दक्षिण पूर्व एशिया और भारत

राजीव रंजन श्रीवास्तव : हा ल ही में संपन्न हुई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की म्यांमार यात्रा शायद उनके प्रधानमंत्रित्व काल की आखिरी यात्रा हो! ...

राजीव रंजन श्रीवास्तव

हाल ही में संपन्न हुई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की म्यांमार यात्रा शायद उनके प्रधानमंत्रित्व  काल की आखिरी यात्रा हो! अगर ऐसा होता है तो यह रोचक तथ्य होगा कि उनकी पहली यात्रा भी बिम्स्टेक सम्मेलन (सन 2004 ) को लेकर हुई थी और आखिरी यात्रा (3-4 मार्च 2014) भी बिम्स्टेक के लिए ही हुई। बिम्स्टेक यानी बे ऑफ बंगाल इनीशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक कॉपरेशन अथवा 'बहुक्षेत्रक तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल'। बंगाल की खाड़ी के आस-पास वाले देशों के इस संगठन में बंगलादेश, भूटान, भारत, नेपाल, श्रीलंका,थाईलैंड और म्यांमार है, जो भारत के उत्तर पूर्वी रायों की सीमा से लगे हैं। भारत इन रायों का आर्थिक विकास चाहता है और वह चाहता है कि बिम्स्टेक देश विकास को गति दें।  मनमोहन सिंह बिम्स्टेक में दिए अपने भाषण में यह दोहराते हुए सुने गए कि बिम्सटेक सदस्यों के बीच भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग, कालादान बहुस्वरूपीय पारगमन परिवहन परियोजना, एशियाई राजमार्ग नेटवर्क, आसियान संपर्क योजना और अन्य योजनाओं के जरिए भारत भौतिक संपर्क बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा कि हम जल्दी ही म्यांमार के लिए सीधा जल मार्ग शुरू करेंगे जिससे हमारे क्षेत्र में बढ़ते सामुद्रिक संपर्क में और इजाफा होगा।   
मनमोहन सिंह के बयान से यह साफ़ जाहिर होता है कि भारत ने बीते 10 वर्षों में दक्षिण पूर्व एशिया से संपर्क साधते हुए कई महत्वपूर्ण समझौते किये हैं जिसका कार्यान्वयन जारी है। परन्तु घोषणाओं, समझौतों और संगठनों की फेहरिस्त से बाहर निकलकर कुछ देर के लिए दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के अतीत में झाँकने की कोशिश करें तो हम पाते हैं कि धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक दृष्टिकोण से इस क्षेत्र में भारत का वर्चस्व था। अधिकतर देश बौध्द धर्म के अनुयायी हैं। आदिकाल में अफगानिस्तान से लेकर थाईलैंड तक सड़क मार्ग से आवागमन की सुविधा उपलब्ध थी।  जिसका लाभ व्यापारियों को होता था। बाद के वर्षों में यूरोपियन उपनिवेशवादी देश जैसे ब्रिटेन, पुर्तगाल, हाँलैन्ड आदि के शोषण का यह क्षेत्र शिकार रहा है।  उपनिवेशकारियों के हाथों में विश्व का यह हिस्सा कठपुतली की भांति  हो गया था।  सांस्कृतिक, धार्मिक और व्यापारिक मेल-जोल लगभग बंद करा दिया गया था और इस क्षेत्र के कई औपनिवेशिक टुकड़े हो गए थे।  लेकिन भारत के स्वतंत्र होने के बाद इन देशों में भी स्वतंत्रता आंदोलन ने जोर पकड़ा और ये सारे देश भी बाद के वर्षों में आज़ाद होते गए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1954 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में जब गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत हुई तो दक्षिण एशिया के देशों का भरपूर साथ मिला। बाद में इस आन्दोलन में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देश शामिल होते गए।  दक्षिण एशिया और हिन्द महासागर के देश चाहते थे कि विश्व में शान्ति और सद्भाव के लिए इस आंदोलन को यादा से यादा देशों का साथ मिले लेकिन अब भी दक्षिण पूर्वी एशिया के कई देशों में यूरोपीय और अमरीकी अतिक्रमण था।  