क्या चीन तिब्बत में दलाईलामा की प्रथा समाप्त कर देगा?

डॉ. गौरीशंकर राजहंस : सदियों से तिब्बत में यह मान्यता रही है कि दलाईलामा भगवान बुद्व के अवतार हैं और हर दलाईलामा अपनी मृत्यु के ठीक पहले इस बात का संकेत दे देते हैं कि उनका अगला जन्म तिब्बत में कहां पर होगा। जब 1933 में 13वें दलाईलामा की मृत्यु हुई तो उनके अनुयायियों ने उनके शव को तिब्बत की गर्मियों की राजधानी 'नौरबोलिंगकाÓ राजमहल में दो दिनों तक रखा। वह एक तरह से बृहद बौद्ध मठ था।...

डॉ गौरीशंकर राजहंस

सदियों से तिब्बत में यह मान्यता रही है कि दलाईलामा भगवान बुद्व के अवतार हैं और हर दलाईलामा अपनी मृत्यु के ठीक पहले इस बात का संकेत दे देते हैं कि उनका अगला जन्म तिब्बत में कहां पर होगा। जब 1933 में 13वें दलाईलामा की मृत्यु हुई तो उनके अनुयायियों ने उनके शव को तिब्बत की गर्मियों की राजधानी 'नौरबोलिंगकाÓ राजमहल में दो दिनों तक रखा। वह एक तरह से बृहद बौद्ध मठ था। तत्कालीन दलाईलामा के शव को सिंहासन पर बैठा कर दो रातों तक इस प्रकार रखा गया था कि उनका मुख दक्षिण दिशा की ओर पड़े।  मठ  के उस कमरे को दोनों रात अच्छी तरह से बन्द कर दिया गया था और किसी को भी अन्दर जाने की इजाजत नहीं दी गई थी। दूसरे दिन सुबह में उनके अनुयायी लामाओं ने देखा कि मृत दलाईलामा का मुंह अपने आप पूर्व दिशा की ओर मुड़ गया था। यही नहीं, उस कमरे में जितने भी खंबे थे उनमें से जो पूर्व दिशा की ओर खंबा था उसमें अपने आप एक बड़े से तारे का स्वर्णिम निशान उग आया था।
पड़ोस में जो पवित्र पोखर था उसमें पूर्व दिशा के सभी कमल खिल उठे थे। शेष कमल ज्यों के त्यों थे। लामाओं को संदेश मिल गया था कि नये दलाईलामा ने तिब्बत के किसी पूर्वी प्रान्त में किसी गांव में जन्म लिया है। यह संदेश मिलते ही 20-25 लामा घोड़े और टटुओं को तेजी से भगाते हुए पूर्व दिशा की ओर यह पता लगाने के लिए चल पड़े कि क्या जिस तारीख को दलाईलामा की मृत्यु हुई थी उस तारीख के आसपास उस गांव में किसी बच्चे का जन्म हुआ था। लामाओं ने पूर्व के गांवों में 4 बच्चों को खोज निकाला। तीन बच्चे दिवंगत दलाईलामा के कपड़ों और बर्तनों को पहचान नहीं पाए। दलाईलामा के कपड़े और बर्तन दूसरे कपड़ों और बर्तनों में मिला दिए गए थे। परन्तु एक छोटे बच्चे ने दिवंगत दलाईलामा के कपड़े और प्रतिदिन व्यवहार में लाए जाने वाले बर्तनों को पहचान लिया। इस बच्चे का नाम 'तेनजिन ग्यातसोÓ था। वही तिब्बत के वर्तमान 14वें दलाई लामा बने।
तिब्बत हमेशा से एक स्वतंत्र देश था। वह भारत और चीन के बीच 'बफर स्टेटÓ बना हुआ था। भारत के साथ तो तिब्बत के संबंध सदियों पुराने रहे हैं। अंग्रेजों के समय में तिब्बत में भारतीय रेल चलती थी, भारतीय डाकघर कार्यरत थे, वहां भारतीय पुलिस थी और सेना की एक छोटी सी टुकड़ी भी देश की रक्षा के लिए तैनात थी। वहां भारतीय मुद्रा का चलन था। भूटान की तरह तिब्बत भी वैदेशिक और सुरक्षा के मामले में भारत पर निर्भर था। परन्तु सब कुछ बदल गया जब 1949 में चीन की मुख्य भूमि पर साम्यवादियों का कब्जा हो गया। शीघ्र ही उन्होंने तिब्बत पर चढ़ाई कर दी और उसे हड़प लिया। जब तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने विरोध किया तो चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ-एन-लाई ने उन्हें भरोसा दिलाया कि चीन-तिब्बत की राजनैतिक स्वायत्ता और धार्मिक स्वतंत्रा अक्षुण्ण रखेगा। परन्तु देखते ही देखते चीन ने तिब्बत के बौद्ध मठों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया और दलाईलामा को हर तरह से तंग करना शुरु कर दिया।
