क्या भारत को पाकिस्तान बांट रहा है?

कुलदीप नैय्यर : गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि पाकिस्तान भारत को फिर धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश कर रहा है। वह इतिहास को आसानी से भूल रहे हैं। पाकिस्तान कारण नहीं, नतीजा है।...

कुलदीप नैय्यर

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि पाकिस्तान भारत को फिर धर्म  के आधार पर बांटने की कोशिश कर रहा है। वह इतिहास को आसानी से भूल रहे हैं। पाकिस्तान कारण नहीं, नतीजा है। समाज बंटा हुआ था और हिंदू और मुसलमान, दोनों ऐसे मुकाम पर पंहुच गए थे जहां से वापस नहीं आ सकते थे।  नतीजा हुआ कि उन्होंने अपने को दो अलग खेमों में बांट लिया जिनका आपस में बहुत कम संपर्क था।
सच है कि मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग एक अलग स्वतंत्र राज्य चाहता था, लेकिन एक ऐसा समय था जब जिन्ना ने कैबिनेट मिशन प्लान स्वीकार कर लिया था जिसने केंद्र को तीन विषय दिए थे- रक्षा, विदेश और संचार। यह जवाहर लाल नेहरू थे जिन्होंने कहा कि संविधान सभा कुछ भी बदलाव ला सकती है।  इसके कारण जिन्ना कैबिनेट मिशन प्लान से पीछे हट गए और उन्होंने खुले तौर पर कहा कि वह कांग्रेस, जो भारत की एकता का प्रतिनिधित्व करती थी, पर ‘भरोसा’ नहीं करते।
राजनाथ सिंह अपनी भारतीय जनता पार्टी के हिंदू राष्ट्र बनाने के एजेंडे को बदलें तो बेहतर हो। इसे वह एक बदले की भावना के साथ अमल में ला रही है। केंद्र में सत्ता आने के बाद भाजपा ने अपने मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ के आदेश पर महत्वपूर्ण संस्थानों के प्रमुखों को बदल दिया है।
यहां तक कि जवाहर लाल नेहरू, स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतिनिधत्व करने वाले एक प्रतीक, की शिक्षाओं को अपने भीतर संजोकर रखने वाले नेहरू सेटर को बुरी तरह उलट-पलट कर दिया गया है। इसके मुख्य प्रशासक सतीश साहनी आरएसएस के पक्के अनुयायी हैं। पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट के छात्र उस समय से झेल रहे हैं जब से गजेंद्र चौहान को वहां का प्रमुख बनाया गया है। किसी भी तरह का विरोध सरकार को तरस खाने को मजबूर नहीं कर पाया। दूसरे संस्थानों में भी जो नियुक्तियां हुई हैं, उनमें भी यही तरीका अपनाया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीति संबंधी कोई ऐसा फैसला नहीं किया है जिसमें हिंदुत्व के दर्शन की झलक मिले। लेकिन भाषण और कार्यों में वह दक्षिणपंथ की ओर तेजी से मुड़ते दिखाई देते हैं। प्रधानमंत्री कहें या न कहें, समाज में नरम हिंदुत्व का लेप लगा है। आखिरकार देश ने लोकसभा में उन्हें पूर्ण बहुमत देकर भेजा है और वह पार्टी के एजेंडे को पूरा कर रहे हैं। मुसलमान जो 17 करोड़ से ज्यादा हैं, सरकारी मामलों में शायद ही किसी गिनती में हैं। सरकार में सिर्फ  एक कैबिनेट स्तर का मंत्री है,  वह भी एक महत्वहीन विभाग संभालता है। समुदाय अब अपनी मांगों को नहीं रखता है क्योंकि इसने अपना दोयम दर्जा स्वीकार कर लिया है। वास्तव में, देश के बंटवारे के लिए अपने को दोष देकर यह बचाव की शक्ल में है।
एक बार मैंने दिल्ली के जामिया मिलिया के  एक मुस्लिम विद्वान से पूछा कि उनका समुदाय साफ तौर पर खामोश क्यों दिखाई देता है? उन्होंने कहा कि अब यह सिर्फ  अपनी जान-माल की हिफाजत चाहता है और समझ गया है कि बहुसंख्यक समुदाय देश के प्रति उसकी वफादारी पर शक करता है। उन्होंने कहा कि मुसलमान इसे लेकर सचेत हैं कि देश के विभाजन के पीछे वही थे और अगर वे कुछ और ज्यादा मांगेंगे  तो उन पर अविश्वास किया जाएगा।
