एक साल, बुरा हाल

सीताराम येचुरी : पिछले एक साल में प्रधानमंत्री मोदी ने पूरी 18 विदेश यात्राएं कर रिकार्ड कायम किया है। जहां देश और जनता की चाह थी कि प्रधानमंत्री ने घरेलू समस्याओं से निपटने पर अपना ज्यादा ध्यान लगाया होता, आरएसएस इस पर संतोष जता रहा है कि प्रधानमंत्री की इन यात्राओं की मदद से उसका ताना-बाना अब दुनिया के 40 देशों में फैल चुका है!...

सीताराम येचुरी

पिछले एक साल में प्रधानमंत्री मोदी ने पूरी 18 विदेश यात्राएं कर रिकार्ड कायम किया है। जहां देश और जनता की चाह थी कि प्रधानमंत्री ने घरेलू समस्याओं से निपटने पर अपना ज्यादा ध्यान लगाया होता, आरएसएस इस पर संतोष जता रहा है कि प्रधानमंत्री की इन यात्राओं की मदद से उसका ताना-बाना अब दुनिया के 40 देशों में फैल चुका है! जाहिर है कि आरएसएस के प्रचारक की जिम्मेदारी वह आज भी बड़ी मुस्तैदी से पूरी कर रहे हैं।
तीन देशों की अपनी यात्रा के क्रम में आखिरी देश में अनिवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने गरज कर कहा कि पहले तो भारतीय अनिवासियों को खुद को भारतीय कहते शर्म आती थी, पर अब नरेंद्र मोदी की सरकार के राज में वे खुद को भारतीय कहने में गर्व का अनुभव करते हैं। अच्छा होता कि ऐसा बेतुका दावा करने से पहले प्रधानमंत्री और भाजपा ने ऐसे अनगिनत अनिवासी भारतीयों से भी पूछ लिया होता, जिन्होंने हमेशा बड़ी दृढ़ता से अपनी भारतीय नागरिकता की हिमायत की है और अपना भारतीय पासपोर्ट हर हाल में बनाए रखा है।
इसके अलावा भी, पिछले एक साल के दौरान देश के और सारी दुनिया के कान यह सुन-सुनकर पक गए हैं कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा, स्वतंत्र भारत में छ: दशक में एक के बाद एक आई सरकारों के छोड़े खंडहरों पर, एक नये भारत का निर्माण कर रहे हैं। यह दूसरी बात है कि यह दावा करने के चक्कर में वे एक तरह से अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार के छ: साल के कार्यकाल तक की ओर से आंख मूंदने का अन्याय करते हैं। बेशक, इन छ: दशकों में देश की जनता से किए गए ढेरों वादे पूरे नहीं किए गए हैं, देश के संसाधनों को निर्ममता से लूटा गया है और हमारी जनता का शोषण बढ़ता ही गया है। बहरहाल, जनाब मोदी की जनसंपर्क की इस कसरत का इस सबसे से क्या लेना-देना है? उसका तो सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद है, यह छवि बनाने की कोशिश करना कि एक यही सरकार है, जो भारत का उद्घार कर सकती है।
लेकिन, इन दावों के विपरीत, अगर व्यापक मानकों पर भी परखा जाए तो, अब तक इतना तो साफ हो ही चुका है कि तिहरे हमले का नया त्रिशूल देश और जनता पर चलाया जा रहा है। इस त्रिशूल का पहला शूल है, आर्थिक सुधार की नवउदारवादी नीतियों का आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया जाना। दूसरा शूल है, सांप्रदायिक धु्रवीकरण बढ़ाने के जरिए, भारतीय गणतंत्र के जनतांत्रिक आधार पर लगातार जारी प्रहार। और तीसरा शूल है, जनतांत्रिक संस्थाओं को तथा संसदीय जनतंत्र में पवित्र समझे जाने वाले नियम-कायदों को कमजोर करने के जरिए, तानाशाही के रास्ते पर बढ़ जाना।
