एशियाई राजनीति के भीष्मपितामह ली कुआन यू

डॉ. गौरीशंकर राजहंस : संसार में कभी-कभी ही ऐसे युग पुरुष आते हैं जो अपनी दूरदर्शिता और अथक परिश्रम से मिट्टी को सोना बना देते हैं। ऐसे ही युग पुरुष थे सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री 'ली कुआन यूÓ जिनका 91 वर्ष की उम्र में पिछले दिनों सिंगापुर में निधन हो गया। इससे एशिया की राजनीति में ऐसे क्षति हो गई जिसे भर पाना निकट भविष्य में असंभव है। ...

डॉ गौरीशंकर राजहंस

संसार में कभी-कभी ही ऐसे युग पुरुष आते हैं जो अपनी दूरदर्शिता और अथक परिश्रम से मिट्टी को सोना बना देते हैं। ऐसे ही युग पुरुष थे सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री 'ली कुआन यूÓ जिनका 91 वर्ष की उम्र में पिछले दिनों सिंगापुर में निधन हो गया। इससे एशिया की राजनीति में ऐसे क्षति हो गई जिसे भर पाना निकट भविष्य में असंभव है।
अनेक प्रसिद्ध इतिहासकारों ने लिखा है कि प्राचीनकाल में बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म का प्रचार करने हजारों भारतीयों का झुंड दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्व एशिया गया था। वे कालान्तर में वहीं बस गये थे। भारतीयों का झुंड जो थाईलैंड (सियाम), लाओस, कंबोडिया और वियतनाम गया था वैसा ही झुंड इंडोनेशिया और मलय द्वीप भी गया था। वे लोग वहीं जाकर बस गये थे। जो झुंड मलय द्वीप गया था उसने उसके सबसे खूबसूरत शहर का नाम उन्होंने 'सिंहपुरÓ रखा था। जब अंग्रेजों ने मलय द्वीप पर कब्जा कर लिया तो इस शहर का नाम 'सिंगापुरÓ रख दिया।
अंग्रेज रबड़ की खेती के लिए दक्षिण भारत से अनेकों जहाजों में भरकर भारतीय श्रमिकों को मलय द्वीप ले गये। बाद में 1965 में मलय द्वीप दो भागों में बंट गया। वे अलग-अलग मलेशिया और सिंगापुर देश कहलाए। परन्तु जब 1959 में सिंगापुर अंग्रेजों से आ•ााद हो गया तभी से 1990 तक ली कुआन यू सिंगापुर के प्रधानमंत्री बने रहे। उन्होंने अपनी दूरदर्शिता से दीनहीन सिंगापुर को कठोर परिश्रम करके संसार के सबसे धनी देशों की श्रेणी में ला दिया। एशिया का तो वह निश्चित रूप से संपन्न देश बन गया। अमेरिका और ब्रिटेन के प्रसिद्ध समाचारपत्रों को समय-समय पर इन्टरव्यू देकर ली ने कहा कि सिंगापुर का तो पहले कोई अस्तित्व ही नहीं था। उन्होंने दृढ़ इच्छाशक्ति और कठोर परिश्रम से इसे संसार के अग्रगण्य देशों की श्रेणी में ला दिया। अमेरिका के प्रसिद्ध समाचार पत्र 'न्यूयार्क टाइम्सÓ को इन्टरव्यू देते हुए ली ने कहा था कि पहले सिंगापुर नाम का कोई देश ही नहीं था। इसका कोई अस्तित्व ही नहीं था। उन्होंने कहा 'हमारे पास राष्ट्र होने के लिए जरूरी प्राथमिक चीजें नहीं थीं। उदाहरण के लिए एक जैसी आबादी, समान भाषा, समान संस्कृति और समान नियति। हमारे पास कुछ भी नहीं था। इसके विपरीत सिंगापुर में चीनी, मलय और भारतीय की जातीय और धार्मिक खिचड़ी थी जो कभी भी भड़क सकती थी। ये सब ऐसे नगर राज्य में इक_े हो गये थे जिसमें कोई प्राकृतिक संसाधन भी नहीं थे।Ó
