क्या ऐसे ही जनता की उम्मीदें पूरी होंगी!

सीताराम येचुरी : अगले सोमवार (23 फरवरी) से संसद का बजट सत्र शुरू हो रहा है। स्वाभाविक रूप से सभी की नजरें मोदी सरकार के पहले पूर्ण-बजट की ओर लगी हुई हैं। भारतीयों के दो अलग-अलग वर्ग, इस बजट को एक-दूसरे की विरोधी दो अलग-अलग उम्मीदों के साथ इस बजट को देख रहे होंगे। एक वर्ग, जिसमें हमारी जनता का प्रचंड बहुमत आता है, ...

सीताराम येचुरी

अगले सोमवार (23 फरवरी) से संसद का बजट सत्र शुरू हो रहा है। स्वाभाविक रूप से सभी की नजरें मोदी सरकार के पहले पूर्ण-बजट की ओर लगी हुई हैं। भारतीयों के दो अलग-अलग वर्ग, इस बजट को एक-दूसरे की विरोधी दो अलग-अलग उम्मीदों के साथ इस बजट को देख रहे होंगे। एक वर्ग, जिसमें हमारी जनता का प्रचंड बहुमत आता है, मोदी के चुनाव अभियान के दौरान दिखाए गए ''सपनोंÓÓ के सच किए जाने की नजर से इस बजट को देख रहा होगा तो दूसरा वर्ग, जिसमें भारत के अति-धनिक तथा कार्पोरेट आते हैं, इसकी उम्मीद की नजरों से कि उसे अपनी तिजोरियां और ज्यादा भरने के मौके दिलाए जाएंगे। यह एक विडंबनापूर्ण सच है कि इन दोनों ही तरह की उम्मीदों ने 2014 के आम चुनाव में मोदी की जीत का रास्ता बनाया था।
भारतीय जनता का विशाल बहुमत यानी असली भारत, जिसकी आकांक्षाएं 'अच्छे दिन आने वाले हैंÓ जैसे अपने नारों से मोदी के चुनाव अभियान ने जगायी थीं, बड़ा ध्यान लगाकर यह देख रहा होगा कि क्या गंभीरता से इन वादों को पूरा करने के लिए कदम उठाए जाएंगे और उसकी जिंदगियों में बहुप्रतीक्षित सुधार आएगा? बहरहाल, मोदी सरकार के राज के पिछले नौ महीनों में तो सरकार के विभिन्न फैसलों ने भारतीय जनता के इस हिस्से की उम्मीदों और आकांक्षाओं पर ठंडा पानी ही डाला है। कीमतों का बढऩा जारी है। सभी जानते हैं कि थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई), उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के मुकाबले जनता के जीवनस्तर पर पड़ रहे दबाव का शायद ही कोई पता देता है। इसके बावजूद, सरकार थोक मूल्य सूचकांक में ही गिरावट का ढोल पीट रही है क्योंकि यह उसके प्रचार के लिए माफिक पड़ता है। पूरे देश को बताया जा रहा है कि थोक मूल्य सूचकांक पिछले साढ़े पांच साल में कभी इतना नीचे नहीं गया था, जितना आज चला गया है। लेकिन, इस आंकड़े में भी गिरावट इसीलिए दिखाई दे रही है कि अंतरराष्टï्रीय बाजार में तेल के दाम लुढ़क गए हैं और  इसके चलते, तेल के आयात पर हमारे देश का विदेशी मुद्रा खर्च घटकर आधे से भी कम रह गया है। लेकिन, तेल के दाम में इस गिरावट का भी लाभ सीधे उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच पाया है। पेट्रोल तथा डीजल के दाम में जो थोड़ी सी कमी हुई भी है, वास्तव में अंतरराष्टï्रीय बाजार में दामों में हुई गिरावट का एक छोटा सा हिस्सा भर है। इस गिरावट का पूरा लाभ उपभोक्ताओं को दिलाने की जगह पर सरकार ने उत्पाद