दक्षिण-पूर्व एशिया में महिला सशक्तिकरण

डॉ. गौरीशंकर राजहंस : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 4 मई को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर एशियाई देशों, मुख्यत: दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बौद्ध भिक्षुओं को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान बुद्ध और बौद्ध धर्म संसार में शांति लाएंगे और 21वीं सदी एशिया की सदी होगी। इस संदर्भ में मुझे दक्षिण-पूर्व एशिया के उन देशों की बरबस याद आ गई जहां अभी भी बौद्ध धर्म 'राष्ट्रीय धर्मÓ है। ...

डॉ गौरीशंकर राजहंस

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 4 मई को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर एशियाई देशों, मुख्यत: दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बौद्ध भिक्षुओं को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान बुद्ध और बौद्ध धर्म संसार में शांति लाएंगे और 21वीं सदी एशिया की सदी होगी। इस संदर्भ में मुझे दक्षिण-पूर्व एशिया के उन देशों की बरबस याद आ गई जहां अभी भी बौद्ध धर्म 'राष्ट्रीय धर्मÓ है।
 यह हमारा दुर्भाग्य है कि आजादी के बाद से ही और सच कहा जाए तो उसके पहले से हम इंग्लैंड और अमेरिका के बारे में बहुत जानते रहे हैं। परन्तु अपने पड़ोस के दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के बारे में हमें पर्याप्त ज्ञान नहीं है। जब नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री हुए तो उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से संबंध सुदृढ़ करने का प्रयास किया। इस विदेश नीति का नाम उन्होंने 'लुक ईस्ट नीतिÓ दिया। यह महज एक संयोग था कि इस नीति के अंतर्गत 90 के दशक में मुझे लाओस और कम्बोडिया में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय नरसिम्हा राव और तत्कालीन राष्ट्रपति स्वर्गीय शंकर दयाल शर्मा ने मुझे समझाया कि इन देशों के साथ हमारे रिश्ते बहुत पुराने हैं, सैकड़ों वर्ष पुराने। अत: आवश्यकता है इन देशों के साथ अपने सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने की।
दक्षिण-पूर्व एशिया में तीन प्रमुख देश हैं। लाओस, कम्बोडिया और वियतनाम। इन तीनों को मिलाकर इन्डो चाइना या हिन्द-चीन कहा जाता है। पहले ये फ्रांस के उपनिवेश थे। अब पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं । पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'ग्लिमसेज ऑफ वल्र्ड हिस्ट्रीÓ में लिखा है कि 'इन्डो चाइनाÓ के तीनों देशों में सैकड़ों वर्ष पूर्व भारत और चीन से लोग गये थे। परन्तु धर्म और संस्कृति तो भारत से ही गई थी। सम्राट अशोक के समय में बौद्ध भिक्षु पैदल चलकर ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों को पार कर पहले बर्मा गये फिर वहां से थाईलैंड जिसका नाम उन दिनों 'सियांमÓ था, गए और वहां से लाओस, कम्बोडिया और वियतनाम गए। इन सभी देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार हुआ। भारत में तो बौद्ध धर्म प्राय: समाप्त हो गया। परन्तु इन सभी देशों में अभी भी बौद्ध धर्म का ही वर्चस्व है और लाओस तथा कम्बोडिया में बौद्ध धर्म राजकीय धर्म माना जाता है तथा बौद्ध भिक्षुओं का समाज में सबसे अधिक आदरणीय स्थान है। उनका स्थान राजा-महाराजा तथा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी ऊपर है।
परन्तु इन सभी देशों में एक मुख्य बात जो मुझे आकर्षित करती रही वह यह कि वहां महिलाओं का वर्चस्व है। प्राय: सभी बड़े पदों पर महिलाएं विराजमान हैं। मध्यवर्गीय परिवार में पुरुष घर पर रहकर बच्चों की देखभाल करते हैं और महिलाएं दफ्तरों में काम करती हैं। स्कूल कॉलेज में पढ़ाती हैं तथा खेत-खलिहान को भी संभालती हैं। वियतनाम युद्ध में महिलाओं ने पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर अमेरिकनों के खिलाफ जंग जीती थी जिसका परिणाम यह हुआ कि बड़े बे-आबरू होकर अमेरिकनों को वहां से भाग जाना पड़ा।
मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उन देशों में कोई काम छोटा नहीं समझा जाता है। कम्बोडिया में मेरे दूतावास का ड्राईवर मुश्किल से मैट्रिक पास होगा। परन्तु उसकी पत्नी एम.ए., पीएचडी थी और कंबोडिया विश्वविद्यालय में 'फिलासफीÓ की प्रोफेसर थीं। मेरे दूतावास की ड्यूटी पूरी कर वह ड्राईवर घर में बच्चों की देखभाल करता था और उसकी पत्नी यूनिवर्सिटी में पढ़ाती थी तथा अपने विद्यार्थियों को रिसर्च में योगदान देती थी।
सबसे अधिक आश्चर्य मुझे इन सभी देशों में यह देखकर हुआ कि बाजारों में खरीदी-बिक्री का काम महिलाएं ही करती थीं। उनका दबदबा इतना अधिक था कि कोई उनसे बदतमीजी करने की हिम्मत नहीं कर सकता था और न कोई जरूरत से ज्यादा मोल भाव कर सकता था।
जैसा कि ऊपर कहा गया है इन सभी देशों में बौद्ध धर्म का वर्चस्व है और हर सुबह झुण्ड के झुण्ड बौद्ध भिक्षु तथा भिक्षुणी सड़कों पर चलकर 'बुद्धम शरणम् गच्छामिÓ का नारा लगाते हुए जाते थे और लोग बड़े आदर से उनके भिक्षापात्र में फल और पैसों के अलावा कीमती वस्तुएं दान में दे देते थे। सबसे अधिक आदर बौद्ध भिक्षुणियों का होता था और लोग उनके सामने नतमस्तक होकर उनके भिक्षापात्रों में दान दिया करते थे। इन बौद्ध भिक्षुओं और भिक्षुणियों के झुण्ड को देखकर मुझे सैकड़ों वर्ष पुराने भारत का दृश्य एकाएक मानस पटल पर आ जाता था और मैं सहज कल्पना कर सकता था कि भारत का वह दृश्य कितना मनोरम रहा होगा जब भारत में सर्वत्र बौद्ध धर्म छाया रहा होगा और लोग सुबह-सुबह 'बुद्धम् शरणम् गच्छामिÓ मंत्र का जाप करते हुए सड़कों पर चलते होंगे।
लाओस और कंबोडिया में तो मैं राजदूत था ही। दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देशों जैसे थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया आदि देशों का भी मैंने व्यापक भ्रमण किया था और यह जानने का प्रयास किया था कि इन देशों में भारतीय संस्कृति का क्या प्रभाव रहा होगा। भारत जैसे देश में राजधानी दिल्ली में भी आए दिन महिलाओं के साथ छेडख़ानी और बदसलूकी होती है। परन्तु इन सभी देशों में कोई किसी महिला को बुरी न•ार से देखने का साहस नहीं कर सकता है और यदि कभी शराब पीकर नशे में किसी ने किसी महिला के साथ छेडख़ानी की तो आस-पास की महिलाएं उसे पीट-पीटकर अधमरा कर देती हैं। पुलिस मकहमे में भी अधिकतर महिलाएं सीनियर पदों पर आसीन हैं। सबसे अधिक आश्चर्य तो मुझे यह देखकर हुआ कि दूतावासों में भी महिला कर्मचारियों की संख्या बहुत अधिक थी।
ऐसा लगता था कि अधिकतर महिलाएं भारत मूल की ही हों। उनके चेहरे मंगोल प्रजाति के कम थे, आर्य प्रजाति के अधिक थे और ये देखने में अत्यन्त ही खूबसूरत थीं। उनके नाम भी भारतीय नामों से मिलते-जुलते थे जैसे छाया, मनोरमा, सरिता, यशोधरा आदि। उनको इस बात का बहुत गम रहा कि भारत ने कभी इन देशों की तरफ नहीं देखा।
इन देशों के बारे में हजारों संस्मरण मस्तिष्क पटल पर आज भी अंकित हैं। कुल मिलाकर एक ही विचार बार-बार मन में आता है कि अपने पड़ोस में महिलाओं का कितना अधिक सम्मान है। वे कितनी उद्यमी हैं। उनमें अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं है। सभी बराबर हैं। यद्यपि फ्रांस ने सैंकड़ों वर्षों तक इन देशों का शोषण किया। बाद में वियतनाम की लड़ाई में भी इन देशों का शोषण हुआ। परन्तु आज ये सभी देश आर्थिक रूप से विकसित होने का प्रयास कर रहे हैं और इस प्रयास में सबसे अधिक योगदान महिलाओं का है। भारत के लिए यह आंख खोलने वाली बात है।
(लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)

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