'दिल जीतने' के बाद भी परमाणु समझौते पर चुनौती

राजीव रंजन श्रीवास्तव : नई दिल्ली ! भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पांच दिवसीय जापान यात्रा से वापस लौट आए। विमानतल पर उनका स्वागत नए अंदाज में हुआ। जहां भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज खुद मौजूद थीं। श्रीमती स्वराज ने फूलों का गुलदस्ता भेंटकर मोदी जी की अगवानी की। प्रधानमंत्री की पहली द्विपक्षीय यात्रा को विशेष रूप से देखा जा रहा है। कल ही मोदी सरकार के100 दिन पूरे हुए हैं।...

राजीव रंजन श्रीवास्तव

राजीव रंजन श्रीवास्तव
भारत-जापान के नजदीक आने से बदलेगी दक्षिण एशिया की सामरिक स्थिति

 नई दिल्ली भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पांच दिवसीय जापान यात्रा से वापस लौट आए। विमानतल पर उनका स्वागत नए अंदाज में हुआ। जहां भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज खुद मौजूद थीं। श्रीमती स्वराज ने फूलों का गुलदस्ता भेंटकर मोदी जी की अगवानी की। प्रधानमंत्री की पहली द्विपक्षीय यात्रा को विशेष रूप से देखा जा रहा है। कल ही मोदी सरकार के100 दिन पूरे हुए हैं।
कहा जा रहा है कि हनीमून के आखिरी पड़ाव का प्रधानमंत्री ने जमकर लुत्फ  उठाया। पांच दिनों में उन्होंने जापान के लोगों का दिल जीता। दोनों देशों के चिर प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी चीन को अपनी विस्तारवादी नहीं विकासवादी नीति पर चलने की परोक्ष सलाह दे डाली। जापानी व्यवसायियों को भारत आकर व्यापार करने के लिए हर संभव सहायता का वादा और प्रधानमंत्री कार्यालय में ही 'जापान प्लसÓ नाम से नए ऑफिस की स्थापना की घोषणा से जापानी पक्ष भी उत्साहित तथा संतुष्ट दिखा। यात्रा के पहले पड़ाव में क्योटो के बौद्ध मंदिरों में मोदी जी ने मत्था टेका। वहां के  इतिहास और विकास की जानकारी ली। अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी को भी क्योटो की तरह विकसित करने के लिए आपसी समझौता हस्ताक्षर भी अपनी मौजूदगी में करवाया। जापानी प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने भी (क्योटो से लेकर टोक्यो तक) खातिरदारी में कोई कमी नहीं छोड़ी। भारत-जापान विगत 14 वर्षों से द्विपक्षीय वार्ता से सामरिक, कूटनीतिक  और व्यापारिक रिश्तों को आगे बढ़ा रहे हैं। इस दौरान भारत में मेट्रो रेल, नालंदा विश्वविद्यालय की पुर्नस्थापना, कई विश्वविद्यालयों की अधोसंरचना, बुलेट ट्रेन के लिए माहौल तैयार करना, औद्योगिक गलियारे की स्थापना, विज्ञान एवं तकनीक में आपसी भागीदारी सहित कई मुद्दों पर जापान भारत की आर्थिक और मनोवैज्ञानिक मदद कर रहा है परन्तु 1998 में पोखरण परीक्षण के कारण परमाणु नीतियों को लेकर दोनों देशों में मतैक्य नहीं हो पाया है। 2006 में भारत-अमरीका असैन्य परमाणु करार के बाद से ऐसी उम्मीद भारत को थी कि जापान भी भारत के साथ परमाणु तकनीक साझा करेगा। तब से लेकर अब तक भारतीय कूटनीति के लिए जापान के साथ असैन्य परमाणु करार बड़ी चुनौती है। दूसरी तरफ दोनों देशों के बीच रक्षा सौदा भी अहम मसला है। भारत चाहता है कि जापान रक्षा क्षेत्र में भी भारत की मदद करे।
   इस क्षेत्र में पहली बार तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पिछले साल बड़ी सफलता तब मिली थी जब जापान आधुनिकतम तकनीक से लैस सैन्य एयरक्राफ्ट शिनमायवा यूएस-2 भारत को बेचने के लिए राजी हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका को बुरी तरह झेल चुके जापान ने अबतक किसी भी देश को सैन्य सहायता नहीं दी थी। जल-थल-नभ हर स्थान पर उतरने और उड़ान भरने तथा सैनिक एवं नागरिक सहायता में दक्ष इस एयरक्राफ्ट की डील भारत की कूटनीतिक जीत थी। इस डील से भारत-जापान के बीच सैन्य समझौते की भावी संभावनाओं के द्वार खुले। मोदी जी की यात्रा में भी शिनमायवा यूएस-2 को लेकर भविष्य की रणनीति पर चर्चा हुई है। लेकिन बहुप्रतीक्षित असैन्य परमाणु करार और सैन्य  समझौते पर अब भी राह प्रशस्त करने की बात कही जा रही है। कूटनीतिक आधार पर दोनों देश एक-दूसरे के काफी करीब दिखाई देते हैं। दोनों देशों में सामाजिक और धार्मिक समानता इसका बड़ा कारण माना जा सकता है। दूसरी ओर दोनों देश अपने पड़ोसी चीन की विस्तारवादी नीति से समय-समय पर जूझते रहते हैं। आए दिन भारत के साथ सीमा विवाद और नत्थी वीजा भारत-चीन संबंध में खलल डालता है,  जबकि दक्षिण चीनी सागर मामले को लेकर जापान और चीन कूटनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में अगर जापान और भारत की दोस्ती मजबूत होती है तो एक तरफ जहां दक्षिण एशिया में जापान अपना सैन्य ठिकाना तलाश लेगा वहीं भारत भी तकनीकी और सामरिक रूप से मजबूत होगा। पिछले दो दशक से भारत के पड़ोसी देशों को आर्थिक, सामरिक तथा अधोसंरचना विकास में मदद के बल पर चीन ने अपने करीब लाने का सफल प्रयास किया है। जिसे भारत गंभीर चुनौती के रूप में देखता है। ऐसी स्थिति में जापान-भारत मित्रता दोनों देशों के लिए लाभकर साबित होगी। मोदी जी के विस्तारवादी बयान को चीनी मीडिया ने भी काफी गंभीरता से लिया है और नाराजगी भी जताई है। जाहिर है जापान के रूप में भारत को एक अच्छा दोस्त जरूर मिल गया है परंतु अपने पड़ोसी चीन से रिश्ते भी मजबूत रखना होगा! व्यापारिक दृष्टि से भी भारत के लिए चीन ज्यादा महत्वपूर्ण देश है। हालांकि अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने जापानी व्यवसायियों को विश्वास में लेने की काफी कोशिश की है। 100 दिन के अल्पकालीन कार्यावधि में भारत की आर्थिक प्रगति (जीडीपी में वृद्धि) को रेखांकित किया। खुद को भी गुजराती होने के नाते व्यापार का जानकार बताने से नहीं चूके परंतु दीर्घकालिक जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) की मांग पर आपसी सहमति बनाने के पूर्ववर्ती सरकार के वादे को ही दोहराते नजर आए। एक साथ आगामी पांच वर्षों के लिए जापानी मदद से मिलने वाला 35 बिलियन डॉलर प्रधानमंत्री मोदी की बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। भारत का खजाना भरा रहेगा तो देश के विकास को गति मिलेगी।

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