जलवायु परिवर्तन संबंधी समझौता

गिरीश मिश्र : विगत 30 नवम्बर को पेरिस में जलवायु को लेकर विश्व के नेताओं के बीच परस्पर बातचीत शुरु हुई। कहना न होगा कि यह सम्मेलन तेरह दिनों तक चलने के बाद 12 दिसम्बर को जाकर समाप्त हुआ। सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन को लेकर पेरिस समझौता हुआ जिसमें कुल मिलाकर 196 पक्षों ने हिस्सा लिया।...

डॉ. गिरीश मिश्र

विगत 30 नवम्बर को पेरिस में जलवायु को लेकर विश्व के नेताओं के बीच परस्पर बातचीत शुरु हुई। कहना न होगा कि यह सम्मेलन तेरह दिनों तक चलने के बाद 12 दिसम्बर को जाकर समाप्त हुआ। सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन को लेकर पेरिस समझौता हुआ जिसमें  कुल मिलाकर 196 पक्षों ने हिस्सा लिया। बातचीत के जरिए जलवायु परिवर्तन में यथासंभव फेरबदल लाने की कोशिश की गई। यह समझौता तब लागू होगा जब कम से कम 56 देश इसके लिए आगे आएंगे। याद रहे कि ये देश कम से कम 55 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैस के लिए जिम्मेदार होने चाहिए।
न्यूयार्क में 22 अप्रैल 2016 और 21 अप्रैल 2017 के दौरान समझौते पर हस्ताक्षर कर उसके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी लेंगे। बातचीत आरंभ होने के पूर्व आयोजन समिति के अनुसार भूमंडलीय ताप वृद्धि को औद्योगीकरण आरंभ होने के समय की तुलना में 2 डिग्री सेल्शियस से कम रखने का लक्ष्य रखा गया। समझौते में शामिल सभी पक्ष तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्शियस से नीचे ही रखने की कोशिश करेंगे।
सम्मेलन आरंभ होने के पूर्व 146 राष्ट्रीय जलवायु पक्षों ने अपने राष्ट्रीय मसौदे पेश किए थे। उनके अनुसार वर्ष 2100 ई. तक भूमंडलीय तापवृद्धि को 2.7 डिग्री सेल्शियस तक सीमित रखने की कोशिश की जाएगी। पेरिस समझौते में कहा गया है कि उस पर हस्ताक्षर करने वाले देश भरपूर कोशिश करेंगे कि इस सदी के मध्य तक तापमान में वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्शियस और गैस उत्सर्जन को शून्य पर ला दिया जाय। सम्मेलन आरंभ होने के पूर्व 146 राष्ट्रीय जलवायु पैनेल्स ने अपने-अपने मसौदे पेश किए थे उनके अनुसार, वे सब इस बात पर सहमत थे कि वर्ष 2100 ई. तक भूमंडलीय तापमान वृद्धि को 2.7 डिग्री सेल्शियस तक सीमित कर दिया जाय। यूरोपीय संघ का सुझाव था कि 1990 की तुलना में 2030 तक गैस उत्सर्जन को 40 प्रतिशत पर ला दिया जाय। पेरिस समझौते के अनुसार वर्ष 2023 से हर पांच साल के बाद इस लक्ष्य के ऊपर पुनर्विचार किया जाय।
प्रतिष्ठित ब्रिटिश साप्ताहिक दी इकॉनामिस्ट का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के लिए मुख्यतया लोग स्वयं जिम्मेदार हैं। यह बहुत खतरनाक बात है। जानकार लोगों के अनुसार वर्ष 1880 के बाद वर्ष 2015 सबसे गर्म होगा और वह वर्ष 2014 के रिकार्ड को तोड़ देगा। वर्तमान दशक का हर वर्ष 1990 के दशक की अपेक्षा गर्म रहा है।
