धन ही सुख का कारण, तो नोटबन्दी कैसे सफल होगी?

शीतला सिंह : केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार अघोषित आय पर नकेल लगाने के लिए कराधान विधि में संशोधन के माध्यम से यह व्यवस्था कर रही है कि छापे मारने के बाद जो अघोषित धन मिलेगा, उस पर कराधान की मात्रा 90 प्रतिशत तक होगी। ...

शीतला सिंह

केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार अघोषित आय पर नकेल लगाने के लिए कराधान विधि में संशोधन के माध्यम से यह व्यवस्था कर रही है कि छापे मारने के बाद जो अघोषित धन मिलेगा, उस पर कराधान की मात्रा 90 प्रतिशत तक होगी। उस पर लगने वाले कर के बाद 60 प्रतिशत तक जुर्माना भी लगाया जायेगा। साथ ही बचा धन चार वर्षों तक बिना ब्याज के बैंकों में रहेगा और उस पर मालिक को कोई अन्य लाभ भी नहीं मिलेगा। इसी के साथ आय की स्वत: घोषणा की जो योजना गत 30 सितम्बर को समाप्त हो गई थी पुन: चालू की जा रही है जिसमें स्वत: घोषणा करने वालों को 49.50 प्रतिशत कर चुकाने के बाद ‘पूर्ण मुक्ति’ मिल जायेगी यानी उससे उक्त घोषित आय के स्रोत नहीं पूछे जायेंगे। सरकार इस स्वत: घोषणा योजना को प्रोत्साहन विधि मान रही है, जिससे करदाता को अन्य परेशानियों, चलने वाले मुकदमे और दण्ड की व्यवस्था से छुटकारा मिल जायेगा। सरकार 2016 का वित्त विधेयक पारित कर चुकी है, जिसमें कराधान की व्यवस्था के विवरण भी हैं। एक प्रकार से बजट सत्र के दौरान ही हर वर्ष कराधान का विधेयक भी पारित होता है, जो आने वाले वर्ष में लागू होता है। इस बार नोटबन्दी के फलस्वरूप पैदा हुई परिस्थितियों के कारण कराधान विधि में संशोधन/परिवर्तन किया जा रहा है।
वित्त विधेयक और दूसरे विधेयकों में एक मूल अन्तर यह है कि इसका अकेली लोकसभा में पारित होना ही पर्याप्त माना जाता है। राज्यसभा द्वारा इसका अनुमोदन आवश्यक नहीं माना जाता। यह व्यवस्था इस दृष्टि से की गई है कि सरकार सीधे तौर पर लोकसभा के विश्वास वाली संस्था ही है, जिसका गठन प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के माध्यम से होता है। इस लिहाज से उसकी पहली जवाबदेही भी उसी के प्रति होती है। राज्यसभा को उच्च सदन तो उसे प्रतिष्ठा प्रदान करने के लिए कहा जाता है। इसका तर्क यह है कि वह ऐसा स्थायी सदन है, जिसमें विशिष्ट वर्ग के और खास पद्धति से चुने गये लोगों का प्रतिनिधित्व है। इस सदन में विभिन्न क्षेत्रों एवं समुदायों की भागीदारी होती है। लेकिन अधिकारों की दृष्टि से देखें तो राज्यसभा सरकारों के प्रति अविश्वास नहीं, बल्कि निरानुमोदन प्रस्ताव ही पारित कर सकती है, जिसका केवल इतना सा अर्थ है कि सदन उससे सहमत नहीं है। लेकिन सरकार की व्यवस्था पर उसका प्रभाव नहीं पड़ता।
वित्त विधेयक के लिए इसीलिए संविधान में व्यवस्था की गई है कि उसका सरकार के बहुमत वाले सदन लोकसभा में पारित होना ही आवश्यक है। क्योंकि वित्त विधेयक ही एक प्रकार से सरकार के वित्तीय नियंत्रण और भावी दिशा का संचालन वगैरह का प्रमुख तत्व है। जिसकी मार्फत निर्धारित योजनाएं और व्यवस्था संचालित होती है। हम देख ही रहे हैं कि इसी व्यवस्था के कारण नोटबन्दी का विरोध करने वाले असहमत लोग भी लोकसभा में अल्पमत में होने के कारण कराधान विधि में संशोधन का वित्तमंत्री द्वारा पेश किये गये विधेयक को रोक नहीं पाये। केवल यह विरोध जताकर रह गये कि यह संशोधन विधेयक जल्दबाजी में लाया गया, जिससे उन्हें सदन में उस पर चर्चा के लिए पर्याप्त अवसर नहीं मिला, साथ ही उसकी कमियों एवं खूबियों पर बहस भी नहीं हो पाई। यह एक प्रकार की निरंकुशता है, जो लोकतंत्र के लिए आदर्श नहीं हो सकती।
