डोरेमॉन के देश में बॉलीवुड डांस

राजीव रंजन श्रीवास्तव : दिल्ली के एयरफ़ोर्स स्टेशन से प्रधानमंत्री के विशेष विमान से 27 मई की सुबह 10 बजे हम टोक्यो के लिए रवाना हुए। ...

राजीव रंजन श्रीवास्तव

भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के साथ जापान और थाईलैंड की पांच दिवसीय यात्रा पर मीडिया दल के सदस्य के रूप में पिछले माह देशबन्धु के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव भी गए थे। प्रस्तुत है श्री श्रीवास्तव की जापान यात्रा की कुछ यादें-
दिल्ली के एयरफ़ोर्स स्टेशन से प्रधानमंत्री के विशेष विमान से 27 मई की सुबह 10 बजे हम टोक्यो के लिए रवाना हुए।  लगभग आठ घंटे की यात्रा के बाद विशेष विमान जापान की राजधानी टोक्यो पहुँचने वाला था। उच्च तकनीक वाला शहर टोक्यो रौशनी से जगमग हो रहा था। एक नदी के किनारे लन्दन आई की तरह ऊँचा झूला दिख रहा था। खूबसूरत नजारों में हम खोये ही थे कि विमान का संपर्क धरती से हुआ। हम टोक्यो के हेनेदा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर थे।  हेनेदा हवाई अड्डा 2010 से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए अधिकृत हुआ है इससे पहले यहाँ से सिर्फ घरेलू उड़ानें ही होती थीं। परन्तु टोक्यो में अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए यात्रियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए अब हेनेदा के तीन नए टर्मिनल बनाये गए हैं। यह हवाई अड्डा प्रतिवर्ष 6 करोड़ यात्रियों को अपनी सेवाएँ प्रदान कर रहा है। और दुनिया के पांच सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में शुमार हो चुका है। परन्तु हमारे लिए इस व्यस्ततम हवाई अड्डे पर व्यस्त दिखने वालों में सुरक्षाकर्मी और हम मीडिया कर्मियों के अलावा कुछ भी नहीं था। सुरक्षाकर्मी चुस्ती के साथ सुरक्षा घेरे को बनाने में लगे हुए थे। विमान के अगले दरवाजे से भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी श्रीमती गुरशरण कौर को उतरना था। ठीक सामने भारत और जापान के राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहे थे। 16 डिसे तापमान और तेज हवा के बीच स्वागत की गर्मजोशी को देखकर आश्चर्य भी हो रहा था और ख़ुशी भी। 
जापानी पक्ष द्वारा स्वागत की रस्म-अदायगी के बाद प्रधानमंत्री का काफिला टोक्यो के इम्पेरियल होटल के लिए रवाना हुआ और मीडिया का दल पैलेस होटल के लिए। हेनेदा के विशेष दरवाजे से (वी आई पी गेट) से बहार निकलकर अब हम टोक्यो शहर में थे। ऊँची इमारतें, कई फ्लाई ओवर और सुरंगों के बीच से गुजरते हुए हम होटल पहुंचे। तब तक स्थानीय समय के अनुसार रात्रि  के 10.30 बज चुके थे। होटल की 19 वीं मंजिल पर सुव्यवस्थित मीडिया सेंटर पहले से हमारा इंतज़ार कर रहा था।  जहाँ से हमें भारत-जापान के बीच द्विपक्षीय वार्ता सम्बंधित पल-पल की खबर भारत भेजनी थी। टोक्यो स्थित भारतीय दूतावास के कर्मी वहां उपस्थित थे। जिनमें महिला सहयोगियों की संख्या अधिक दिख रही थी। पता चला कि दूतावास के कई कर्मी भी तीन दिनों के लिए इसी होटल में शिफ्ट हो गए हैं, ताकि भारत से आये मीडिया दल को किसी भी प्रकार की सहायता तुरंत उपलब्ध कराई जा सके। जापान में भारत की राजदूत महिला हैं और यह गौरतलब है कि श्रीमती दीपा गोपालन वाधवा यहाँ की पहली भारतीय महिला राजदूत हैं।  मीडिया सेंटर में ही हमारे कमरों की चाबी दी गयी। हमें एक छोटा पिननुमा बैज दिया गया जिसे हर वक्त अपनी कमीज की जेब या कोर्ट के ऊपरी भाग में लगाये रखना था। बताया गया कि जापानी प्रधानमंत्री कार्यालय और अन्य उच्च स्तरीय बैठकों में प्रवेश के लिए यह बैज अति आवश्यक है इसे संभाल कर रखना है और लौटते वक्त ध्यान से इसे वापस करना है। इसी संदर्भ में एक साथी ने बताया कि पिछली बार किसी भारतीय पत्रकार ने इसे वापस नहीं किया, वो अपने साथ इसे भारत ले गया। जिस कारण जापानी सुरक्षा विभाग को इस बैज के पूरे स्वरुप को ही बदलना पड़ा है। हमें यह नहीं बताया गया कि आखिर इस छोटे से बैज में है क्या।  लेकिन जितना समझ पाया उससे यही अंदाज लगा कि शायद सुरक्षा कारणों से इसके अन्दर कोई इलेक्ट्रोनिक चिप लगा हो।
