क्या सीखते हैं हम पर्वों से

योगेश मिश्र : हमारी संस्कृति का ताना बाना बुनते समय हमारे पुरखों ने ढ़ेर सारे पर्व बनाए। ये पर्व महज उत्सव नहीं है। ये पर्व महज रस्म नहीं है। ...

योगेश मिश्र
योगेश मिश्र

हमारी संस्कृति का ताना बाना बुनते समय हमारे पुरखों ने ढ़ेर सारे पर्व बनाए। ये पर्व महज उत्सव नहीं है। ये पर्व महज रस्म नहीं है। इन पर्वों में तमाम संदेश हैं। यह हमें साथ जीने, साथ रहने साथ चलने की कला सिखाते हैं। यह भी बताते हैं कि आप हम सतर्क भी रहें। क्योंकि हर पर्व के उत्सव में उत्सव से धीरे-धीरे कई विसंतगितां उपजीं। होली में रंग केमिकल लिहाज त्वचा खराब करने लगे। दीवाली में मनोविनोद के लिए खेला जाने द्युत क्रीडा जुआ बनकर लोगों की जिंदगी तक खऱाब करने लगा है। पटाखों की रौशनी पहले शोर और अब प्रदूषण में तब्दील हो गई। गले मिलने की रस्म वाली ईद को कुछ लोग पहले सियासत और अब फसाद का सबब बनाने लगे हैं।
ये सारे पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत की वजह से मनाए जाते हैं पर मूल्यों के बदलाव के दौर में जब समूचा पश्चिम अपने घटाटोप, अंधेरे और धुर भौतिकवाद के साथ पूरब में आया तो हमारे इन उत्सवों के मूल्य मानदंड और संदेश ही नहीं बदले हनारे जीवन में भी ऐसे ही बदलाव हुए। इन्हीं बदलावों की देन है कि हम अब पूरब के भाववाद को तिरोहित करके भौतिकवाद के लिए वह सब कर रहे हैं जिसकी इजाजत धर्म और समाज नहीं देता। कोई महापुरुष नहीं देता है। ये पर्व नहीं देते।
मूल्यों के विचलन का ही नतीजा है कि हमने अपने साथ लोगों को जोडऩे और तोडऩे के तमाम नियम बदल दिए । उन्हें स्वहितपोषी बना लिया है।  यह जानते हुए भी कि केर-बेर के संग निभते नहीं कुछ इसी बदलाव का, कुछ इसी विचलन का नतीजा है तमाम मामलो में हमारे सांसदों के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग कटघरे में खड़े दिखते हैं। किसी सांसद का बेटा हथियार की तस्करी की जद में आ जाता है। कोई नामचीन परिवार का सांसद अपने ही हथियार डीलर दोस्त को महत्वपूर्ण सूचनाएं देने की जद में आ जाता है। इस खुलासे के बाद राष्ट्रवाद की दुहाई देने वाली पार्टी सकते में आ जाती है। अपने कारनामे के चलते सीबीआई की जद सांसदों का आना आम बात है। माननीय बनने के लिए बाहुबली, धनबली होना अपरिहार्य हो गया है।
समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद चौधरी मुनव्वर सलीम के पीए फऱहत खान का पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के खुलासे ने इस विचलन और अधोपतन के उस शिखर को दिगंबर किया है जहां से विरोध के स्वर तेज होने की उम्मीदें उठने लगी हैं। तकरीबन 18 साल से यह काम कर रहा फरहत पेट्रोलियम, मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, गृहमंत्रालय के दस्तावेज समेत तमाम संवेदनशील कागजात पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के सुपुर्द कर चुका है। महज 25-30 हजार की मु_ी भर धनराशि के सामने अपने ईमान, सांसद के सम्मान और देश के स्वाभिमान के साथ तिजारत करने वाला फरहत चार सांसदों का साथ काम कर चुका है। मूलरुप से मध्य प्रदेश के रहने वाले मुनव्वर सलीम उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद हैं। पत्रकारिता और सियासत की दोहरी पारी खेलने वाले सासंद मुनव्वर दिनकर अखबार में 1988 से संपादक है। यह उनका अपना अखबार है। मुनव्वर यूं तो 1977 से राजनीति मे सक्रिय हैं। वह 1977 में युवा जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष थे वहीं मध्यप्रदेश के युवा लोकदल के महासचिव वह 1980 में बने।  जनता दल बनने के बाद वह जनता दल युवा प्रकोष्ठ के महासचिव 1989-91 तक रहे। वहीं राष्ट्रीय सचिव के तौर पर समाजवादी पार्टी में वह 1994-2009 तक रहे। मुनव्वर सलीम की इस बार की पारी का श्रेय अपने बयानों से विवाद खड़े कर पहचान बनाने वाले आजम खां को जाता है।