इसी दौरान, सन 1967 में आसियान की स्थापना थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में की गई। इसके संस्थापक सदस्य थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस और सिंगापुर थे। इस संगठन की स्थापना के वक्त सदस्य देश चाहते थे कि भारत भी आसियान में शामिल हो लेकिन, चूँकि भारत उस समय गुटनिरपेक्ष आंदोलन का ध्वजवाहक था इसलिए भारत ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। ब्रूनेई इस संगठन में 1984 में (ब्रिटेन से आज़ाद होने के बाद) शामिल हुआ और 1995 में वियतनाम। इनके बाद 1997 में लाओस और बर्मा इसके सदस्य बने।  आसियान की स्थापना के बाद सन 1985 में दक्षिण एशियाई देशों का संघ (सार्क) बना और कुछ वर्ष बाद उसके सदस्य देशों के बीच मुक्त व्यापार के लिए-'साफ्टा'।  कुल मिलकर, वैश्विक अर्थव्यवस्था में बेहतर भविष्य के लिए थोड़ी-बहुत भिन्न प्रकृति के साथ आसियान, सार्क, ब्रिक्स, साफ्टा, बिम्सटेक, शंघाई सहयोग संगठन-जैसे कई संगठन या संघ पूरी दुनिया में उपस्थित हो चुके हैं और आगे भी ऐसे ही नए मंचों के निर्माण की संभावना बनी रहेगी।
सन 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व में अमरीकी आधिपत्य के  एकतरफा वर्चस्व का दौर शुरू हुआ। इस दौरान भारत के तात्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने 'लुक ईस्ट' अर्थात पूरब की ओर देखो-नीति की घोषणा की। भारत चाहता था कि उसे आसियान की सदस्यता मिल जाए लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तान भी सदस्यता चाह रहा था।  भारत-पाक के आपसी सम्बन्ध अच्छे नहीं होने के कारण दोनों देशों को आसियान की सदस्यता नहीं मिली।  परन्तु भारत आसियान का विशेष आमंत्रित देश बना लिया गया।  नरसिम्हा राव की सरकार में डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे। आर्थिक विशेषज्ञ होने के नाते वे इस बात से भली-भांति परिचित थे कि आर्थिक और सामरिक दृष्टि से दक्षिण पूर्वी एशिया भारत के लिए कितना महत्व रखता है। 2004 में जब मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री बने तो पूरब उनकी प्राथमिकता सूची में था।  अपनी पहली यात्रा में बिम्स्टेक को एक नई गति देने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री ने दक्षिण पूर्वी और एशिया प्रशांत के देशों के साथ कई द्विपक्षीय भेंट वार्ता की। कई समझौते हुए।
संगठन और तनाव साथ-साथ
तमाम संघों-संगठनों, द्विपक्षीय-त्रिपक्षीय समझौतों के बावजूद  यह क्षेत्र पूरी तरह तनाव से मुक्त नहीं है। भारत-चीन का सीमा विवाद, भारत-पाकिस्तान के कटु सम्बन्ध, श्रीलंका में तमिल मूल के लोगों की समस्या और वियतनाम - कम्बोडिया के खराब सम्बन्ध की वजह से चिन्ता होना स्वाभाविक है। भारत-श्रीलंका सम्बन्धों में भी समय-समय पर कडवाहट महसूस होती है। हाल के वर्षों में चीन के साथ सीमा अतिक्रमण और अरुणाचल प्रदेश के लोगों के लिए नत्थी वीजा दोनों देशों के संबंधों में खटास के प्रमुख कारक रहे हैं। इतिहास के अनुभवों को देखते हुए भारतीयों के मन में चीन के प्रति सकारात्मक विचार नहीं है। फिर भी दोनों देशों की सरकारें व्यापारिक गतिविधियों को मजबूत करने में लगी हुई हैं। भारतीय विदेश मंत्री ने हाल ही में कहा है कि सारे मतभेदों को मिटाकर दोनों देश आर्थिक संबंधों को और गति देना चाहते हैं। दूसरी ओर चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने अपने वार्षिक संवाददाता सम्मेलन में कहा है कि हम ऐसी कोई चीज नहीं लेंगे, जो हमारी नहीं है, लेकिन हम अपनी जमीन के एक-एक इंच टुकड़े की रक्षा करेंगे। हालाँकि चीन अपनी विस्तारवादी नीति के तहत दक्षिण पूर्व एशिया में भारत को भरसक घेरने में जुटा है। पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार, बंगलादेश तक सड़क मार्ग से चीन अपनी सीमा को जोड़ चुका है। बीसीआईएम- आर्थिक कॉरिडोर (बंगलादेश-चीन-भारत-म्यांमार इकोनॉमिक कॉरीडोर) से चीन को काफी उम्मीदें हैं। इस सड़क मार्ग से चीन को भारत सहित बांग्लादेश और म्यांमार का बड़ा हिस्सा व्यापारिक गतिविधियों के लिए मिल जायेगा।  