गुजरात और सांप्रदायिकता

गिरीश मिश्र : गोधरा और उसके बाद की घटनाओं ने सिर्फ गुजरात बल्कि सारे देश को हिला दिया है। उसने दशकों से चली आ रही मान्यताओं पर गंभीर शंकाएं पैदा कर दी हैं।...

डॉ. गिरीश मिश्र

गोधरा और उसके बाद की घटनाओं ने सिर्फ गुजरात बल्कि सारे देश को हिला दिया है। उसने दशकों से चली आ रही मान्यताओं पर गंभीर शंकाएं पैदा कर दी हैं।
कहते हैं कि आधुनिक काल में सबसे पहले गुजराती कारोबारी ही बाहर गए और उन्होंने अपना कारोबार फैलाया। मारवाड़ी उनसे काफी बाद बाहर गए। उनका ध्यान मुख्यतया भारत पर ही रहा। ऐतिहासिक साक्ष्य बतलाते हैं कि 1863 ई. में बारह वर्षीय अल्लीदीना विश्राम कच्छ से पूर्वी अफ्रीकी तट जंजीबार पहुंचे। वे क्यों और कैसे गए, यह स्पष्ट नहीं है। लगभग चौदह वर्षों बाद उन्होंने अपनी खुद की दुकान खोली और आगे चलकर केन्या से उगांडा तक विभिन्न जगहों पर रेल लाइन के किनारे 19वीं सदी के उत्तराद्र्ध के बाद दुकानें शुरु कीं। उनका मकसद रेल निर्माण में लगे कर्मियों को उपभोग की आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराना रहा। बाद में विक्टोरिया झील के आसपास उन्होंने कई दुकानें खोलीं।
इस क्रम में उनके साथ एक अन्य गुजराती विठ्ठलदास हरिदास जुड़े जो वहां 1893ई. में पहुंचे थे। कहते हैं कि विठ्ठल भाई काफी दु:साहसिक थे। वे जंगल से गुजरते हुए इगांगा नामक एक छोटे से शहर में पहुंचे और उन्होंने अपना कारोबार शुरु किया। उनकी देखा-देखी अनेक गुजराती वहां पहुंचे और अपना कारोबार आरंभ किया।
ध्यार रहे कि गुजरातियों के बीच सांप्रदायिकता दूर-दूर तक नहीं दिखी। महात्मा गांधी को अफ्रीका ले जाने वाले गुजराती मुसलमान ही थे। वे अपने कारोबार से जुड़े मामलों में कानूनी सलाह देने और मुकदमों को लडऩे के लिए उन्हें ले गए थे।
कहते हैं कि दूरी और सर्दी-गर्मी से गुजराती कभी विचलित नहीं हुए। आज दुनिया के हर हिस्से में गुजराती फैले हुए हैं। कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, उगांडा, म्यांमार आदि देशों में वहां की अर्थव्यवस्थाओं में वे अहम् भूमिका निभा रहे हैं। अमेरिका को ही लें। वहां के एक तिहाई होटल और मोटल आज गुजरातियों द्वारा संचालित हैं। यही बात बहुत कुछ कनाडा पर भी लागू होती है। कहीं भी जाएं वहां गुजराती छोटी-मोटी दुकानों से लेकर बड़े, व्यवसायों में कार्यरत् दिखेंगे। कहते हैं कि यहूदियों, चीनियों, अंग्रेजों आदि की तरह ही गुजरातियों ने एक शानदार भूमंडलीय वाणिज्यिक समूह बना रखा है। अनुमान है कि भारत में गुजराती मूल के लोगों की संख्या लगभग छ: करोड़ 30 लाख है जब कि देश से बाहर 30 लाख से 90 लाख लोग हैं। कहना न होगा कि उन्होंने व्यवसाय के साथ ही डॉक्टर और वकील के रूप में काफी शोहरत कमाई है। अनेक विकसित देशों में वे काफी प्रभावकारी हैसियत रखते हैं।