शहीद दिवस पर गृह राज्यमंत्री राजनाथ सिंह का भाषण मुसलमानों के बारे में कट्टर हिंदुओं के संदेह को सिर्फ  रेखांकित करता है। औसत हिंदू औसत मुसलमान को जगह देता है और नेताओं के उकसावे के बावजूद साथ रहता है और प्रेम से कारोबार करता है। संाप्रदायिक दंगों की संख्या जबर्दस्त ढंग से कम हो गई है और इसके कई उदाहरण हैं  जब हिंदुओं और मुसलमानों ने फिर से बसने में एक-दूसरे की मदद की है।
भारत को यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत सेकुलरिज्म को पूरे अर्थ में स्थापित करने में सफल नहीं हो पाया है, हालांकि लोकतंत्र का पौधा लग गया है। चुनावों में यह साफ दिखाई देता है। सेकुलरिज्म की भावना का अभाव इसलिए है कि हिंदुओं, जो बहुसंख्यक हैं, की इसमें आस्था संदिग्ध है। वास्तव में, यह उनका कर्तव्य है कि वे अल्पसंख्यक समुदाय को सुखी रखें और उन्हें भरोसा दें।
हाल ही में, मैं श्रीनगर में था। इंजीनियर जो मुझे ले जा रहा था, मुसलमान था। उसने शिकायत की कि अपने मजहब के कारण उसे देश के दूसरे हिस्सों में ढंग  की कोई नौकरी नहीं मिली। प्राईवेट सेक्टर में जब यह पता चला कि वह मुसलमान है तो नौकरी की जरूरी योग्यता होने के बावजूद उसे नौकरी नहीं दी गई।
बाकी मुसलमानों को भी देश के दूसरे हिस्सों में नौकरी पाने में दिक्कत होती है। पूर्वाग्रह के कारण प्राईवेट सेक्टर में उन्हें नौकरी नहीं दी जाती है। खुली प्रतियोगिता में सफलता पाना उनके लिए कठिन होता है क्योंकि उन्होंने प्राईवेट स्कूलों में शिक्षा नहीं ली होती है जहां फीस ज्यादा है। सरकारी स्कूलों में सुविधाओं, अच्छे शिक्षक और माहौल, का अभाव है जो उनकी तकलीफ को सिर्फ  बढ़ाता ही है।
मैं स्टेट्समैन का दिल्ली में संपादक था तो एक मुसलमान कर्मचारी, जो इंग्लैंड में शिक्षा लेकर भारत आया था, ने शिकायत की कि उसे अच्छे इलाके में मकान नहीं मिला। मैं यह जानकर हैरान हो गया कि वह वह सच बता रहा था और यह कि किसी मुसलमान के लिए एक अच्छा मकान पाना संभव नहीं था जिसका मालिक हिंदू हो। यह साठ के दशक की बात है। आज भी बहुसंख्यक समुदाय की मानसिकता में शायद ही कोई बदलाव आया है।
राजनाथ सिंह को ऐसे कदम उठाने चाहिए ताकि यह पक्का हो कि मुसलमानों को उन इलाकों में घर मिले जहां हिंदू ज्यादा तादाद में  हैं। अन्यथा, ऐसी जगहों की संख्या बढ़ेगी जो भीड़ भरी होंगी और जहां मुसलमान सुरक्षित महसूस करेंगे। इसका कोई फायदा नहीं है कि हर सरकार या पार्टियों केे नेता अल्पसंख्यक समुदाय को तसल्ली देने के लिए रस्मी तौर पर पर इफ्तार पार्टी दें।
मुंबई  जैसी आधुनिक नगरी में भी दंगों के समय अपनी पहचान छिपाने के लिए मुसलमानों को अपने नेमप्लेट हटाने पड़ते हैं। पर दुख की बात है कि हिंदू पड़ोसी उन्हें भरोसा नहीं दे पाते ताकि वे सुरक्षित महसूस करें और बिना किसी झिझक के उनके साथ मिल-जुल सकें। वे सिर्फ सुरक्षा की भावना चाहते हैं। यह सरकार का कर्तव्य है कि वह उनमें इसकी भावना डाले।
इसके लिए रक्षा बलों को धार्मिक भावनाओं के आकर्षण से ऊपर उठना होगा। यह देखा गया है कि दंगा प्रभावित इलाकों में रक्षा बलों को तंग नजरिया अपनाते देखा गया है। शांति बहाली के लिए सेना बुलानी पड़ती है क्योंकि वह दूषित नहीं हुई है।
राजनाथ सिंह को ऐसे कदम उठाने चाहिए जो उन बलों, जिसका वे नेतृत्व करते हैं, को धार्मिक भय से मुक्त कराए। इसके बदले वह भाषण दे रहे हैं और देश में विभाजन के घातक नतीजों के लिए पाकिस्तान को दोष दे रहे हैं।


 

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