आज वायु टर्बाइन और सौर पैनेल्स पूरे यूरोप, अमेरिका और चीन में जोर-शोर से फैलता जा रहा है फिर भी वे कॉर्बनडाई-ऑक्साइड के उत्सर्जन को रोक पाने में सफल नहीं हो रहे है। दी इकॉनामिस्ट (28 नवम्बर) के अनुसार भूमंडलीय ऊर्जा आज कार्बन आधारित है क्योंकि कोयला पर विश्व की 41 प्रतिशत बिजली और 29 प्रतिशत ऊर्जा आधारित है। पछिले चार दशकों के दौरान कोयले की इतनी बड़ी भूमिका नहीं रही है। औद्योगिक क्रांति के आंरभ होने की तुलना में आज कार्बनडाई ऑक्साइड का उत्सर्जन कहीं अधिक है। यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले चार दशकों के दौरान अनेक विकासशील देशों ने औद्योगीकरण का रास्ता अपनाया है।
पेरिस सम्मेलन के दौरान इकट्ठे हुए राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों ने जोर देकर कहा कि औद्योगिक क्रांति के दिनों की तुलना में 2 डिग्री सेल्शियस गर्म होने के पहले ही गर्मी पर विराम लगा दिया जाना चाहिए। वैसे यह बात वे अनेक वर्षों से कहते आ रहे हैं किन्तु हुआ कुछ भी नहीं है। कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारणों को देखते हुए हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि यह लक्ष्य बिना किसी तर्क के पुख्ता आधार पर मनमाने ढंग से निर्धारित कर दिया गया है। यदि वार्षिक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन वर्तमान स्तर पर ही बना रहे तो भी अगले तीस वर्षों के दौरान वातावरण में इतना गैस उत्सर्जन होगा कि विश्व का तापमान दो डिग्री बढ़ जाएगा।
जलवायु पर अंकुश लगाने के पक्षधर मानते हैं कि उपयुक्त लक्ष्य को लेकर कार्रवाई के लिए आंदोलन चलाया जा सकता है। विश्व के नेताओं पर दबाव बनाया जा सकता है कि वे संभावित खतरे को रोकने के लिए आगे बढ़ें। याद रहे कि वर्तमान धनी एवं औद्योगिक देशों ने अब तक जीवश्म (फोस्साइल) ऊर्जा का इस्तेमाल बेरोकटोक कर अपना औद्योगीकरण किया है। शेष विश्व काफी पीछे धनी औद्योगीकरण के पूर्व युग में रह गया है। वह भी आगे बढऩा चाहता है मगर उस पर तरह-तरह की पाबंदिया लग रही हैं। क्या वे इन्हें मानेंगे?
आज शेष विश्व की प्रगति और औद्योगीकरण के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को विकसित देश हटाने में उनकी मदद करें जिससे उसका भी विकास हो। यदि ऐसा नहीं हो पाता तो विकसित एवं गैरविकसित देशों के बीच टकराव को दूर कर पाना काफी कठिन होगा। विकसित देशों को गैरविकसित देशों की मदद के लिए आगे आना चाहिए जिससे वे कम कार्बन वाली प्रौद्योगिकियों को अपना कर तेजी से आगे बढ़ें। दी इकॉनामिस्ट के अनुसार विकसित देशों की ऊर्जा कंपनियां ऐसा करने को तैयार नहीं दिखतीं। उन्हें लगता है कि वे मनचाहा मुनाफा नहीं कमा पाएंगे। विकसित देश उनको तैयार करा पाने में असफल न•ार आ रहे हैं। ऊर्जा से जुड़ी प्रौद्योगिकियों के विकास और शोध को लेकर पर्याप्त निवेश विकसित देशों की सरकारों द्वारा किया जाना चाहिए। इस प्रकार का निवेश तत्काल खर्चीला है फिर भी तीन बातों को याद रखने की जरूरत है। पहली बात है कि आने वाले समय के दौरान इस निवेश से गंभीर खतरे काफी कम होंगे। तत्काल जलवायु को लेकर काफी खर्च करने पड़ रहे हैं। दीर्घकाल में इसमें कमी आएगी। ध्यान से देखें तो पाएंगे कि वायु एवं सौर तकनीकों पर भारी खर्च के बावजूद उनकी उपलब्धियां सीमित रही हैं। जैवईंधन से एक हद तक अधिक हानि पहुंची है। यह रही दूसरी बात।
