चुनावी मैदान में पेशेवरों की भीड़ का निहितार्थ

एच. एल. दुसाध : सोलहवीं लोकसभा चुनाव में फिल्म-मीडिया, शिक्षण, कार्पोरेट, एनजीओ, खेल-कूद इत्यादि गैर-राजनीतिक पेशे से जुड़ी हस्तियों का अभूतपूर्व मात्रा में चुनाव में उतरना राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय बन गया है। ...

एच.एल. दुसाध

सोलहवीं लोकसभा चुनाव में फिल्म-मीडिया, शिक्षण, कार्पोरेट, एनजीओ, खेल-कूद इत्यादि गैर-राजनीतिक पेशे से जुड़ी हस्तियों का अभूतपूर्व मात्रा में चुनाव में उतरना राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चर्चा का विषय बन गया है। ऐसे लोगों को टिकट देने में तृणमूल कांग्रेस सबसे आगे है। टीएमसी ने जहां भारत के मशहूर फुटबॉलर बाईचुंग भूटिया और प्रसून बनर्जी को क्रमश: दार्जिलिंग और हावड़ा से चुनाव में उतारा है, वहीं आज के बंगला फिल्मों के सुपर स्टार देव को घाटाल से टिकट दिया है। देव के साथ ही उसने अतीत के मशहूर फिल्मी सितारे संध्या राय, तापस पाल, विश्वजीत, मुनमुन सेन और रंगकर्मी अर्पिता घोष को क्रमश: मिदनापुर, कृष्णानगर, नई दिल्ली, बांकुड़ा और बालूरघाट से चुनाव में उतारा है। सिर्फ एक्टर और फुटबालर ही नहीं, सिंगरों को भी उसने दिल खोलकर टिकट दिया है। इनमें  इन्द्रनील सेन जहां बहरामपुर से चुनाव लड़ रहे हैं, वहीं लोकगायक सौमित्र राय मालदह (उ.)से भाग्य आजमा रहे हैं। खेल और फिल्म जगत के अतिरिक्त टीएमसी ने अन्य पेशे से जुड़े लोगों को भी टिकट दिया है, जिनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय नाम सुगाता बोस का है। सुगाता प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी सुभाषचन्द्र बोस के पोते और अमेरिका के हार्वर्ड जैसे विश्वप्रसिद्ध यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक हैं।
गैर-राजनीतिक पेशेवरों को चुनाव में उतारने में भाजपा भी टीएमसी से बहुत पीछे नहीं है। वैसे तो भाजपा बहुत पहले से ही नवजोत सिंह सिद्धू, चेतन चौहान, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा, हेमा-धर्मेन्द्र, स्मृति ईरानी जैसे क्रिकेटरों और एक्टरों पर सफल दांव खेलती रही है, किन्तु इस बार उसने पुराने सितारों के साथ जयपुर देहात से ओलम्पिक पदक विजेता  राजवद्र्धन सिंह राठौर,पूर्वी दिल्ली से मनोज तिवारी, चंडीगढ़ से किरण खेर, यादवपुर से भप्पी लाहिड़ी, बारासात से सुप्रसिद्ध जादूगर पीसी सरकार, अहमदाबाद (पू.) से एक्टर परेश रावल, हावड़ा से एक्टर जार्ज बेकर, आसनसोल से गायक बाबुल सुप्रियो को चुनावी मैदान में उतारा है। बहरहाल ये तो वे सितारे हैं जिनके जीतने की भारी सम्भावना है। किन्तु हार-जीत से परे यदि सिर्फ प्रार्थियों की संख्या देखी जाय तो एनजीओ गैंग की पार्टी (आप)सबको पीछे छोड़ दी है। उसने मेधा पाटकर, राजमोहन गाँधी, प्रो.आनंदकुमार, गुलपनाग, जावेद जाफरी, आशुतोष, मीरा सान्याल, आदर्श शास्त्री इत्यादि जैसे ढेरों पेशेवरों को चुनाव में उतार दिया है। टीएमसी, बीजेपी, आप के अतिरिक्त कांग्रेस, मनसे, बीजद इत्यादि ने भी गैर-राजनीतिक पेशेवरों को टिकट दिया है, जिसके चलते एक्टर महेश मांजरेकर, क्रिकेटर अजहरुद्दीन-मो.कैफ, हॉकी खिलाड़ी दिलीप टिर्की, नगमा व अन्य कई को संसद का चुनाव लडऩे का अवसर मिला है।
