस काबिल बनाएं कि वे माया-मुलायम, लालू-नीतीश का मुकाबला कर सकें। क्योंकि जैसे लोहा लोहे को काट सकता है वैसे ही माया-मुलायम, लालू-नीतीश की काट भाजपा में शामिल हुए वंचित जातियों के नेता ही कर सकते हैं।
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)              

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