मुनव्वर की सांसद निधि की पूरी धनराशि आज़म खां के जिले रामपुर में खर्च होती है। समाजवादी पार्टी मे उनकी कोई खास पहुंच न होने के बाद भी सिर्फ आज़म के कहने पर राज्यसभा सदस्य बनने में जब मुनव्वर सलीम कामयाब हुए थे तो लोगों की आंखे आश्चर्य से खुली रह गयी थीं। शामली जिले के तीन कमरों के मकान में रहने वाले फरहत खान पर भी आजम खान की नजरे इनायत रहीं हैं। शायद इसीलिए वह सूबे के नगर विकास विभाग, जिसके मंत्री आजम खां हैं, में फरहत नामित पार्षद बनने में कामयाब हो गया । कैराना नगरपालिका में उसके नामित सभासद बनने का स्थानीय लोगों ने विरोध भी किया था पर उसकी ऊंची पहुंच के चलते विरोध की आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह गयी। फरहत की सियासी पहुंच का ही तकाजा है कि जिला वक्फ बोर्ड की सब कमेटी की चेयरमैनशिप भी उसके हाथ है। रामपुर में आजम खान के कई कार्यकर्मों में फरहत देखा गया है। वह सुन्नी सेंट्रल बोर्ड का शामली जिलाध्यक्ष भी है।
कोई आदमी अगर पासपोर्ट बनवाने भी जाता है तो उसकी भारी भरकम जांच होती है। आपको कोई अखबार अथवा चैनल शुरु करना हो तो भी जांच की जद  से गुजरना होगा। लेकिन हैरत यह है कि मुनव्वर सलीम समेत सभी चार सांसदों ने इस पद पर रखने के लिए ऐसे किसी जांच की जरुरत क्यों नहीं समझी। हालांकि सलीम की ओर से यह दावा किया गया है कि राज्यसभा सचिवालय और पुलिस के सत्यापन के बाद फरहत को पीए के पद पर उन्होंने रखा। अगर इसे सच ही मान लिया जाय तो क्या इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति के साथ छाया की तरह रहने वाले शख्स की निगरानी जांच एजेंसियां इतनी ढुलमुल ढंग से करती है यह सत्य जांच एजेंसियों का एक ऐसा पक्ष खोलता है जो हममें इनके प्रति अविश्वास भरता है।  
आपसी मनमुटाव, तल्खी, रागद्वेष और वर्चस्व की लड़ाई लड़ रही समाजवादी पार्टी के लिए यह एक अभिशाप भरी खबर हो सकती है। बात-बात पर विवाद खड़ा करने वाले आजम खान को भले ही यह कीचड़ उछालने का सबब नजर आए पर अपने मनपसंद स्टाफ, मनपसंद गाड़ी, मनपंसद बंगला, मनपसंद प्रस्ताव चुनने का एकाधिकार बनाए रखने वाले आजम खान मुनव्वर सलीम तो छोडि़ए फरहत को करीब आने का मौका क्यों दे गये यह उनके लिए भाद्रपद के चौथ के चांद (चौकचंदा) देखने जैसा है।
तमाम औद्योगिक घरानों के लिए मंत्रालयों के दस्तावेज लीक करने, औद्योगिक घरानों के लिए काम करने उनके लिए नीतिया बनवाने और बदलने का अभिशाप झेल रहे माननीयों के लिए यह घटना हो सकता है आंख खोलने वाली हो। हो सकता है इसके बाद सभी सांसद अपने पीए और आसपास के लोगों का परीक्षण और पड़ताल शुरु कर दें। हो सकता है सफाई अभियान चल पडे। जिस तरह मुनव्वर सलीम यह कह रहे हैं कि उनके या उनके परिवार की तनिक भी संलिप्तता पाई गयी तो वह सपरिवार आत्महत्या कर लेंगे। सलीम की इस भावना की कद्र की जानी चाहिए क्योंकि बहुत सालों के बाद ऐसा हुआ है कि किसी मामले में फंसने के बाद किसी ने यह नहीं कहा कि उन्हें एक धर्म विशेष का होने के नाते फंसाया गया है। आमतौर पर धर्म ऐसा मामलों में हथियार और ढाल बना दिया जाता था। सलीम ने ऐसा नहीं किया है।
यह जरुर पर्वों से निकले संदेश को ठीक-ठीक ग्रहण करना जा सकता है, पर हकीकत यह भी है कि फरहत सिर्फ व्यक्ति नहीं है। एक संस्था है वह भी ऐसी संस्था जो आमतौर पर दिल्ली पहुंचने वाले पहली बार के सांसदों के इर्द-गिर्द ऐसी मकडज़ाल बना लेती है कि सांसद उसके इशारों पर काम करने लगते है। पीए सासंदों को काम के लिए लाइजन के लिए जरुरी होते हैं। कई सासंदों के तो सारे काम इन्हीं पीए सरीखे लाइजन अफसरों के हवाले होते हैं। इनकी तैनाती में सिर्फ यह देखा जाता है कि वह उस राज्य उस धर्म , उस जाति का है या नहीं जिसका सांसद है या नहीं। बाकी कोई योग्यता अनिवार्य या ऐच्छिक नहीं होती।
मोदी सरकार के पहले तक की सरकारो में ऐसे निर्णायक तत्वों की सूची हर मंत्रालयों के लोगों की जुबान पर चढ़ी रहती थी। काली कमाई के भी ये बड़े स्त्रोत हैं। इन सांसदों के तमाम काम इनके नाम ही होते हैं। इस खुलासे ने दिवाली काली कर दी। पर्व के संदेश बदल दिए। बदलाव और अधोपतन के शिखर दिगंबर कर दिए। बस यह शेष रह गया है कि कौन और कितने लोग इसमें सफाई देने के लिए कब-कब कैसे-कैसे सामने आते हैं। किसके चेहरे किन रंगों से पुते आते हैं। कौन दीपक की बाती की तरह ऐसे अंधेरों से लड़ता नजर आता है। यही भूमिकाएं तय करेंगी हम, आप, हमारे प्रतिनिधि और सरकार देश और समाज को किस दिशा में ले जाएंगी। हम पर्वों से क्या सीखते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


 

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