बरसों तक सैन्य शासन झेल चुके म्यांमार की अधोसंरचना में चीन बड़े भागीदार के रूप में योगदान दे रहा है।  बताया जाता है कि म्यांमार की नई राजधानी नेपीताव का निर्माण और विकास चीन के द्वारा ही हो रहा है।  भारत के उत्तर पूर्वी रायों के साथ म्यांमार की सीमा लगी हुई है।  इन रायों में अलगाववादी सक्रिय हैं। अलगाववादियों के लिए म्यांमार एक सुरक्षित देश रहा है, जहां से वे अपनी गतिविधियों का संचालन करते रहे हैं।  इस वजह से भारत को म्यांमार के साथ वैसे ही सम्बन्धों  की आवश्यकता है, जैसे उसके भूटान और थाईलैंड के साथ हैं। म्यांमार में ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। भारत वहां के गैस भंडारों का उपयोग कर सकता है, और पाइप लाइन के सहारे गैस ला सकता है। भारत के पूर्वोत्तर रायों के विकास के लिए भी म्यांमार के साथ संबंध बेहतर करना ज़रूरी है। कालादान परियोजना पर सन 2008 से काम चल रहा है। जबकि, चीन के सहयोग से इरावती नदी पर बनाए जा रहे बांध पर म्यांमार ने प्रतिबंध लगाया है, क्योंकि उसका विरोध हो रहा था। यह सर्व विदित है कि चीन म्यांमार के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करता आ रहा है। चीन नहीं चाहेगा कि म्यांमार में भारत की आर्थिक गतिविधियां बढ़ें।
दरअसल, दक्षिण पूर्वी एशिया में उपज रहे असंतोष और विवादों के केंद्र में चीन रहता आया है। दक्षिणी चीन सागर को लेकर चीन, जापान, वियतनाम,  फिलिपींस, मलेशिया और ब्रूनेई के बीच भी एकमत बनते नहीं दिख रहा है।  ये देश दक्षिणी चीन सागर में कई द्वीपों पर चीन की स्वायत्तता के दावों पर सवाल उठाते रहे हैं। हाल के महीनों में इन देशों के समर्थन में अमरीका द्वारा आवाज उठाए जाने को लेकर भी चीन काफी नाराज है। चीन और जापान के बीच तो इस क्षेत्र को लेकर विवाद काफी गहराता जा रहा है। जबकि, पिछले 10 वर्षों में भारत और जापान काफी करीब आये हैं। दोनों देश चीनी चुनौती के आगे अपनी मित्रता को प्रगाढ़ कर रहे हैं। भारत में कई परियोजनाएं जापानी मदद से चल रही हैं। दिल्ली मेट्रो, तीव्र गति की रेल, औद्योगिक गलियारा, नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुत्थान जैसे कार्यों में जापान भारत की खुलकर मदद कर रहा है। भारत पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा बाज़ार है। अत: आर्थिक दृष्टि से कोई भी विकसित देश इसकी उपेक्षा नहीं कर पा रहा है। वहीं, आसियान, सार्क और बिम्स्टेक जैसे सदस्य देश भारत को बड़े भाई की भूमिका में देखना चाहते हैं। दक्षिणी चीन सागर को लेकर भी सभी की निगाहें भारत पर टिकी रहने की उम्मीद है।  अत: इस विवाद में भारत का रणनीतिक योगदान भी बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। कुल मिलाकर, दक्षिण पूर्व के देशों के बीच भारत अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाने में सफल रहा है। पडोसी देशों में राजनितिक स्थिरता के लिए प्रतिबध्दता और किसी के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति से भारत की विश्वसनीयता में बढ़ोत्तरी हुई है और आर्थिक,सांस्कृतिक तथा राजनितिक दृष्टि से भारत की 'पूरब की ओर देखो' नीति को विगत 10 वर्षों में गति मिली है।

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