शुल्क में चार-चार बार बढ़ोतरी की है और पेट्रोल के उत्पाद शुल्क में कुल 7 रुपए 75 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है और डीजल के उत्पाद शुल्क में 7 रुपए 50 पैसे प्रति लीटर की। दूसरी ओर, इसी अवधि में पेट्रोल व डीजल के दाम में क्रमश: 2 रुपए 42 पैसे तथा 2 रुपए 25 पैसे प्रति लीटर की ही बढ़ोतरी की गई है। इतना ही नहीं, इसी बीच पेट्रोल व डीजल के दाम में एक बार फिर क्रमश: 81 पैसा तथा 61 पैसा प्रति लीटर की बढ़ोतरी भी की जा चुकी थी। इस तरह, जनता पर और ज्यादा बोझ डाले जाने के लक्षण दिखाई भी देने लगे हैं।
वैसे थोक मूल्य सूचकांक में दिसंबर 2014 में हालांकि 'उल्लेखनीयÓ गिरावट हुई थी तथा यह 0.11 फीसद के स्तर पर था, फिर भी यह इससे एक महीने पहले के शून्य से 0.17 फीसद नीचे के स्तर से, बढ़ोतरी को ही दिखाता था। इससे भी बुरा यह कि खाद्यान्नों की कीमतों का बढऩा जारी है और अगर रबी की फसल बहुत जबर्दस्त नहीं हो जाती है, तो यह बढ़ोतरी जारी ही रहने जा रही है। लेकिन, जैसाकि  इससे पहले इसी स्तंभ में हमने चर्चा की थी, कुल बुआई का रकबा घट गया है, जिसके चलते रबी की पैदावार बहुत अच्छी रहने की संभावना ही न•ार नहीं आती है।
इससे पहले हमने इसकी भी चर्चा की थी कि किस तरह सरकारी आंकड़ों के साथ तोड़-मरोड़ की जा रही है ताकि अर्थव्यवस्था की तस्वीर अपेक्षाकृत खुशगवार बनाकर पेश की जा सके। बहरहाल, इस तरह की तोड़-मरोड़ का सहारा लेने के बावजूद, आर्थिक वृद्घि तथा औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े कोई उत्साहजनक न•ार नहीं आ रहे हैं। इनमें से भी हमारी जनता के विशाल हिस्सों के आम उपभोग में आने वाले उत्पादों के मामले में वृद्घि दर ऋणात्मक ही बनी रही है। जिस समूह में रेडियो, टेलीविजन आदि आते हैं, पूरे 70.4 फीसद की ऋणात्मक वृद्घि दर दर्ज हुई है। टेलीफोन उपकरणों के मामले में (मुख्यत: मोबाइल फोन तथा सहायक उपकरणों के मामले में) 80.1 फीसद की ऋणात्मक वृद्घि दर दर्ज हुई है। इसी प्रकार, रंगीन टेलीविजनों के मामले में 26.6 फीसद तथा कंप्यूटरों के मामले में 36 फीसद की ऋणात्मक वृद्घि दरें दर्ज हुई हैं।  इन आंकड़ों से यह साफ हो जाता है कि कुल मिलाकर आर्थिक गतिविधियां गिरावट पर हैं। यह संकट तब और भी गंभीर हो जाता है, जब हम इसे लगातार जारी कृषि संकट के साथ जोड़कर देखते हैं, जिसकी हमने पहले चर्चा की थी। यही वह पृष्ठïभूमि है जिसमें हमारी जनता का विशाल बहुमत, इस बजट से इसकी उम्मीद कर रहा होगा कि उनकी बुनियादी चिंताओं को लिया जाएगा और उनकी जिंदगियां बेहतर बनाने के लिए कदम उठाए जाएंगे।