जब दलाईलामा के गुप्तचरों ने उन्हें सूचना दी कि अगले कुछ दिनों में चीन की पुलिस उन्हें गिरफ्तार करके बीजिंग ले जाना चाहती है तो दलाईलामा 1959 में रातोंरात भागकर, पैदल चल कर और टटुओं पर सवार होकर अपने सैंकड़ों सहयोगियों के साथ भारत आ गये। भारत सरकार ने उन्हें शरण दी। चीन ने भारत से दलाईलामा को लौटाने के लिए कहा। परन्तु पंडित नेहरू इसके लिए राजी नहीं हुए। तभी से चीन और भारत के संबंध बिगड़ते चले गए और अन्त में 1962 में चीन ने भारत पर एकाएक चढ़ाई कर दी। भारत चीन की इस धोखेबाजी के लिए तैयार नहीं था। परिणाम यह हुआ कि भारत बुरी तरह हार गया।
चीन पिछले अनेक वर्षों से कह रहा है कि तिब्बत हमेशा चीन का अंग और 1933 में जब 14वें दलाईलामा का चुनाव हुआ था तो वह तत्कालीन चीन की सरकार की सहमति से ही हुआ था। उस समय चीन में 'केएमटीÓ या 'क्यू मिन तांगÓ की सरकार थी। जब 'केएमटीÓ की सरकार ने मंजूरी दी तभी 14वें दलाईलामा का चुनाव हुआ। भारत सहित संसार के सभी प्रसिद्ध इतिहासकार कहते हैं कि यह सरासर झूठ है। 14वें दलाईलामा के चुनाव में चीन की कोई भूमिका नहीं थी। उसकी कोई सहमति नहीं थी।
वर्तमान दलाईलामा की उम्र 80 वर्ष है। उनका कहना है कि उनका अगला जन्म अब तिब्बत की मुख्य भूमि में नहीं होगा, बल्कि तिब्बत से 1959 में भागे हुए उन शरणार्थियों के परिवार में होगा जो हिमाचल प्रदेश के डलहौजी शहर में रह रहे हैं। यह जानकर तिब्बत की साम्यवादी सरकार आग बबूला हो गई है। उसका कहना है कि वह पुनर्जन्म या अवतार की बात नहीं मानती है। अगला दलाईलामा वही होगा जिसे चीन की सरकार नियुक्त करेगी।
इस बीच तिब्बत में अशांति का दौर जारी है। सन् 2008 और 2009 में तिब्बत की आ•ाादी के लिए 137 बौद्ध लामाओं ने आत्मदाह किया था। यह सिलसिला अभी भी जारी है। दलाईलामा ने तिब्बत में रहने वाले अपने अनुयायियों को संदेश भेजा है कि चीन एक ऐसा अजगर है जिसे समझा- बुझाकर रास्ते पर नहीं लाया जा सकता है। अत: तिब्बत में शांति बनाए रखने के लिए चीन की सरकार से सहयोग करना ही उचित होगा। वे इस उम्मीद में हैं कि हो सकता है देर या सबेर चीन की साम्यवादी सरकार को सद्बुद्धि आ जाए।
भारत और अमेरिका ने चीन की सरकार से कई बार कहा है कि वह दलाईलामा के प्रतिनिधियों के साथ बैठकर तिब्बत की समस्या का समाधान करने का प्रयास करे। पिछले कई महीनों में इस तरह की अनेक बैठकें हुईं। परन्तु कोई परिणाम नहीं निकला। हर बार चीन के प्रतिनिधि ने कहा कि दलाईलामा आतंकवादी हैं और भारत में बैठकर तिब्बत की जनता में असंतोष फैला रहे हैं। उन्हें चीन के खिलाफ भड़का रहे हैं। जब दलाईलामा के प्रतिनिधि ने सबूत मांगा तो चीन के प्रतिनिधि बैठक से उठकर चले गये। यह सिलसिला जारी है और लगता नहीं है कि इस समस्या का कोई समाधान निकल पाएगा। इधर चीन के एक सरकारी प्रवक्ता ने कहा है कि तिब्बत की समस्या का समाधान तभी होगा जब वर्तमान दलाईलामा की मृत्यु हो जाएगी और उनकी जगह चीन की सरकार द्वारा नियुक्त कोई नया दलाईलामा आएगा। इस बात से तिब्बत की जनता में भारी रोष है। लाख टके का प्रश्न यह है कि क्या तिब्बत की जनता इस तरह की कठपुतली दलाईलामा को मानेगी और क्या तिब्बत में विद्रोह का सिलसिला रुक जाएगा?
(लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)

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