कैश नहीं, ‘कार्ड मनी’ के लिए है सारा खेल

पुष्परंजन : पता नहीं धारक को वचन देने का ख्याल भारतीय करेंसी नोट के निर्माताओं को क्यों आया। वचन, रिजर्व बैंक के गवर्नर देते हैं, और उसे तोड़ते देश के प्रधानमंत्री हैं। ...

पुष्परंजन
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पता नहीं धारक को वचन देने का ख्याल भारतीय करेंसी नोट के निर्माताओं को क्यों आया। वचन, रिजर्व बैंक के गवर्नर देते हैं, और उसे तोड़ते देश के प्रधानमंत्री हैं। इस तरह के वचन डॉलर, पौंड, यूरो, रूबल, रपमिनपी, येन, दिरहम पर क्यों नहीं दिखते? दुनिया भर में मौद्रिक भंडार का मापदंड बने डॉलर पर मुद्रित शब्द को गौर से देखिये, लिखा है-‘दिस नोट इज लीगल टेंडर!’ अर्थात्, यह विधि मान्य मुद्रा है। पांच से लेकर पांच सौ यूरो के नोट पर भी ‘प्रामिस’ नहीं मिलेगा, और न ही पौंड पर कोई प्रतिज्ञा आप देखेंगे।  रिजर्व बैंक के गवर्नर को चाहिए ‘आई प्रॉमिस टू पे’ के नीचे एक छोटा सा स्टार लगायें, और ‘कंडीशन अप्लाई’ भी छापें। इससे कम से कम तसल्ली तो हो जाएगी कि जनता ने जिसे अधिनायक बनाया है, वह इसे किसी भी क्षण रद्द करने के लिए अधिकृत है।
भारतीय करेंसी की विश्वसनीयता इतनी बदतर हो जाएगी, कभी सोचा न था। इस समय कागज के नोट से अधिक ‘प्लास्टिक मनी’ की साख है। ऐसी कार्ड करेंसी, जिस पर रिजर्व बैंक के गवर्नर के वायदे की आवश्यकता नहीं है। प्लास्टिक मनी से आप पित्जा, बर्गर, पेस्ट्री आर्डर कर सकते हैं। सैर-सपाटे, मौज कर सकते हैं। साइबर तकनीक चाहे गांव-चौबारे तक नहीं पहुंचा हो, मगर मजदूर, किसान पर प्लास्टिक मनी की आदत डालने का दबाव बनाये रखना चाहिए। सडक़ पर खड़ा सब्जी बेचने वाला, रिक्शेवाला, ढाबे वाला, चायवाला, दूधवाला, धोबी, अखबारवाला, रेहड़ी-पटरीवाला, लेबर को आप कार्ड से या ऑनलाइन पेमेंट करें, और चलते बनें। सरकार चाहती है कि आप अस्पताल से लेकर श्मशान तक ऑन लाइन पेमेंट करें। स्वयंघोषित ‘किंग खान’ टीवी पर अवतरित होकर नसीहत देते हैं, ‘किचन से लेकर कार तक की जरूरतों के लिए चिंता न करें, आर्डर करें, और कार्ड से पेमेंट करें।’ नोटबंदी के बहुत पहले से चीनी कंपनी ‘अलीबाबा’ का एड लोकप्रिय हो रहा है-‘छुट्टे के झगड़े बंद करो/ बारगेन जी भर करो/ अपने प्राइस पे डन करो/ पेटीएम करो!’ ऐसे संगीतमय विज्ञापन पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये जा रहे हैं। कार्ड करेंसी समर्थकों का बस चले, तो इसे राष्ट्रीय तराना घोषित कर दें।
इस समय सबसे चोखा धंधा प्लास्टिक करेंसी कंपनियों का चल रहा है। भारत में ई-कामर्स का विस्तार सालाना 51 फीसदी के दर से हो रहा है, जबकि चीन में यह 18, और जापान में 11 प्रतिशत पर अंटका हुआ है। रिजर्व बैंक के ही आंकड़े हैं कि मार्च 2016 तक क्रेडिट कार्ड के जरिये लेन-देन में 27 फीसदी की वृद्धि हुई है, और डेबिट कार्ड के प्रयोग में 48 प्रतिशत तक इजाफा हुआ है। रिजर्व बैंक के अनुसार, ‘मार्च 2016 तक सात करोड़ 22 लाख 20 हजार लोगों ने क्रेडिट कार्ड के माध्यम से, और 11 करोड़ 28 लाख 70 हजार लोगों ने डेबिट कार्ड के जरिये लेन-देन किया था।’
इतना होने के बावजूद कैश के जरिये कारोबार करने में भारत, इंडोनेशिया और रूस के बाद दुनिया में तीसरे स्थान पर है। ब्रोकरेज ग्रुप ‘सीएलएसए’ के बकौल, ‘भारत की करीब अड़सठ फीसदी आबादी इस समय नकदी में खरीद-फरोख्त करती है। सातवें स्थान पर चीन है, जिसकी 45 फीसदी जनता कैश में कारोबार करती है। जापान में 38 प्रतिशत लोग नगद-नारायण का ध्यान रखते हैं। उस हिसाब से चीन, जापान में काले धन का संचय बिल्कुल कम होना चाहिए। मगर, ऐसा कुछ हुआ नहीं है।
 ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी (जीएफआई) के अनुसार, ‘रूस कालेधन की हेराफेरी के मामले में दुनिया में सबसे टॉप पर है। दूसरे नंबर पर चीन है, जिसके कारोबारी 249.57 अरब डॉलर विश्व के विभिन्न ठिकानों पर कालेधन के रूप में खपा चुके हैं। तो क्या चीनी कारोबारी भारत में काले धन खपा रहे हैं? दूसरा यह कि पचपन प्रतिशत प्लास्टिक करेंसी इस्तेमाल करने वाला चीन, कालेधन के मामले में दुनिया में नंबर दो पर क्यों है? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर वित्तमंत्री अरुण जेटली अपने अबूझ आर्थिक शब्दावली के जरिये दे सकते हैं। अरुण जेटली को चूंकि चुनाव जीत कर आना नहीं है, इसलिए उन्हें अपने देश की जमीनी हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है। चाहे पचपन निर्दोष नागरिक नोट की चाह में मर चुके हों, वित्तमंत्री को एटीएम, बैंकों में दो किलोमीटर लंबी लाइनें कभी दिखी नहीं। लंबी लाइन मोदीजी की जन्मस्थली वडऩगर में नहीं दिखेगी, बाकी देश में तो है!
वित्तमंत्री भारतवासियों को इतनी गारंटी जरूर दें कि कार्ड करेंसी के सर्वाधिक प्रयोग से कालाधन, भ्रष्टाचार जैसी बुराई को वह संपूर्ण रूप से समाप्त कर देंगे। महाराष्ट्र में उन्हीं की पार्टी के को-ऑपरेटिव मंत्री सुभाष देशमुख की गाड़ी से 92 लाख के हजार-हजार वाले पुराने नोट मिले हैं। यह किस तरह का पैमाना है कि छत्तीसगढ़ के नक्सली इलाकों से लाखों के नोट बरामद हों तो उसके बारे में पहले से ही मान लिया जाता है कि वह देशद्रोही गतिविधियों के वास्ते काला धन था, और उससे चार गुना नोट संघ व भाजपा के नेताओं के ठिकानों से बरामद हो तो वह राष्ट्र निर्माण के वास्ते संचित धन हो जाता है?
इस नोटबंदी के साइडइफेक्ट को देखिये। समाज में उनके विरूद्ध आक्रोश और घृणा का वातावरण बनने लगा है, जो संपन्न और खाते-पीते घरों के हैं। जो उद्योग धंघे चला रहे हैं, बड़े व्यापारी हैं, उनके बारे में यही इमेज बना है कि उन्होंने काले धन को सफेद करने के वास्ते अपने वर्करों को लाइन में खड़ा किया, और ऐसे लोगों को नोटबंदी से कोई फर्क नहीं पड़ा है। कुछ हद तक यह सही भी है कि कई सारे लोगों ने सरकारी तंत्र, हवाला, बुलियन व्यापार, व तात्कालिक उपायों का दुरूपयोग किया है। लेकिन इससे हुआ यही कि देश में वर्ग संघर्ष वाली सोच को मजबूती मिल रही है, जिसे उकसाने में स्वयं प्रधानमंत्री मोदी लग गये।
गोवा से गाजीपुर तक पीएम मोदी ने यही संदेश दिया है कि कालेधन जमा करने वाले देश और समाज के दुश्मन हैं। दूसरी ओर आप स्मार्ट सिटी भी बनाना चाहते हो। उस स्मार्ट सिटी में करोड़ों के अपार्टमेंट खऱीदेगा कौन? सही तस्वीर देखनी हो तो ग्रेटर नोएडा से लेकर गुडग़ांव, मेरठ, सोनीपत तक की परिधि में बने लाखों खाली पड़े, भूतहा हो चुके फ्लैटों को देख लीजिए। पश्चिम से लेकर दक्षिण भारत के राज्यों तक चले जाइये, जहां करोड़ों खाली फ्लैटों के खरीदार नहीं मिल रहे। इस देश में रीयल इस्टेट इंडस्ट्री बर्बाद हो चुकी है। तथाकथित काले धन के विरूद्ध जो हाहाकारी अभियान आगे शुरू होगा, उससे इस कारोबार की और भी मिट्टी पलीद होनी है।