बहरहाल, बजट के सामने से पहले ही मोदी सरकार द्वारा उठाए गए अनेक कदमों ने पहले ही इन उम्मीदों पर ढेरों पानी डाल दिया है। हमारा इशारा जनता को कुछ राहत देने वाली केंद्रीय योजनाओं के लिए आबंटनों में कटौतियां किए जाने की ओर है। मनरेेगा पर भारी कटौतियां थोपने के जरिए, करोड़ों ग्रामीण गरीबों को उन्हें उपलब्ध आर्थिक जीवनरेखा से ही दूर करने की कोशिश की गई है। जनता यह भी देख रही है कि किस तरह खाद्य सुरक्षा कानून को कमजोर किया जा रहा है। इस कानून में पहले ही सिर्फ 67 फीसद परिवारों को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने का प्रावधान था। अब इसे और घटाकर 40 फीसद परिवारों तक सीमित करने का प्रस्ताव है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भारी कटौतियां करने की तैयारी है। इस तरह, खाद्य सुरक्षा तथा ग्रामीण रोजगार गारंटी के तहत हमारी जनता के विशाल हिस्सों को जो थोड़ी-बहुत सुरक्षा हासिल भी थी, उसे भी अब कमजोर ही किया जा रहा है।
पुन: मोदी सरकार ने अध्यादेश जारी कर, भूमि अधिग्रहण कानून के तहत भूमि गंवाने वालों को दी गई सुरक्षा को कमजोर किया है। उक्त कानून में भूमि गंवाने वाले आम किसानों को और खेत मजदूरों समेत उन तबकों को जो अपनी रोजी-रोटी के लिए संबंधित भूमि पर निर्भर हों, जो सुरक्षा मुहैया कराई गई है तथा अधिकार दिए गए हैं, उन्हें बहुत कमजोर कर दिया गया है। मोदी सरकार ने खेतीवाली जमीनों के अधिग्रहण पर लगी शर्तों, भूमि अधिग्रहण से विस्थापित होने वाले ग्रामीणों की विशाल संख्या के लिए समुचित मुआवजे व पुनर्वास व्यवस्था को कमजोर किया गया है और इस तरह कार्पोरेट खिलाडिय़ों को भारी उपहार दिया गया है और बड़े भूमि खिलाडिय़ों को हर तरह के हथकंडों से भूमि हथियाने का मौका दिया गया है ताकि अपने मुनाफे अधिकतम कर सकें।
इसी तरह व्यापक रूप से इसकी आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं कि गरीबों को जो मामूली सी सब्सिडियां अब तक दी जाती रही हैं, खासतौर पर किसानों को उर्वरकों के उपयोग के लिए तथा सिंचाई के लिए बिजली के उपयोग के लिए दी जाने वाली सब्सिडियां, उन्हें समेटा जाने वाला है। इसी प्रकार, कृषि उत्पादों के लिए किसानों को दिया जाने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य तो पहले ही अपर्याप्त था, जो खुद सरकार के आकलन के हिसाब से लागत की भरपाई भी नहीं करता था और इस तरह कृषि संकट को गहरा कर रहा था तथा किसानों की बढ़ती संख्या को आत्महत्याएं करने के लिए मजबूर कर रहा था। बहरहाल, मोदी सरकार अब जो कदम उठा रही है, कृषि संकट तथा किसानों की परेशानियों में और भी बढ़ोतरी होने जा रही है। इस तरह, मोदी सरकार का नौ महीने का रिकार्ड जनता के विशाल हिस्से के लिए और खासतौर पर शहरी व ग्रामीण गरीबों के लिए, बहुत हानिकर साबित हुआ है। इसे देखते हुए ऐसा लगता है कि इस सरकार का पूर्ण बजट, जनता की तकलीफें और बढ़ाने वाला ही साबित होगा।