इन सब कमियों के बावजूद ली ने सिंगापुर को एशिया का सबसे संपन्न देश बना दिया, दृढ़ इच्छाशक्ति और कठोर परिश्रम के बल पर। उन्होंने आम जनता को पूरी स्वतंत्रता दे रखी थी। परन्तु पश्चिम के लोकतंत्र में वे विश्वास नहीं करते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि एशियाई देशों का इतिहास पश्चिम के देशों से भिन्न है। अत: एशियाई देशों को पश्चिम के देशों का आंख मूंदकर नकल नहीं करनी चाहिये। वे बराबर कहा करते थे कि किसी खास व्यक्ति की संपन्नता से आवश्यक है पूरे समाज और पूरे देश की जनता की संपन्नता। इसके लिए उन पर कभी-कभी तानाशाह होने के भी आरोप लगे थे। परन्तु उन्होंने इसकी जरा भी परवाह नहीं की। जरूरत पडऩे पर उन्होंने थोड़े दिनों के लिए लोगों की बोलने की आ•ाादी पर भी यह कह कर नियंत्रण लगाया कि बेवजह फालतू बात करने से देश का नुकसान होता है। वे हमेशा कहा करते थे कि व्यक्तिगत अधिकारों से ज्यादा जरूरी है सार्वजनिक कल्याण। इस मामले में उन्होंने इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में लगाई गई इमरजेंसी का भी स्वागत किया था। भारत में लोगों ने ली के इस कथन को पसंद नहीं किया था। इंदिरा गांधी जब सिंगापुर गई थीं तब उन्होंने उनका भव्य स्वागत भी किया था।
ली उदारवादी आर्थिक नीतियों के पक्षधर थे। इसीलिये जब माओ के बाद देंंग चीन के शीर्षस्थ नेता बनकर उभरे तब उन्होंने नियमित रूप से ली से उनके उदारवादी आर्थिक विचारों की सलाह ली और चीन को जकडऩभरी साम्यवादी आर्थिक नीतियों से बाहर निकाला।
भारत के साथ ली के संबंध कुल मिलाकर मधुर ही कहे जा सकते हैं। वे बराबर कहा करते थे कि भारत में अपार संभावनाएं हैं। परन्तु उसे घिसे पिटे समाजवादी नीतियों से बाहर निकलना होगा। इसीलिये जब भारत ने नरसिम्हराव के समय में उदारवादी आर्थिक नीति अपनाई तो ली ने उसका भरपूर स्वागत किया। उन्होंने नरसिम्हा राव की 'लुक इस्टÓ विदेश नीति की सराहना करते हुए कहा कि यह तो पहले ही हो जाना चाहिये था। उन्होंने कहा कि चीन की जनता कठोर परिश्रम करती है। परन्तु भारत की आम जनता आराम करती है। यदि वह चीनियों की तरह ही कठोर परिश्रम करना सीख ले तो भारत बहुत जल्द चीन की बराबरी में आ जाएगा।
ली शुरू से ही चाहते थे कि भारत दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन 'आसियानÓ का सदस्य बन जाए। परन्तु शुरू में भारत सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। बाद में जब वह 'आसियानÓ का सदस्य बनना चाहता था तब तक देर हो चुकी थी। फिर भी ली के प्रयास से भारत 'आसियानÓ का 'डायलॉगÓ पार्टनर तो बन ही गया।  कुछ वर्ष पहले जब ली 'नेहरू मेमोरियल भाषणÓ देने दिल्ली आए थे तब उन्होंने कहा था कि देर आए दुरूस्त आए। भारत आर्थिक उदारता के रास्ते पर देरी से आया पर अब उसे आगे बढऩे से कोई नहीं रोक सकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने सिंगापुर का दौरा किया था और ली और मोदी तभी से घनिष्ठ मित्र हो गये थे। यह प्रसन्नता की बात है कि ली के अंतिम संस्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 29 मार्च को सिंगापुर जा रहे हैं। कहते हैं कि स्वच्छता और अनुशासन का पाठ मोदी ने ली से ही सीखा था।
ली इसी वर्ष मलेशिया से सिंगापुर के अलग होने की 50वीं वर्षगांठ मनाना चाहते थे। परन्तु ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि ली कुआन यू ने हर एशियावासी को संसार में एक गौरवपूर्ण स्थान प्रदान किया। 
(लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)

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