इस समय मोदी को मसीहा बनाने वाले सूचना प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू का नंबर बाकी नेताओं से आगे है। वेंकैंया जी को यह इश्यू बनाना है कि उरी में सेना की शहादत को करेंसी लाइन में मरे लोगों से तुलना करने की जुर्रत गुलाम नबी आ•ााद ने कैसे की? वह भी एक मुसलमान नेता ने। गुलाम नबी आ•ााद की टिप्पणी को सांप्रदायिक, देशविरोधी चश्मे से देखना वास्तव में राजनीतिक शरारत है। आतंकवाद की वजह से, नोटबंदी के मुश्किल दौर में जो निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं, क्या उनकी मृत्यु को कीड़े-मकोड़े की मौत मान लें ? यह देश सिस्टम की सफाई के नाम पर सत्ता का क्रूरतम चेहरा दिनों-दिन देख रहा है। हमारे देश के नागरिक एक एटीएम से दूसरे एटीएम दर-दर भटकेंगे। अपने ही पैसे के लिए भिखारियों की तरह लाइन में लगे रहेंगे, ऐसा दृश्य 2002 में मैंने जर्मनी में रहते नहीं देखा था, जब डॉयच मार्क के बदले यूरो में मुद्रा को परिवर्तित करने की कवायद हुई थी।
सरकार के एक जूनियर मंत्री हैं किरेन रिजीजू। नये नोट के आये जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुए, मंत्री जी ने सुनिश्चित कर लिया कि नोटबंदी से नेपाल, बांग्लादेश, पूर्वोत्तर के रास्ते जाली नोट का आना बिल्कुल बंद हो गया है। रिजीजू के अनुसार, ‘टेरर फंडिंग, तस्करी संपूर्ण रूप से बंद है।’ सचमुच, दस दिन में चमत्कार हो गया! गृह राज्य मंत्री किरेन रिजीजू इसे उपलब्धि मानते हैं कि चीन ने मोदी जी द्वारा नोटबंदी को सराहा है। चीन सराहेगा ही। क्योंकि, भारतीय नोटबंदी से चीनी कार्ड करेंसी बनाने वालों को यहां कमाई का अपार अवसर मिलने जा रहा है।
चीनी ई-कामर्स कंपनी ‘अलीबाबा’ के मालिक जैक मा नवंबर 2014 में पहली बार भारत आये थे। उन्हीं दिनों चीन के आर्थिक विश्लेषकों को भारत में तेजी से उदित होता मिडिल क्लास, उसी स्पीड में बढ़ता ‘ट्रेंड लेबर वर्कफोर्स’ में ई-कामर्स की विशाल संभावना दिख रही थी। 2014 में चीनी ई-कामर्स का मार्केट साइज 426. 26 अरब डॉलर का था। उस अवधि में भारत में ई-कामर्स का आकार सिर्फ 5. 3 अरब डॉलर तक सीमित था। एसोचैम-प्रिंसवाटर हाउस कूपर स्टडी बताती है कि 2016 में 30 अरब डॉलर का भारतीय ऑनलाइन व्यापार 2020 तक सौ अरब डॉलर पार कर जाएगा। चीन की दिग्गज कंपनी अलीबाबा का भारत के कैशलेस व्यापार में ‘पेटीएम’ के जरिये आक्रामक रूप से कदम रखना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इलेक्ट्रॉनिक बटुआ कंपनी ‘मोबिकविक’ में ‘जियोमी’ पार्टनर है। अलीबाबा-अलीपे, की प्रतिस्पर्धी पेइचिंग स्थित डी.एच.गेटडॉट कॉम, ‘शुन्वेई कैपिटल’, बाइदू, अमेरिका की फोरेक्स, सिलिकोन वेली का ‘शॉप क्लू’ जैसी अनगिनत कंपनियां भारत के कैशलेस कार्ड के व्यापार में जिस तरह दिलचस्पी दिखा रही हैं, उससे इस देश की करेंसी व्यवस्था की दिशा ही बदल जाएगी।
भारत की प्लास्टिक करेंसी व्यवस्था को जब चीनी नागरिक नियंत्रित करेंगे, तब आपकी राष्ट्रभक्ति पर सवाल क्यों नहीं खड़ा होना चाहिए? उन इलेक्ट्रॉनिक अपराधियों के बारे में सोचा है, जिनकी निगाहें कैशलेस करेंसी पर रहती है? दुनिया में सबसे अधिक यूएई में कार्ड के जरिये फ्राड हुआ है। चीन, भारत, और अमेरिका भी साइबर अपराधियों के आगे लाचार रहे हैं। मगर, इस वक्त ऐसे सवाल न ही उठायें, तो अच्छा है!
pushpr1@rediffmail.com


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