कैसे खड़ा हो विविधता पर जनांदोलन

एच.एल.दुसाध : भारत का इतिहास आरक्षण पर संघर्ष का इतिहास है। कारण, जिस वर्ण-व्यवस्था के द्वारा यह देश सदियों से परिचालित होता रहा है उसके प्रवर्तक ने इसकी परिकल्पना चिरस्थाई तौर पर शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक और धार्मिक) को अपनी भावी पीढ़ी के लिए आरक्षित करने को दृष्टिगत रखकर की थी। चूंकि शुद्रातिशूद्र वर्ण-व्यवस्था में शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत रहे इसलिए वे समय-समय पर इसमें अपनी हिस्सेदारी के लिए संघर्ष करते रहे। ...

एच.एल. दुसाध

भारत का इतिहास आरक्षण पर संघर्ष का इतिहास है। कारण, जिस वर्ण-व्यवस्था के द्वारा यह देश सदियों से परिचालित होता रहा है उसके प्रवर्तक ने इसकी परिकल्पना चिरस्थाई तौर पर शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक और धार्मिक) को अपनी भावी पीढ़ी के लिए आरक्षित करने को दृष्टिगत रखकर की थी। चूंकि शुद्रातिशूद्र वर्ण-व्यवस्था में शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत रहे इसलिए वे समय-समय पर इसमें अपनी हिस्सेदारी के लिए संघर्ष करते रहे।  इस क्रम में शक्ति के स्रोतों पर काबिज सुविधा-संपन्न वर्ग से उनका संघर्ष होता रहा। संपदा-संसाधनों के हिस्सेदारी के मसले पर शक्तिशून्य शुद्रातिशूद्रों और शक्तिसंपन्न सवर्णों के मध्य संघर्ष ही भारत में वर्ग संघर्ष का इतिहास है। आधुनिक भारत में इस संघर्ष को शिखर प्रदान किया ज्योतिबा फुले, शाहूजी महाराज, रामासामी पेरियार और खास तौर से डॉ. आंबेडकर इत्यादि जैसे बहुजन नायकों ने। आंबेडकर उत्तर काल में जिन्होंने इस संघर्ष को खास तौर से आगे बढ़ाया वे थे बिहार के लेनिन जगदेव प्रसाद और बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम।
सवर्णवादी-आरक्षण की काट के लिए आधुनिक भारत में फुले ने जो विचार प्रणाली दिया उसका सुफल तब सामने आया जब डॉ.आंबेडकर के प्रयत्नों से संविधान में आरक्षण का प्रावधान रचा गया। इससे दुनिया के सर्वाधिक अधिकारविहीन लोगों (दलित-आदिवासियों) को शक्ति के कुछ स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक) में कुछ शेयर सुनिश्चित हुआ। किन्तु भारत का इतिहास विशुद्ध आरक्षण पर संघर्ष का इतिहास है, यह अप्रिय यथार्थ बड़ा रूप लेकर तब सामने आया जब मण्डलवादी आरक्षण की घोषणा हुई। इसके घोषित  होने के बाद जहां शक्तिसंपन्न वर्ग की काबिल संतानें आत्म-दाह और राष्ट्र की सम्पदा-दाह में जुट गईं, वहीं सवर्णवादी संघ ने धर्म के नाम पर स्वधीनोत्तर भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन ही खड़ा कर दिया जिसके फलस्वरूप हजारों करोड़ की सम्पदा तथा असंख्य लोगों की प्राणहानि हुई। बाद में दूसरी सवर्णवादी पार्टी के ब्राह्मण प्रधानमंत्री ने आंबेडकरी आरक्षण को कागजों तक सिमटाये रखने के लिए 24 जुलाई,1991 को देश को भूमंडलीकरण की राह पर ठेल दिया।
बहरहाल जब आधुनिक भारत के चाणक्य नरसिंह राव ने भूमंडलीकरण रणनीति (अर्थनीति) ग्रहण की तब आरक्षित वर्ग के लोगों के मन में निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग कुण्डली मारने लगी। और जब सत्ता में आकर राष्ट्रवादी अटल बिहारी वाजपेयी अपने गुरुघंटाल को बौना साबित करने का लक्षण दिखाने लगे, तब शुद्रातिशूद्रों को शत-प्रतिशत विश्वास  हो गया कि सत्ता पर हिन्दू आरक्षणवादियों का एकमेव लक्ष्य आंबेडकरी आरक्षण को महज कागजों तक सिमटा देना है। ऐसे में निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग शोर में बदलने लगी।  उन्हीं दिनों चर्चित दलित बुद्धिजीवी चंद्रभान प्रसाद और उनके मित्रों के सौजन्य से भारतीय बौद्धिक क्षितिज पर डाईवर्सिटी का उदय हुआ। चूंकि भारत का इतिहास निर्विवाद रूप से आरक्षण पर संघर्ष इतिहास है इसलिए जब अल्पजन सत्ताधारी जमात की ओर से आरक्षण के खात्मे के लिए सत्ता का इस्तेमाल होने लगा तब प्रतिकार स्वरूप मूलनिवासी बुद्धिजीवियों के समक्ष आरक्षण पर लम्बी लकीर खींचने के सिवाय कोई विकल्प नहीं रहा। तो ऐसे में कहा जा सकता है कि भारतीय इतिहास (आरक्षण पर संघर्ष) के गर्भ से ही सर्वव्यापी आरक्षणवाली डाईवर्सिटी का जन्म हुआ।