बहरहाल पेशेवर लोगों का राजनीति से जुडऩा कोई नई परिघटना नहीं है। भारतीय राजनीति को अपने कृतित्व से धन्य करने वाले मोहनदास गाँधी, डॉ. बी.आर. आंबेडकर, मोतीलाल व जवाहरलाल नेहरु, सरदार पटेल, सुभाषचन्द्र बोस, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, मोरारजी देसाई, जय प्रकाश नारायण, मौलाना आ•ााद इत्यादि असंख्य लोगों ने वकालत, प्रशासनिक सेवा, लेखन इत्यादि पेशों में भारी संभावना को ठुकराकर पूर्णकालिक तौर पर राजनीति में आने का निर्णय लिया था। किन्तु सोलहवीं लोकसभा चुनाव में मुख्यधारा के राजनीतिक दलों द्वारा खेलकूद, फिल्म-मीडिया, कार्पोरेट, एनजीओ जगत के पेशेवरों को भूरि-भूरि मात्रा में राजनीति में उतारना एक सर्वथा भिन्न परिघटना है जिसके प्रति मुख्यधारा के बुद्धिजीवियों द्वारा स्वागत भाव प्रदर्शित किया जा रहा है। किन्तु बहुजन बुद्धिजीवियों में इसे लेकर विद्रूप भाव है। कारण, उन्हें लगता है यह सवर्णों द्वारा उस जाति चेतना के राजनीति की काट के लिए बेबसी में उठाया गया एक और कदम है। जहां तक जाति चेतना का सवाल है, हर हिन्दू में ही बराबर क्रियाशील रही है। किन्तु यह कांशीराम थे जिन्होंने शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-आर्थिक)से वंचित दलित-पिछड़ों की जाति चेतना को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की परिकल्पना की। मंडल उत्तरकाल में बहुजनों की जाति चेतना में आए गुणात्मक उछाल के फलस्वरूप शक्ति के एक अन्यतम प्रमुख स्रोत, राजनीति में गैर-बराबरी का खात्मा हो गया। इस क्षेत्र में आ•ााद भारत में भी जिन सवर्णों का अपनी संख्यानुपात से कई गुना वर्चस्व था, वे अपनी संख्यानुपात पर सिमटने के लिए बाध्य हुए। इस कारण ग्राम पंचायत, शहरी निकाय, संसद और विधानसभा सर्वत्र ही दलित, पिछड़ों की संख्या गरिष्ठता न•ार आने लगी। जिन दलों में ब्राह्मणों को छोड़कर किसी अन्य जाति के अध्यक्ष बनने की कल्पना नहीं की जा सकती, वे जाति चेतना के राजनीतिकरण के चलते दलित-पिछड़ों को अध्यक्ष बनाने लगे। जाति चेतना से मिली शक्ति के कारण माया-मुलायम, लालू-पासवान इत्यादि राजनीति में सुपर स्टार की हैसियत का उपभोग करने लगे। बहुजनों की जाति चेतना ने स्वतंत्र सवर्ण राजनीति को हाशिये पर पहुंचा दिया। बहरहाल, मंडल के बाद शासक जातियों द्वारा जाति चेतना के काट का लगातार प्रयास होता रहा, जिसकी शुरुआत संघ परिवार की ओर से हुई।