लेकिन चूंकि संविधान में इसका कोई उल्लेख नहीं है कि किसी विधेयक को पारित होने के लिए सदन में कितना समय चाहिए और केवल इतना देखा जाता है कि वह सदन का विश्वासभाजक है या नहीं, इसलिए उनके कथनों का सम्बन्धित विधेयक के पारण पर कोई असर नहीं पड़ा।
जहां तक नोटबन्दी या विमुद्रीकरण का सम्बन्ध है, वह विधिसम्मत है और उसके सिलसिले में यही बताया जाता है  सरकार जनअपेक्षाओं के अनुसार अपने दायित्वों का निर्वाह कर सके, इसके लिए वह जरूरी थी। नोटबंदी का उपयोग तीन बार इससे पहले भी हो चुका है। साथ ही आय की स्वत: घोषणा और उसके लिए रियायतों व सुविधाओं की योजनाएं भी विभिन्न सरकारें समय-समय पर चलाती आई हैं। लेकिन आज भी समाज कालेधन से मुक्त नहीं हो पाया है। साफ-साफ कहें तो इस मुक्ति की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा धन के प्रति लालसा के चलते पैदा होने वाली अनुचित रूप में अर्जन की प्रवृत्ति है। इसके चलते ही यदि एक बार समाज को कालेधन से पूरी तरह मुक्त भी कर दिया जाये तो गार-अी नहीं दी जा सकती कि वह पुन: एकत्र होना नहीं शुरू हो जायेगा। इसलिए सबसे बड़ा सवाल उस सहज प्रक्रिया और विधि की खोज का है, जिससे एक बार खत्म हो जाने पर कालेधन का जन्म ही न हो।
 हमारे समाज में क्रोध व लोभ आदि को गुण नहीं माना जाता, लेकिन हैरत की बात है कि इनकी उत्पत्ति जिन कारणों से होती है, उनके मूल को समाप्त नहीं किया जाता। यह जानते हुए भी कि जब तक ऐसा नहीं किया जाता, तब तक उनका कुछ बिगडऩे वाला नहीं। जिन देशों में ‘कैशलेस’ व्यवस्था अपनाई गई है, उनसे भी सामाजिक अन्याय समाप्त हो गया है,  ऐसा नहीं माना जाता। यहां तक कि कई देश तो इसका दावा भी नहीं करते। फिलहाल, धनार्जन के उपाय सरकार की व्यवस्थाओं की ही देन होते हैं। इसलिए बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि निर्णय करने वाले लोगों के स्वार्थ और मनोभावनाएं क्या हैं और वे समाज का भावी स्वरूप कैसा चाहते हैं?
  अर्थव्यवस्था का सरकारी मूल्यांकन भी यही बताता है कि देश में 82 प्रतिशत धन एक प्रतिशत लोगों की ही मुठ्ठी में केन्द्रित है। इस स्थिति के उचित या अनुचित होने का निर्धारण वह समाज व्यवस्था ही करेगी जो राज्य निर्धारित करता है। अलबत्ता, सामाजिक न्याय की दृष्टि से इसे उचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन भावी दिशा का निर्धारण इससे होता है कि समाज व्यवस्था के निर्णायकों की सोच क्या है। धन के प्रति लोगों के आग्रह और संचय की प्रवृत्ति का मुख्य कारण यही है कि हमारा आनन्दबोध उसी के इर्दगिर्द केन्द्रित है। यदि यह धन पर ही आधारित है तो उसके संचय की प्रवृत्ति भी होगी। चूंकि अर्जन के साधनों का नियमन और नियंत्रण राज्य का दायित्व है, इसलिए नोटबन्दी उसका एक कदम या नारा तो हो सकती है लेकिन मूल प्रश्न यह है कि हमने समाज की सोच को इतना परिवर्तित कर लिया है कि वह काली कमाई को अनुचित माने?
  हम धन को ही व्यवस्था का मुख्य कारक या कि ब्रह्म मान लेंगे तो व्यवस्था अन्यायमुक्त कैसे होगी? सुख और आनन्द की कल्पनाएं यदि साधन और वस्तुपरक होंगी तो उनके आग्रहों से भी मुक्ति सम्भव नहीं होगी। इसलिए रास्ता इस सोच को बदलने वाला होना चाहिए। सोचने वाला कि चोरी, डकैती, छिनैती, गबन, बेईमानी, छल और प्रपंच का जन्म क्यों हो रहा है और उन्हें किस व्यवस्था और सोच से मिटाया जा सकता है? धन संग्रह के विभिन्न अनुचित माध्यम तो साधन मात्र हैं।


 

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