हेनेदा विमान तल पर प्रधानमंत्री भारतीय और जापानी मीडिया से भी मुखातिब हुए थे जिसकी खबर तुरंत अपने अखबार को भेजनी थी। अत: अपने कमरे में जाने से पहले समाचार भेजना यादा जरूरी था। इसी बीच यह भी जानकारी मिली कि डिनर के लिए रेस्तरां 11 बजे तक ही खुला रहेगा। खबर लिखते-भेजते 11.30 बज गए, रेस्तरां बंद हो चुका था। अगली सुबह 6 बजे नाश्ते पर सबको मिलना था। इसलिए अपने कमरे में जाना और समय से सो जाना उचित लगा। नींद नहीं आ रही थी। भारतीय समयानुसार रात 1.30 सोने की आदत है। जापान की घड़ी भारत से 3.30 घंटा आगे है। कमरे में पाया कि दरवाजे से लेकर लाइट, बाथरूम और टॉयलेट का फ्लश तक इलेक्ट्रॉनिक है। उच्च तकनीक से पानी की बचत का पूरा इंतजाम। कम पानी की जरुरत तो निम्न फ्लश के बटन को दबाएं, मध्यम के लिए अलग और यादा पानी चाहिए तो अलग बटन। 50 वर्ष पुराने  इस होटल को नए स्वरुप और नयी तकनीक के साथ पिछले साल दुबारा लोकार्पित किया गया है। इस होटल के ठीक सामने जापान के सम्राट का महल (पैलेस) है। जिसे इम्पीरियल पैलेस कहा जाता है। शायद पड़ोसी होने के कारण इस होटल को पैलेस होटल का नाम दिया गया हो।
प्रधानमंत्री की मुलाकात जापानी सम्राट से होने से पहले हमें इम्पीरियल पैलेस (महल) जाना था। किसी राजा या सम्राट के महल का नाम ध्यान में आते ही भारत के राजाओं की विशालकाय और भव्य इमारतों की तस्वीर ऑंखों के सामने आ जाती है।  ऐसी ही कल्पना जापानी सम्राट के महल को लेकर मैंने की थी। परन्तु इसके विपरीत लगभग 3.5 वर्ग किलोमीटर में फैले इस पैलेस को आधुनिक पध्दति से तैयार किया गया है। राज परिवार के निजी भवन के अलावा अभिलेखागार, म्यूजियम और कार्यालय के भवन हैं। परिसर के अधिकतर हिस्सों में कई तरह के पेड़-पौधे लगे हैं जो इस जगह की खूबसूरती को और बढ़ाते है। यहाँ के अधिकतर सुरक्षाकर्मी साइकिल की सवारी करते हैं, जबकि इसी परिसर में एक पेट्रोल पम्प भी है जो विशिष्ट लोगों के वाहनों के लिए है। हर वर्ष दो जनवरी को सम्राट के जन्मदिन पर आम जनता के लिए इस महल परिसर को खोला जाता है जहाँ सम्राट अपने परिवार सहित आम जनता का अभिवादन स्वीकार करते हैं तथा हर साल एक जनवरी को इसी परिसर में एक काव्य सम्मलेन का आयोजन भी किया जाता है जिसमें कई गणमान्य आमंत्रित होते हैं।
भारतीय दूतावास ने प्रधानमंत्री के दौरे पर साथ आए प्रतिनिधियों और मीडिया दल के लिए दुभाषिए नियुक्त कर रखे थे। जापानी भाषा के ज्ञान के बिना जापान में घूमना काफी कठिन है। वहां अंग्रेजी बोलने वाले लोग विरले हैं। परन्तु भारतीय दूतावास में काम करने वाली एक जापानी लड़की के साथ हम  लोग जब किसी कार्यक्रम के लिए निकले तो उसने ख़ुशी के साथ यह भी बताया कि वह अंग्रेजी के अलावा टूटी-फूटी हिंदी भी बोल लेती है। फिर क्या था हमारे कई साथियो ने उससे भारतीय अंदाज में हिंदी में बात करना शुरू कर दिया। जिसे उस लड़की के लिए समझना काफी कठिन था। वह भारतीय दूतावास में ही हिंदी सीख रही है। भारतीय कला, संस्कृति और नृत्य को प्रोत्साहित करने के लिए दुनिया के कई देशों में भारतीय दूतावास के द्वारा सांस्कृतिक केंद्र की स्थापना की गई है। जहाँ उस देश के लोग भारतीय कला और नृत्य का प्रशिक्षण लेते हैं। टोक्यो के भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में भी कई जापानी युवक -युवतियां प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इसी सांस्कृतिक केंद्र की दो लड़कियों  के द्वारा प्रस्तुत बॉलीवुड डांस (हिंदी फ़िल्मी गानों की धुन पर नृत्य) भी देखने का मौका मिला। जिस कार्यक्रम में यह नृत्य प्रस्तुत किया गया था उसी में जापानी डॉल (गुडिया) नृत्य, जापानी वाद्य और जापानी शास्त्रीय संगीत की भी मनोरम प्रस्तुति थी।  भारत और जापान का यह सांस्कृतिक संगम दोनों देशों की नजदीकियों को बयां कर रहा था। जापानी लोक संस्कृति पर आधारित कई कार्टून भी आज भारत में काफी पसंद किये जाते हैं। प्रधानमंत्री के स्वागत में आयोजित एक कार्यम को संबोधित करते हुए जापान-भारत संघ के अध्यक्ष और जापान के पूर्व प्रधानमंत्री योशिरो मोरी ने जापानी कार्टून फिल्मों का बड़े उत्साह के साथ जिक्र करते हुए कहा था कि किस प्रकार डोरेमॉन, कित्रेत्सू और शिन्चान  भारत में बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय है। और हमारी नजदीकियों में अब कार्टून फिल्मों का भी योगदान है।  (कल जारी)

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

Deshbandhu के आलेख