अमेरिका में गुजराती बड़ी संख्या में 1960 के बाद पहुंचने शुरु हुए हैं। किसी भी दिशा में देखें कहीं-न-कहीं पटेल समुदाय के लोग जरूर मिलेंगे। अमेरिका में कार्यरत् दवा की दुकानों में से लगभग आधे पर उनका नियंत्रण है। इसी प्रकार ब्रिटेन की दवा की दुकानों की सबसे बड़ी शृंृखला 'डे लिविसÓ पर उनका नियंत्रण है। गुजरात से डॉक्टरी की परीक्षा पास करने के बाद वहां के वाशिंदे उच्च शिक्षा अमेरिका में प्राप्त करने के बाद ही अपना निजी प्रैक्टिस भी शुरु कर देते हंै। वे अपने व्यवसाय में अन्य डॉक्टरों को शामिल कर चिकित्सालय चलाने लगते हैं। अनेक लोगों का मानना है कि गुजराती स्वतंत्र रूप से अपना व्यवसाय चलाना चाहते हैं न कि अन्य भारतीयों की तरह दूसरों के अधीन नौकरी करना पसंद करते हैं। किसी बड़ी कंपनी में किसी अन्य के अधीन काम करने के बदले वे अपनी खुद की दुकान, भले ही वह छोटी हो, चलाना पसंद करते हैं। भारतीय मूल के अमेरिकी लोगों की संख्या सिलिकन घाटी में नए व्यवसायों को आरंभ करने वालों में करीब एक चौथाई है और उनमें भी एक चौथाई गुजराती हैं। दुनिया में उनका सबसे अधिक दबदबा हीरे के व्यवसाय पर है। गुजरात के सूरत शहर में हीरों की कटाई और पॉलिश करने का काम होता है। एक तरह से कहिए तो वहां गुजरातियों का आधिपत्य है और वे लगभग 13 अरब डॉलर का धंधा चलाते हैं बेल्जियम के शहर ऐंट वर्ष के हीरा उद्योग की  लगभग तीन चौथाई पर गुजराती ही काबिज हैं। कहते हैं कि गुजरात के पालनपुर से ही हीरा व्यवसायी आते हैं।
देश के तीन सबसे बड़े व्यवसायी-अंबानी, दिलीप सांधवी और अजीम प्रेमजी गुजराती हैं। पिछली शताब्दी में सबसे बड़े उद्योगपति अंबालाल साराभाई थे जिनका राष्ट्रीय आंदोलन में काफी योगदान था। इसी परिवार के विक्रम साराभाई ने विज्ञान जगत में काफी नाम कमाया था। दी इकॉनामिस्ट के अनुसार मात्र पांच प्रतिशत मजदूर गुजरात की देश के 22 प्रतिशत निर्यात कमाई के लिए जिम्मेदार हैं।
सूती कपड़ा उद्योग भले ही समाप्त हो गया है मगर अहमदाबाद और सूरत का दबदबा आज भी भारत के संश्लिष्ट कपड़ा उद्योग पर कायम है। अहमदाबाद आज भी डेनिम उद्योग और दवा उद्योग का बड़ा केन्द्र है। राज्य की कमाई इतनी अधिक है कि वहां अच्छी सड़कें बनाने में पैसे की कमी आड़े नहीं आती। समुद्र तट पर स्थित होने के साथ ही वहां अच्छे बंदरगाह हैं जिससे पुराने जमाने से ही उसको विदेश व्यापार में महारत हासिल है। कहते हैं कि मुसलमान देशों और इस्लाम के संपर्क में आने से अनेक हिन्दू मुसलमान बन गए और कई लोगों का मानना है कि वे ही बोहरा, खोजा और मेमन बन गए हैं। इस प्रकार समुद्र पार करने के हिन्दू प्रतिबंध से मुक्त हो गए।
कालक्रम में अनेक कारणों से व्यवसायियों का एक नया समूह-महाजन उभरा जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही शामिल थे। यदि पीछे मुड़ कर देखें तो पाएंगे कि जैनियों की इस समूह में भारी भूमिका रही है। जैन धर्म का उदय वाराणसी और बिहार में हुआ अधिक दिखा। उन्होंने व्यापार और मौद्रिक लेन-देन को अपनाया क्योंकि वे कीड़े-मकोड़ों को मार नहीं सकते थे इसलिए खेती-बाड़ी से दूर रहे। व्यापार और मौद्रिक लेन-देन में दिलचस्पी अधिक होने के कारण महाजन दुनिया भर में फैले जिससे स्वदेश में अकाल, फ्लेग और हैजा जैसी बीमारियों से वे काफी हद तक मुक्त रहे।