खैर! आरक्षण के खात्मे के षडय़ंत्र के विरुद्ध जिस डाईवर्सिटी की विचार प्रणाली का उदय हुआ, वह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय तब बनी दिग्विजय सिंह के सक्रिय सहयोग से 12-13 जनवरी, 2002 को भोपाल में चंद्रभान प्रसाद के नेतृत्व में दलित बुद्धिजीवियों का विशाल सम्मेलन आयोजित हुआ। दो दिनों के भारी विचार मंथन के बाद उस सम्मलेन से डाईवर्सिटी केन्द्रित 21 सूत्रीय दलित एजेंडा जारी हुआ जिसे भोपाल घोषणापत्र कहा जाता है। भोपाल सम्मलेन के बाद जब 27 अगस्त 2002  को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने राज्य के समाज कल्याण विभाग में कुछ वस्तुओं की सप्लाई में एससी/एसटी के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की, आरक्षण के खात्मे से भयाक्रांत दलितों में एक नई उम्मीद का संचार हुआ। फिर तो ढेरों व्यक्ति और संगठन अपने-अपने तरीके से डाईवर्सिटी आन्दोलन को आगे बढ़ाने जुट गए।
बीडीएम की स्थापना के पूर्व तमाम संगठन व बुद्धिजीवियों के तरफ से अमेरिका के अश्वेतों की तर्ज पर सिर्फ एससी/एसटी के लिए परम्परागत आरक्षण (सरकारी नौकरियों) से आगे बढ़कर उद्योग-व्यापार में संख्यानुपात में आरक्षण की मांग उठ रही थी। किन्तु बीडीएम से जुड़े लेखकों ने उस मांग का विस्तार करते हुए शक्ति के सभी स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करने अर्थात् भारत के चार सामाजिक समूहों-सवर्ण, ओबीसी,एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों-के स्त्री-पुरुषों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किए जाने की नई मांग उठाना शुरू किया। शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने की जरूरत को ध्यान में रखते हुए इस संगठन से जुड़े लेखकों ने भूरि-भूरि लेखन किया। देखते ही देखते बीडीएम साहित्य के लिहाज से देश का अन्यतम समृद्ध संगठन बन गया। सिर्फ लेखन ही नहीं, डाईवर्सिटी का विचार जन-जन तक पहुंचे, इसके लिए इसकी ओर से देश के विभिन्न अंचलों सभा/संगोष्ठियां व यात्रायें आयोजित करने का अनवरत सिलसिला भी चला।  इसके फलस्वरूप कई क्षेत्रीय व राष्ट्रीय पार्टियों के घोषणापत्रों में डाईवर्सिटी को जगह मिली। पर, बीडीएम के प्रयासों का सबसे सुखद पहलू रहा कि अधिकांश आंबेडकरवादी संगठन अब जाति तोड़ो, अस्पृश्यता मिटाओ इत्यादि जैसे अमूर्त सामाजिक मुद्दों को छोड़कर हर क्षेत्र में भागीदारी को अपना मुख्य एजेंडा घोषित करने लगे हैं। किन्तु तमाम खूबियों के बावजूद अब बीडीएम की एक बड़ी सीमाबद्धता भी उजागर हो गयी है।
बीडीएम की सीमाबद्धता यह कि यह भले ही बहुजन समाज के जागरुक लोगों और संगठनों तक डाईवर्सिटी का विचार पहुंचाने में सफल हो गया हो पर, इस पर निर्भर रहकर डाईवर्सिटी को मास मुव्हमेंट का रूप नहीं दिया जा सकता। लेखकों की सीमाएं तथा संसाधनों का अभाव इसमें आड़े आ रहा है। किन्तु शक्ति के स्रोतों में अगर सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवानी है तो इस पर जनांदोलन खड़ा किये बिना कोई विकल्प नहीं है। जब लोगों के विभिन्न तबकों की ओर से डाइवर्सिटी लागू करवाने की मांग उठेगी तभी बात बनेगी।  अब लाख टके का सवाल यह है कि इस पर मास मुव्हमेंट खड़ा हो तो कैसे! इसके लिए एक ही रास्ता नजर आ रहा है वह यह कि डाईवर्सिटी के कॉमन एजेंडे के आधार पर तमाम वंचित वर्गों के सामाजिक संगठनों का एक महासंघ बने तथा इसका नेतृत्व किसी ऐसे व्यक्ति को सौंपा जाय जिसकी आवाज पूरे देश में सुनी जाती हो। इस मामले में डॉ. उदित राज के नेतृत्व में काम कर रहे 'अनुसूचित जाति/जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघÓ को मॉडल बनाया जा सकता है। आज से डेढ़ दशक पूर्व एससी/एसटी के विभिन्न कर्मचारी संगठनों ने 'आरक्षण बचानेÓ के कॉमन एजेंडे पर परिसंघ की स्थापना की और अपने मकसद में कामयाबी हासिल की। जब सिर्फ आरक्षण बचाने के नाम पर परिसंघ बन सकता है तो डाईवर्सिटी का संपर्क सर्व-व्यापी आरक्षण लागू करवाने से है, वह भी सभी वंचित सामाजिक समूहों के लिए। ऐसे में किसी योग्य व्यक्ति के नेतृत्व में डाईवर्सिटी पर महासंघ बनाने की पहल हो तो आजाद भारत में बहुजनों का सबसे बड़ा संगठन खड़ा होते देर नहीं लगेगी।
(लेखक बहुजन डाईवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)

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