इस एक साल में मोदी सरकार ने, मनमोहन सिंह की पिछली सरकार के नवउदारवादी आर्थिक सुधारों के रास्ते पर ही लगातार तथा और भी आक्रामक तरीके से कदम बढ़ाए हैं। हमारी अर्थव्यवस्था के सभी प्रमुख क्षेत्रों के दरवाजे विदेशी प्रत्यक्ष निवेशों के लिए और ज्यादा खोल दिए गए हैं। खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जैसे अनेक मामलों में भाजपा, पहले के अपने रुख से पल्टी भी मारने के लिए तैयार हो गई है। इस सिलसिले में सबसे नंगईभरा मामला भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का है, जिसे उसने 2013 के कानून के लिए संसद में अपने समर्थन से पलटते हुए, वह तीसरी बार आगे बढ़ रही है। जाहिर है कि इस मामले में मोदी सरकार को एक ही चिंता संचालित कर रही है, कैसे विदेशी तथा घरेलू कार्पोरेटों के हवाले जमीन कर के उनके मुनाफे अधिकतम किए जाएं, भले ही इसके लिए किसानों के विशाल हिस्सों को बर्बाद ही करना पड़े। देश की खनिज तथा अन्य तमाम प्राकृतिक संपदा के दरवाजे विदेशी तथा देसी कार्पोरेटों की लूट के लिए खोले जा रहे हैं। इसके साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण के महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए जा रहे हैं। दरबारी पूंजीवाद का बोलबाला है।
इसके बावजूद, इस एक साल में राष्टï्रीय आय की गणना के सांख्यिकीय आधार वर्ष को ही आगे खिसकाया गया है, ताकि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्घि दर को और रंग-चुनकर पेश किया जा सके। इसके बावजूद, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है कि विनिर्माण तथा उद्योग की वृद्घि दर बढक़र ही नहीं दे रही है। कार्पोरेटों के हाथों में अनबिके उत्पादों के अंबार जमा हो गए हैं। इसी का नतीजा है कि रोजगार में खासी गिरावट हो रही है और बेरोजगार युवाओं की कतारें लंबी से लंबी होती जा रही हैं। इसके साथ ही सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों का बढऩा लगातार जारी है और तेल के दाम में एक के बाद एक, बड़ी बढ़ोतरियां हुई हैं। इस सबसे जनता के विशाल हिस्से के लिए जाना और मुश्किल हो गया है।
कृषि में बदहाली गहराती जा रही है। आकाादी के बाद पहली बार ऐसा हो रहा है खेती के कुल रकबे में गिरावट आने की बात कही जा रही है। कृषि लागतों की कीमतों में बढ़ोतरी और सब्सिडियों में भारी कटौती के चलते अनेक किसानों को कृषि ऐसा कार्य लगने लगी है जो उन्हें दो जून की रोटी मुहैया कराने के लिए नाकाफी है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि बदहाल किसानों की आत्महत्याएं निरंतर जारी हैं। मजदूरों की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में वेतन का हिस्सा अब 10 फीसद से थोड़ा ही ऊपर है जो 1990-91 में 25 फीसद से ज्यादा होता था।
दूसरी ओर, अमीर और अमीर हो रहे हैं। फोब्र्स की 2014 की सूची के अनुसार भारत में 100 सबसे धनी व्यक्ति डॉलर अरबपति हैं (और एक अरब डॉलर, 6,400 करोड़ रुपए से ज्यादा की रकम होती है)। उसकी 2011 की सूची में ऐसे डॉलर अरबपतियों की संख्या 55 थी, जिनमें 45 की और बढ़ोतरी हो कर अब यह संख्या 100 हो गई है। इन 100 डॉलर अरबपतियों की कुल दौलत 346 अरब डॉलर है। परिवारों की कुल दौलत में ऊपर के एक फीसद का हिस्सा वर्ष 2014 में 49 फीसद हो गया जो वर्ष 2000 में 36.8 फीसद था।
इस सरकार ने जनता से जिन अच्छे दिनों का वादा किया था वह भ्रम से अब दु:स्वप्न में बदल रहा है। इस एक साल में दो भारतों के बीच की खाई और ज्यादा चौड़ी हो गई है।