बाहर जाने के क्रम में उन्हें अनेक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा। एक जमाने में उगांडा में वे अंग्रेजों के काफी करीब माने जाते थे मगर वहां 1972 में इदी अमीन के शासनाध्यक्ष बनने पर उनका उत्पीडऩ शुरु हो गया और उन्हें भागकर ब्रिटेन जाना पड़ा। इसी तरह उन्हें म्यांमार भी छोडऩा पड़ा। कहते हैं कि उगांडा का जो भी नुकसान हुआ ब्रिटेन को काफी बड़ा फायदा हुआ। लगभग 27,000 शरणार्थी जिनमें सबसे अधिक गुजराती थे ब्रिटेन पहुंचे। जहां पहुंचकर उन्होंने अपने कौशल से उद्योग-धंधों की शुरुआत की और तरह-तरह के व्यवसाय आरंभ किए। इदी अमीन के सत्ताच्युत होने के बाद मुसेवेनी उगांडा के नए राष्ट्रपति बने और उन्होंने ब्रिटेन आकर निर्वासित गुजरातियों की चिरौरी की कि वे फिर से उगांडा लौटें उनका उत्पीडऩ न करने की गारंटी दी मगर उन्होंने वापस जाने से मना कर दिया।
ब्रिटेन स्थित गुजरातियों ने उगांडा से आने वाले अपने बंधुओं की मदद करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। उनमें से एक ने अपने तीन कमरे के मकान में 25 गुजराती शरणाथियों के रहने की व्यवस्था की। पोपट नामक उस व्यक्ति ने रात में पढ़ाई करने के साथ ही दिन में पोस्ट ऑफिस में नौकरी कर तीन साल के बाद एक वित्तीय कंपनी स्थापित की और उनके साथ अनेक गुजराती जुड़े जिनकी मदद उसने पैसों से की और वे कारोबार करने लगे।
अब वे ही गुजराती भारत में हों या विदेश में, सांप्रदायिकता के शिकार बनते जा रहे हैं। उनके बीच पहले जैसा सौहाद्र्र नहीं रह गया है। गुजरात में कांग्रेस के विभाजन के बाद कई ऐसे नेता पनपे जिन्होंने सांप्रदायिकता को पनपाने में चाहे-अनचाहे भारी योगदान किया। ऐसे ही लोगों में मोरारजी देसाई थे। उनका कांग्रेस से संबंध-विच्छेद हो गया और उन्होंने अपनी नई पार्टी बनाई और कालक्रम में वे भारतीय जनसंघ (बाद में भारतीय जनता पार्टी) की मदद लेकर आगे बढ़े। उन्होंने जनता पार्टी का निर्माण किया जिसमें शामिल जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी मंत्रिपद पर बैठे। उन्हें एक नई प्रतिष्ठा प्राप्त हुई और गांधी-हत्या में उनकी मातृसंस्था के शामिल होने की बात को लोग भूल गए। कालक्रम में मोरारजी देसाई की पार्टी-जनता पार्टी धराशायी हो गई मगर जनसंघ के लोग नई प्रतिष्ठा और नई ऊर्जा के साथ बाहर आकर भारतीय जनता पार्टी को लेकर आगे बढ़े और आगे ही बढ़ते जा रहे हैं।
कहना न होगा कि कांग्रेस के अंध-विरोध के कारण ही मोरारजी देसाई हों या चरणसिंह, या फिर वामपंथी, भाजपा को आगे बढ़ाने में सहायक बने। वे इंदिरा गांधी के अंध-विरोध से इतने भ्रमित हुए कि अपना मकसद ही भूल गए।
उधर गुजरातवासियों के बीच हिन्दू-मुसलमान के नाम पर वैमनस्य बढ़ा और उनका समाज विभाजित हो गया। इस विभाजन ने उनके रुख या नजरिए को ऐसे बदल दिया कि वे एक-दूसरे को संदेह की नजर से देखने लगे। अब संदेह की नजर जितनी गहरी हो गई है क्या उसे मिटाया जा सकता है? यह काम काफी कठिन है क्योंकि हिन्दू- मुसलमान वैमनस्य का लाभ उठाकर जो लोग और पार्टियां आगे बढ़ी हैं वे उसे कैसे मिटने देंगी? दी इकॉनामिस्ट ने सवाल उठाया है कि क्या गुजराती पहले की तरह ही भूमंडलीय स्तर पर सफलता के रास्ते पर बढ़ सकेंगे? इस शताब्दी के आरंभ में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच संदेह और वैमनस्य क्या दब पाएगा?


 

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