संघ परिवार ने बहुजनों की जाति चेतना की काट के लिए धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण का अभियान चलाया। इस क्रम में राष्ट्र की बेशुमार संपदा और असंख्य लोगों की प्राण-हानि के जरिये भाजपा सत्ता में आई तथा कांग्रेस का विकल्प जरूर बनी, पर जाति चेतना का प्रभाव बढ़ता ही गया। इस प्रभाव को म्लान करने के लिए बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा भी भारी प्रयास हुए, पर सब व्यर्थ रहा। जाति चेतना के असर को कम करने के लिए अदालतें भी सक्रिय हुईं और जाति-रैलियों पर रोक लगाने जैसे कई आदेश जारी कीं, पर कोई असर नहीं हुआ।
जाति चेतना के शमन के हर प्रयास को व्यर्थ होते देख एनजीओ गैंग ने एक अलग तरीका अपनाया। उन्होंने घोषित तौर पर भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर इसके खात्मे के लिए जनलोकपाल लागू करवाने के लिए अभूतपूर्व आन्दोलन छेड़ा। जनलोकपाल का घोषित लक्ष्य भ्रष्टाचार का खात्मा जरूर था। किन्तु सच्चाई यह है कि इसका असल लक्ष्य जाति चेतना से पुष्ट बहुजन प्रधान राजनीति पर सुपर कंट्रोल स्थापित करना था। एनजीओ गैंग ने जनलोकपाल की जैसी परिकल्पना की थी उसमें निर्वाचित पीएम/सीएम की हैसियत ऐसे पुतले जैसी हो जाती जिसकी डोर गैर-निर्वाचित सवर्ण लोकपाल/लोकायुक्त के हाथ में रहती। इस गैंग ने सिर्फ बहुजन-प्रधान राजनीति पर सुपर कंट्रोल कायम करने की ही परिकल्पना नहीं की, बल्कि दिल्ली की सत्ता में आकर उन्होंने जाति चेतना की राजनीति को कमजोर करने के लिए एक और काम किया और वह था पारम्परिक राजनीति के खिलाडिय़ों को लोगों की न•ारों में गिराने का अभियान। कहना न होगा आम आदमी पार्टी ने डेढ़-दो महीने सत्ता में रहने के दौरान नेताओं के लिए जो मानक बनाये उसमें पाम्परिक छवि के नेता राजनीति के लिए मिसफिट हो गए। अब आदर्श नेता एनजीओ, कार्पोरेट, फिल्म, मीडिया, खेलकूद इत्यादि से जुड़े पेशेवर ही हो सकते थे। चूंकि ऐसे पेशेवर दलित-पिछड़ी जातियों में दुर्लभ हैं इसलिए आप और उसके समर्थक मीडिया ने अधिक से अधिक पेशेवरों को  राजनीति में आने के लिए उर्वरक जमीन तैयार करने में सर्वशक्ति लगाया। जाति चेतना की काट के लिए 'आपÓ का यह फार्मूला अन्य सवर्णवादी दलों को भी मुफीद लगा इसलिए उन्होंने पेशेवरों को चुनाव में उतारने में उससे होड़ लगाना शुरू किया। फलस्वरूप सोलहवीं लोकसभा चुनाव में पेशेवरों की अभूतपूर्व भीड़ जमा हो गई। सेलेब्रेटी पेशेवरों का सम्मोहन निश्चय जाति की दीवार ढहाने में सहायक होगा। ऐसे में अगर इनमें से भारी मात्रा में लोग संसद में पहुंचते हैं तो अगले लोकसभा/विधानसभा चुनावों से इस भीड़ में इजाफा होते जायेगा। फिर तो उसके साथ जाति चेतना के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने वालों की नैया डूबती चली जाएगी और शक्ति के स्रोतों में बहुजनों के हिस्सेदारी की लड़ाई भी कमजोर पड़ती जायेगी। कहना न होगा भीषण आर्थिक और सामाजिक विषमता के चलते पहले से ही संकटग्रस्त भारतीय लोकतंत्र और संकटग्रस्त हो जायेगा। ऐसे में भारतीय राजनीति पर पेशेवरों का वर्चस्व रोकने में लोकतंत्रप्रेमी  बहुजनों अपनी सर्वशक्ति लगानी चाहिए।         
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)   

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