इसके साथ ही साथ अपनी विचारधारात्मक प्रतिबद्घता के अलावा इस सरकार के संरक्षण में सांप्रदायिक धु्रवीकरण को इसलिए भी तेज किया जा रहा है ताकि बिगड़ती जीवनयापन की स्थितियां जनता को अपने जनविरोध को मजबूत करने के लिए मजबूर न कर दें। आरएसएस के राजनीतिक बाजू के रूप में भाजपा, आधुनिक धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक भारतीय गणराज्य को आरएसएस की परियोजना वाले एक कट्टïर असहनशील फासीवादी ‘‘हिंदू राष्टï्र’’ में तब्दील करने की परियोजना को आगे बढ़ा रही है। घर वापसी और लव जिहाद के सांप्रदायिक अभियानों के साथ ही साथ इतिहास की जगह मिथक और दर्शनशास्त्र की जगह धर्मशास्त्र को बिठाने के उन्मत प्रयास किए जा रहे हैं। इसका परिणाम यह सामने आ रहा है कि पाठ्यक्रमों और अकादमिक शोध संस्थाओं को बदलने की कोशिशें की जा रही हैं। वैज्ञानिक मिजाज पर गंभीर हमले किए जा रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से सांप्रदायिक तनावों और यहां तक दंगों की भी और ज्यादा रिपोर्टें आ रही हैं। मुस्लिम अल्पसंख्यकों और खासतौर से ईसाइयों के गिरजाघरों पर हमलों में भारी बढ़ोतरी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में यह आश्वासन तक देने से इंकार कर दिया कि उनके मंत्रिमंडल के उन सदस्यों तथा सांसदों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी जो नफरत फैलानेवाले भाषण देकर निरंतर कानून का उल्लंघन कर रहे हैं।
एक और स्तर पर लोकसभा में अपने बहुमत की ताकत का इस्तेमाल करते हुए, भले ही यह 31 फीसद मतों से हासिल हुई हो, भाजपा बिना संसदीय जांच-परख के और बिना किसी अर्थपूर्ण बहस के अनेक महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की कोशिश कर रही है।  
ये वास्तव में अपशकुनी संकेत हैं। संसदीय प्रक्रियाओं को दरकिनार करना उस तानाशाही की ओर जाने का निश्चित रास्ता है जो हमारे गणतंत्र की जनतांत्रिक नीवों को नष्टï करने की ओर भी जा सकता है। सांप्रदायिक हमले और कट्टïर हिंदुत्ववादी एजेंडे, जो हमारे शानदार विविधतापूर्ण समाज के सामाजिक सद्भाव को नष्टï करना चाहता है, को आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाए जाने के साथ मिलकर यह सब हमारी संवैधानिक गणतांत्रिक व्यवस्था की नींवों पर बहुत ही खतरनाक हमले की रचना करते हैं।
यह तिहरा खतरा ऐसा है जो भाजपा के नेतृत्ववाली इस एनडीए सरकार के पहले वर्ष के दौरान ही सामने आ गया है। हमारी जनता के बड़े भारी बहुमत पर निर्मम हमले करते हुए यह ‘‘भारत की कल्पना’’ अर्थात् एक धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक गणराज्य को ही कमतर बनाता है। ‘‘न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन’’ के व्यापक पैमाने यही हैं।
प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा दावा करते हैं कि वास्तव में इस एक साल की अवधि के दौरान भ्रष्टïाचार का कोई घोटाला सामने नहीं आया और इसे वे अपनी जीत की तरह से पेश करते हैं। क्या कोई बता सकता है कि यूपीए सरकार के पहले चार वर्षों के दौरान कोई घोटाला सामने आया था? वक्त ही बताएगा कि दरबारी पूंजीवाद को आक्रामक ढंग से लागू करने के परिणामस्वरूप इस मामले में इस सरकार का रिकार्ड क्या रहेगा?

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