बहरहाल, अब जबकि इस तरह 'शाइनिंग इंडियाÓ बनाने वाले मु_ïीभर लोगों और 'असली भारतÓ का गठन करने वाले हमारी जनता के  प्रचंड बहुमत के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है, शेयर बाजार का आचरण ही बजट की सफलता इस सरकार का पैमाना बन रह होगा। अंतरराष्टï्रीय वित्तीय खिलाडिय़ों और देसी कार्पोरेटों की न•ार में, सेंसैक्स का उछलना ही, बजट की सकारात्मकता का संकेतक होता है। 1997 में चिदंबरम द्वारा पेश किए गए 'ड्रीम बजटÓ का मिसाल मानकर, उसके बाद से हरेक वित्त मंत्री उसका अनुसरण करने की कोशिश करता आया है। वर्तमान वित्त मंत्री भी कोई अपवाद साबित नहीं होंगे।
यह सब इसके बावजूद हो रहा है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक फरवरी में शुद्घ विक्रेता बन गए हैं यानी भारतीय बाजारों से हाथ खींचते न•ार आए हैं। यह इसके बावजूद हो रहा है कि तेल के अंतरराष्टï्रीय दामों में गिरावट बाद भी, रुपए के विनिमय मूल्य में और गिरावट दर्ज हुई है। रुपए का मूल्य गिरकर, 62 रुपए से ज्यादा में एक डालर के स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि, रुपए के विनिमय मूल्य में गिरावट विदेशी बाजारों में हमारे निर्यातों का सस्ता बना रही है, भारत के निर्यातों में 11.2 फीसद की गिरावट दर्ज हुई है।
इसलिए, आंकड़ों की चाहे कितनी ही हेर-फेर की जाए और शेयर बाजार में चाहे जैसा उछाल ले आया जाए, पीछे दिए गए सारे अंाकड़े इसी की गवाही देते हैं कि अर्थव्यवस्था की बुनियादी ताकत कमजोर पड़ रही है।
जाहिर है कि नवउदारवादी सुधारों के मौजूदा निजाम में, मौजूदा कठिनाइयों से उबरने की कोशिश में, और ज्यादा निवेशों को आकर्षित करने का ही रास्ता अपनाया जा रहा होगा। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि विदेशी वित्तीय पूंजी को और देसी पूंजी को भी और ज्यादा रियायतें दी जा रही होंगी। लेकिन, ऐसे निवेशों को बढ़ाने की कीमत के तौर हमारे देश के अपने संसाधनों तथा बाजारों के द्वार विदेशी पूंजी को अपने मुनाफे अधिकतम करने का मौका देने के लिए खोले जाने के जो नुकसानदेह परिणाम होंगे उन्हें अगर बहस के लिए हम भूला भी दें तब भी, ऐसे निवेशों का आना खुद ब खुद रोजगार व आर्थिक वृद्घि में बढ़ोतरी नहीं ला सकता है। यह सब तो तभी हो सकता है जब भारतीय जनता के हाथों में क्रय शक्ति बढ़ रही हो, जिससे वह ऐसे निवेशों से बनाए जाने वाले उत्पादों को खपा सके। लेकिन, जैसाकि हम पीछे देख आए हैं, मोदी सरकार द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीति की दिशा, जनता के हाथों में क्रय शक्ति को गंभीर रूप से घटा ही रही है। इस तरह, इंडिया और भारत के बीच की बढ़ती खाई और बढ़ जाने वाली है। जहां विदेशी व देसी पूंजी को अपने मुनाफे अधिकतम करने के मौके दिए जाने हैं, वहीं जनता के विशाल बहुमत की तकलीफें और बढ़ाई जा रही होंगी।
इसलिए, जब तक शक्तिशाली जन-गोलबंदियों के जरिए, मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की इस दिशा को पलटा नहीं जाएगा, जनता की रोजी-रोटी की दशा में गिरावट आना ही तय है, फिर हालात में सुधार का तो सवाल ही कहां उठता है।

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