और अंत में कालेधन के लिए एक और छूट

राजेंद्र शर्मा : बहुत उदार हों तब भी इसे खोदा पहाड़ और निकली चुहिया का ही मामला कहेंगे। वरना यह काले धन के स्वामियों के लिए छूट की एक नई योजना ही ज्यादा लगती है।...

राजेंद्र शर्मा

बहुत उदार हों तब भी इसे खोदा पहाड़ और निकली चुहिया का ही मामला कहेंगे। वरना यह काले धन के स्वामियों के लिए छूट की एक नई योजना ही ज्यादा लगती है। याद रहे कि यह योजना पूरे देश की अर्थव्यवस्था को और खासतौर पर मेहतनकश गरीबों की रोजी-रोटी की पहले ही नाजुक व्यवस्थाओं को, बुरी तरह से उलट-पुलट कर डालने वाली नोटबंदी ठीक तीन हफ्ते बाद लाई गई है। यह भी याद रहे कि जनसाधारण से इस नोटबंदी की सारी परेशानियां बर्दाश्त कर लेने की सिर्फ इसी आधार पर अपील की जा रही थी कि नोटबंदी से कालेधन का जड़ से सफाया हो जाने वाला है। मोदी सरकार ने आयकर कानून में संशोधन के नाम पर यह व्यवस्था पेश की है। प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, नोटबंदी के बाद आयकर के हिसाब से वैध आय से अधिक यानी काली कमाई जब्तशुदा नोटों में बैंकों में जमा कराने वाले लोगों से कहा जा रहा है कि वे 30 दिसंबर तक खुद ही अपनी काली कमाई का ऐलान कर दें। ऐसा करने वालों को अपनी इस अघोषित काली आय का 30 फीसद कर, 10 फीसद जुर्माना और कुल कर राशि पर 33 फीसद या कुल का करीब 10 फीसद गरीब कल्याण अधिभार के रूप में यानी कुल 50 फीसद से कुछ कम, सरकार के हवाले करना होगा। शेष 50 फीसद राशि वे सफेद कमाई के रूप में अपने पास रख सकते हैं।
याद रहे कि नोटबंदी से चंद हफ्ते पहले ही खत्म हुई कालेधन की घोषणा की योजना में इससे सिर्फ पांच फीसद कम, 45 फीसद कर वसूल किए जाने का प्रावधान था। हां! इस नई योजना में इतना अंतर जरूर है कि बची हुई 50 फीसद से कुछ ज्यादा राशि में से आधी राशि चार साल तक प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के खाते में जमा रखनी पड़ेगी और इस राशि पर कोई ब्याज नहीं दिया जाएगा। दूसरी ओर, उक्त आखिरी तारीख तक खुद काली कमाई घोषित न किए जाने की सूरत में, कर अधिकारियों द्वारा काली कमाई पकड़ी जाती है तो कर और जुर्माना मिलाकर, कुल 85 फीसद सरकारी खजाने में जाएगा और शेष 15 फीसद ही सफेद कमाई के रूप में इस पैसे के मालिक के हाथ में बचेगा। यह दूसरी बात कि कालेधन के एक हिस्से के इस तरह सफेद किए जाने को शब्दों के खेल के जरिए, इस पैसे का ‘औपचारिक अर्थव्यवस्था में आना’ कहकर महिमामंडित ही किया जा रहा है। कालेधन का एक हिस्सा सफेद करने के इस मौके के ही हिस्से के तौर पर ‘गरीब कल्याण योजना’ को आगे बढ़ाया जा रहा होगा, सो अलग! इस तरह विडंबनापूर्ण तरीके से कालेधन के खिलाफ युद्घ, मेहनतकश जनता तथा आम तौर पर अर्थव्यवस्था के सारे नुकसान के बाद, कालेधन को कुछ नुकसान के साथ सफेद बनाए जाने की छूट बनकर दम तोड़ता न•ार आ रहा है।