तीसरी बात है कि कार्बन उत्सर्जन को घटाने की दिशा में प्रयास से हरित ऊर्जा बढ़ेगी। इससे ऊर्जा के क्षेत्र में किफायतसारी को मदद मिलेगी और कोयला जैसे स्रोतों के इस्तेमाल पर रोक लगेगी। यह काम सब्सिडी के माध्यम से शायद नहीं हो पाएगा। कनाडा जैसे देशों में कार्बन टैक्सों के जरिए कोयला आदि के इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सकी है।
साथ ही नए शोध कार्यों पर जोर दिया जा रहा है कि वे सौर एवं वायु ऊर्जा की दिशा में जाने का मार्ग प्रशस्त करें। कहा जा रहा है कि सौर ऊर्जा पहले की अपेक्षा काफी सस्ता हो गया है। उसको पैदा करने और संचारित करने के ऊपर पहले से कहीं कम खर्च होगा। ऊर्जा को संजो कर रखने पर काफी कम व्यय की संभावना स्पष्ट दिख रही है। अगर ऐसा हो पाता है तो सौर और वायु ऊर्जा का इस्तेमाल जाड़े के मौसम में जब यूरोप तथा अन्यत्र ठंडी शामों को आनन्ददायक बनाने के लिए किया जा सकता है। नई तकनीकों के जरिए ऊर्जा का संचयन भी आसान हो सकेगा। ऊर्जा के क्षेत्र में आणविक (न्यूक्लियर) स्रोतों के इस्तेमाल की दिशा में अनुसंधान की आवश्यकता है। तत्काल कठिनाइयां और खतरे भरपूर हैं। कुछ ही अरसे पहले पूर्व सोवियत संघ में एक भारी हादसा हुआ था। भारत में भी कुछ आणविक पावर हाउस लगे हैं। कतिपय लोग विरोध कर रहे हैं मगर सरकार सावधानियों के साथ आगे बढ़ रही है। इस दिशा में भरपूर शोध एवं अनुसंधान की जरूरत है। आज आणविक पावर हाउस भले ही अधिक खर्चीले और खतरनाक दिखें मगर पूरी सावधानीपूर्वक आगे बढऩे की आवश्यकता है। हमारे जैसे देश को आणविक ऊर्जा स्रोतों को दरकिनार करने के बदले उसे आसान बनाने की दिशा में शोध पर जोर देना चाहिए।
आने वाले दिनों में जलवायु पर पडऩे वाले असर को बहुत कुछ कम नहीं किया जा सकता है क्योंकि ऊर्जा उत्सर्जन को रोक पाना आसान नहीं है। भूमंडलीय तापमान में भी वृद्धि हो सकती है। चीन सहित अन्य धनी देशों ने गरीब देशों का सौ अरब डालर की सहायता प्रतिवर्ष देने का आश्वासन दिया है। वे अत्यधिक गर्मी के बावजूद ऐसी फसलों को उगाने को बढ़ावा देंगे जिससे खाद्यान्न की किल्लत न हो। साथ ही साफ-सफाई और स्वास्थ्य सेवाओं को गरीबों तक पहुंचाएंगे तथा ऊर्जा की उपलब्धता को बढ़ाएंगे।
नए चिंतन के क्षेत्र में इस बात पर भी विचार हो रहा है कि पृथ्वी के तापमान को कैसे कम कर उसे ठंडा बनाने की दिशा में प्रयास हो। कतिपय वैज्ञानिकों का मानना है कि वातावरण में ऐसे तत्वों को मिश्रित किया जाय जिससे सूर्य से आने वाली गर्मी को कम किया जाय। यह कैसे होगा यह हमारे जैसे गैरवैज्ञानिक की समझ से परे है। तत्काल वैज्ञानिक इसको लेकर बहस और शोध कर रहे हैं।
दुनिया के एक बड़े धनाढ्य बिलगेट्स का जोर है कि नई प्रौद्योगिकी का विकास हो जिससे लोगों को सस्ती और विश्वसनीय प्रौद्योगिकी प्राप्त हो और वे अपनी ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा कर सकें। वे नए प्रकार के न्यूक्लीयर रिएक्टर पर जोर दे रहे हैं जिससे फोटोसिंथेसिस के जरिए पानी से और ऊर्जा निकाला जा सके।  उनके अनुसार अमेरिका में ऊर्जा अनुसंधान पर केवल छ: अरब डालर खर्च होता है जो चिकित्सा अनुसंधान पर होने वाले 30 अरब डालर के व्यय से काफी कम है। ऊर्जा कंपनियों को अपना अनुसंधान व्यय बढ़ाना चाहिए।


देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

Deshbandhu के आलेख