कैसे हो कांग्रेस का पुनरुद्धार

एच.एल. दुसाध : सोलहवीं लोकसभा चुनाव में अब तक की सबसे करारी हार के सदमे में डूबी कांग्रेस में कुछ राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर बगावत के स्वर मुखर होने लगे हैं। ...

एच.एल. दुसाध

सोलहवीं लोकसभा चुनाव में अब तक की सबसे करारी हार के सदमे में डूबी कांग्रेस में कुछ राज्यों में होनेवाले विधानसभा चुनावों में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर बगावत के स्वर मुखर होने लगे हैं। हालांकि पार्टी हाईकमान ने बगावत पर सख्ती से निपटने के सन्देश दे दिए हैं, बावजूद इसके आन्तरिक विरोध का स्वर तेज हुआ जा रहा है। बहरहाल यह सब अनायास नहीं है,लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अभूतपूर्व लज्जाजनक पराजय के बाद ऐसी आशंका अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों ने ही जतलाई थी। इस विषय में यह लेखक अपने पाठकों का ध्यान एक राजनीतिक विश्लेषक की एक खास टिप्पणी की ओर आकर्षित करना चाहता है। उसने कांग्रेस की करारी हार के भावी परिणामों की ओर संकेत करते हुए लिखा था।
 'मोदी की सुनामी ने कांग्रेस को आई.सी.यू. में पहुंचा दिया है। वो कोमा में पहुंच चुकी है और निकट भविष्य में उसकी तबियत में सुधार के कोई संकेत नहीं है। एक सौ अठाइस साल की पुरानी पार्टी के रूप में कांग्रेस हार-जीत की आदी रही है और उसने हर चुनौती का डटकर सामना किया है। लेकिन इस बार के परिणामों ने तो पार्टी की जान ही निकाल दी है और वो दर्द से छटपटाते हुए सांसों के लिए हांफ रही है...जाहिर सी बात है कांग्रेस को अपने भविष्य को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित हो जाना चाहिए। अगर इस साल के अंत में महाराष्ट्र, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश, झारखण्ड (अगर सरकार अभी गिरी तो) जनवरी 2015  में जम्मू और कश्मीर और 2016 के मध्य पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम में होने वाले विधानसभा चुनावों में जनादेश कांग्रेस के खिलाफ गया तो इस बात की भी आशंका है कि कहीं महात्मा गांधी का यह कथन सत्य न हो जाय कि कांग्रेस पार्टी को खत्म कर देना चाहिए। अगर हवा का रुख ऐसा ही रहा तो कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टी भी बने रहने की तसल्ली नसीब नहीं होगी।Ó उसने पार्टी की हार के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराते व उनकी कमजोरियों को उजागर करते हुए कहा था, 'वो नए और उभरते हुए भारत के नेतृत्व की चुनौतियों से निबटने में सक्षम नहीं हैं, वे नदारद रहते हैं संसद के अन्दर और बाहर। उनमें विजन की कमी है, पार्टी नेताओं, सदस्यों, कार्यकर्ताओं और जनता के साथ वे जुडऩे में असमर्थ हैं। इन सब बातों ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया।Ó अंत में उसने कहा था, 'पार्टी के समक्ष नेतृत्व की गंभीर समस्या है। सामाजिक आधार को मजबूत करने और सामाजिक और  भौगोलिक रूप  से सिमटते हुए संगठन के पुनरुत्थान की चुनौती है। ये काम हिमालय की किसी दुर्गम चढ़ाई से कम मुश्किल नहीं।Ó
ऐसा नहीं कि कांग्रेस की कल्पनातीत पराजय के बाद पार्टी के भविष्य को लेकर आशंका जताने वाला वह इकलौता राजनीतिक विश्लेषक था, नहीं अधिकांश विश्लेषकों ने ही कुछ वैसी ही राय व्यक्त की थी। कुछ ने तो पार्टी के टूटने की संभावना बताई थी तो कुछ ने कांग्रेस के रूप में एक राजनीतिक युग के अंत की घोषणा कर दिया था। यही नहीं, सभी टिप्पणीकारों ने ही प्राय: एक स्वर में राहुल गांधी की नेतृत्वक्षमता पर सवाल उठाते हुए, पार्टी की हार के लिए व्यक्तिगत तौर पर उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया था। कुछ ने पार्टी का वजूद बचाए रखने के लिए उनकी जगह पार्टी का नेतृत्व प्रियंका गांधी के हाथों में सौंपने का सुझाव भी दिया था। बहरहाल चुनाव परिणाम आने के बाद राजनीतिक टिप्पणीकारों ने जो आशंका जताई थी, वह अब सामने आ रही  है। पार्टी में आंतरिक विरोध के स्वर, धीमे ही सही उभरने लगे हैं। अब पार्टी के अन्दर ही राहुल के विरुद्ध व प्रियंका के पक्ष में भी स्वर उभरने लगे हैं। गांघी परिवार के दिग्विजय सिंह जैसे एकनिष्ठ समर्थक ने जिस तरह राहुल गांधी की शासकीय योग्यता पर सवाल उठाया और पार्टी में