मोदी सरकार की कालेधन के खिलाफ जंग का ऐसा हश्र होने पर काफी लोगों को हैरानी होगी, लेकिन वास्तव में इसमें हैरानी की कोई बात है नहीं। कालेधन को सफेद करने के लिए, तीन महीने की छूट की योजना के खत्म होने के फौरन बाद जब कोई सरकार, कालेधन के खिलाफ नोटबंदी के जरिए जंग का ऐलान करती है, तो ऐसी जंग की सीमाएं खुद-ब-खुद रौशन हो जाती हैं। बात सिर्फ इतनी नहीं है कि नोटबंदी के जरिए यह जंग सिर्फ कालेधन के उस छोटे से हिस्से के खिलाफ चलाई जा रही थी, जिसे नोटों की शक्ल में और जाहिर है कि सुविधा के लिहाज से बड़े से बड़े नोटों की शक्ल में, जमा कर के रखा जा रहा होगा। जानकारों के अनुसार, यह कुल कालेधन का छ: फीसद से ज्यादा हिस्सा नहीं है। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि काला धन, काली अर्थव्यवस्था में प्रवाहित हो रहा होता है और पूंजीवादी व्यवस्था में न सिर्फ काली तथा सफेद अर्थव्यवस्थाओं के बीच कोई स्पष्टï दीवार नहीं होती है, सफेद अर्थव्यवस्था की ही तरह, काली अर्थव्यवस्था भी मुनाफे की ललक से ही संचालित होती है। अचरज की बात नहीं है कि विकसित से विकसित पूंजीवादी व्यवस्थाओं में भी काली अर्थव्यवस्था न सिर्फ बनी हुई है बल्कि भारत की ही तरह खूब फल-फूल भी रही है। कालेधन के खिलाफ जेहाद की कोई भी कोशिश, जो अर्थव्यवस्था को संचालित करने के लिए निजी मुनाफे की ललक को ज्यादा से ज्यादा मुक्त ही करने की चिंता पर आधारित हो, कालेधन की जड़ निजी पूंजी की मुनाफे की हवस पर कैसे हमला कर सकती है? ऐसे किसी भी कथित जेहाद का कालेधन के साथ ही किसी न किसी तरह के समझौते पर समाप्त होना तय है। ठीक यही हो रहा है।
यह सिर्फ संयोग ही नहीं है कि आयकर कानून में संशोधन के नाम पर, कालेधन के लिए छूट की यह नई योजना, संसद के सामने ठीक उसी दिन पेश की गई है, जिस रोज प्राय: समूचे विपक्ष के आह्वïान पर देश भर में नोटबंदी को ही लेकर ‘आक्रोश दिवस’ मनाया जा रहा था। इस देशव्यापी विरोध प्रदर्शन को ‘एक विफल भारत बंद’ में तब्दील करने में मोदी सरकार और भाजपा को भले ही कुछ कामयाबी मिल गई हो, तीन सप्ताह बाद अब यह किसी से छिपा हुआ नहीं है कि नोटबंदी ने देश व आम जनता के आर्थिक जीवन पर बहुत भारी आघात किया है। पूर्व-प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जीडीपी में दो फीसद की गिरावट की भविष्यवाणी, अपनी सारी अनिष्टïसूचकता के बावजूद इस सच्चाई को पूरी तरह से सामने नहीं ला पाती है कि इस तुगलकी कदम की सबसे ज्यादा मार, अर्थव्यवस्था के सबसे कमजोर हिस्से यानी समग्रता में अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़ रही है, जिससे देश की कुल श्रमशक्ति का दो-तिहाई से ज्यादा हिस्से की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है। देर-सबेर इस मार का असर, मोदी निजाम के खिलाफ असंतोष के बढऩे के रूप में भी सामने आना ही है। इसलिए, अचरज की बात नहीं है कि मोदी सरकार अब कालेधन के खिलाफ जेहाद की मुद्रा से पीछा छुड़ाकर, ‘गरीब कल्याण के लिए कोष’ जुटाने की ‘सफलता कथा’ गढऩे की ओर ही बढ़ती न•ार आ रही है। यह दूसरी बात है कि उसके नोटबंदी के कदम ने जिस विध्वंस को उन्मुक्त कर दिया है, नकदी की गंभीर किल्लत समेत उसके विभिन्न दुष्परिणाम, देश को कम से कम अगले साल में तो भुगतने पड़ ही रहे होंगे। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस विध्वंस के फलस्वरूप खेती से लेकर छोटे कारोबार तथा छोटे व्यापार तक पर गहरी चोट करने के जरिए, देसी-विदेशी बड़ी पूंजी का ही रास्ता आसान बनाया जा रहा होगा। कैशलैस अर्थव्यवस्था की मुहिम से लेकर ई-वोलेटों के लिए बढ़ावे तक, सब इसी के इशारे हैं।


 

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

Deshbandhu के आलेख