विरोध नहीं हुआ, वह राहुल गांधी के प्रति कांग्रेसियों में पनप रही विराट निराशा का संकेतक है। कांग्रेस का संकट सिर्फ इतना ही नहीं है कि वह हाल ही में ऐतिहासिक हार का सामना की है तथा उसमें योग्य नेतृत्व का अभाव पैदा हो गया है, इस दुर्दिन में उसकी सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि आ•ााद भारत में उसके पीछे मजबूती से खड़े दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों का उससे बड़े पैमाने पर मोहभंग हुआ है। वे अपनी दुरावस्था के लिए मुख्यरूप से कांग्रेस को ही जिम्मेदार मान रहे रहे हैं। यही नहीं, देश में व्याप्त भीषणतम आर्थिक और सामाजिक विषमता के लिए भी दलित-पिछड़े समाज के बुद्धिजीवी भी एकमात्र कांग्रेस को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका मानना है कि आ•ााद भारत में सुदीर्घ काल तक सत्ता पर काबिज रहने वाली कांग्रेस अगर संपदा-संसाधनों के न्यायोचित बंटवारे की सम्यक नीति अख्तियार की होती, परम्परागत रूप से सुविधासंपन्न और विशेषाधिकारयुक्त अल्पजन तबकों का शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार पर 80-85 प्रतिशत कब्जा हरगिज नहीं होता। बहरहाल यहां लाख टके का सवाल है कि कोमा में चली गई देश की सबसे पुरानी और आ•ाादी की जंग लडऩे वाली पार्टी का पुनरुद्धार हो तो कैसे? इस प्रश्न पर विचार करना इसलिए भी और जरूरी है क्योंकि इसका पुनरुद्धार न सिर्फ खुद कांग्रेस बल्कि राष्ट्र के लिए भी बहुत जरूरी है। देश की तमाम राजनीतिक पार्टियों का रंग-ढंग देखते हुए कांग्रेस के दुश्मन तक भी नहीं चाहेंगे कि यह पार्टी उस गति को प्राप्त हो जिसकी कामना कभी गांधी ने की थी।
अब जहां तक कांग्रेस के पुनरुद्धार का सवाल है न तो इस पार्टी के नेताओं और न ही इसके समर्थक किसी बुद्धिजीवी के तरफ से ऐसा कोई ठोस सुझाव सामने आया है जिसे देखकर लगे कि यह पार्टी कोमा से उबर सकती है। ले देकर एक ही सुझाव सामने आया है वह यह कि राहुल की जगह नेतृत्व की बागडोर प्रियंका को थमा दी जाय। किन्तु प्रियंका के आने से यदि कांग्रेस की स्थिति में शतप्रतिशत सुधार की गुंजाइश होती शायद प्रियंका को जिम्मेदारी मिल जाती। किन्तु वैसा नहीं है, लिहाजा यह मानकर चलना होगा कि कांग्रेस को राहुल के नेतृत्व में ही पुनरुद्धार की लड़ाई लडऩी है। अब जहां तक राहुल का सवाल है, वह पूरी तरह से खारिज करने लायक नहीं हैं। 2009 में उनका परफॉर्मेंस देखकर बहुतों को पंडित नेहरु की याद आ गई थी। बहरहाल कांग्रेस पार्टी की असल समस्या नेतृत्व नहीं, एजेंडा है। यह पार्टी अपने सवर्णवादी चरित्र से उबरने में व्यर्थ रही इसलिए वह भागीदारीमूलक नहीं, राहत और भीखनुमा चुनावी एजेंडों पर निर्भर रहकर चुनाव में उतरी और बुरी तरह मात खाई। यदि वह 21वीं सदी के वंचित वर्गों की आकांक्षा को समझते हुए शासन-प्रशासन और समस्त आर्थिक गतिविधियों में एससी/एसटी, ओबीसी और धार्मिक अल्पसंख्यकों को न्यायोचित हिस्सेदारी के मुद्दे पर चुनाव लड़ती, परिणाम भिन्न होता। बहरहाल आज यदि कांग्रेस सचमुच कोमा से उबरना चाहती है तो वह राहुल गांधी की नेतृत्व में शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक) में सामाजिक और लैंगिक विविधता का प्रतिबिम्बन कराने की लड़ाई लडऩे की घोषणा करे। ऐसा करने पर इस वर्ष के शेष में अनुष्ठित हो रहे विधानसभा चुनाओं में ही वह चमत्कारिक परिणाम आएगा कि लोगों में 2009 के लोकसभा चुनाव की भांति एक बार फिर राहुल में नेहरू की छवि दिखने लगेगी। पर कांग्रेस के पुनरुद्धार की शतप्रतिशत सम्भावना के बावजूद सवाल पैदा होता है कि सोनिया-राहुल को घेरे रखनेवाले उनके सवर्ण सलाहकार क्या चाहेंगे कि कांग्रेस भारत के दलित/आदिवासी, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को हर क्षेत्र में हिस्सेदारी के एजेंडे पर अपनी आगे राजनीति स्थिर करें? अंत में! चूंकि देश हित में कांग्रेस का पुनरुद्धार जरूरी है इसलिए यह लेखक देश के बुद्धिजीवियों के समक्ष विनम्र अपील करता है कि यदि आपके पास इसके लिए डाइवर्सिटी से बेहतर उपाय है, प्लीज राष्ट्र के समक्ष अवश्य रखें।
( लेखक बहुजन डायवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)                               

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