इंदिरा के योगदान का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी

एल.एस. हरदेनिया " अगले वर्ष श्रीमती इंदिरा गांधी की 100 वीं जयंती मनाई जाएगी। इसकी तैयारी प्रारंभ हो गई है। यद्यपि केन्द्र सरकार की तरफ से अभी इस संबंध में किसी प्रकार की पहल करने की जानकारी नहीं है परंतु कांग्रेस ने तैयारी प्रारंभ कर दी है।...

एल.एस. हरदेनिया

अगले वर्ष श्रीमती इंदिरा गांधी की 100 वीं जयंती मनाई जाएगी। इसकी तैयारी प्रारंभ हो गई है। यद्यपि केन्द्र सरकार की तरफ से अभी इस संबंध में किसी प्रकार की पहल करने की जानकारी नहीं है परंतु कांग्रेस ने तैयारी प्रारंभ कर दी है। श्रीमती इंदिरा गांधी देश की सर्वाधिक विवादग्रस्त प्रधानमंत्री रही हैं। यदि आपातकाल के समय को छोड़ दें तो इंदिरा गांधी ने हमारे देश को शक्तिशाली और विकसित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
नेहरू परिवार के ऊपर यह आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने वंशवाद को चलाया था। परंतु यह आरोप स्वयं नेहरूजी के ऊपर नहीं लगाया जा सकता। अपने जीवनकाल में उन्होंने एक बार इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया था।  उनके इस निर्णय की अनेक लोगों ने आलोचना भी की थी। सबसे तीखी आलोचना महावीर त्यागी ने की थी जो नेहरूजी के अत्यधिक विश्वसनीय सहयोगी थे। उसके बाद नेहरूजी ने कभी अपने जीवनकाल में इंदिराजी को कोई पद नहीं दिया। नेहरूजी की मृत्यु के बाद लालबहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया गया।
वर्ष 1966 में रूस के नगर ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच में समझौता वार्ताएं आयोजित की गई थीं। इन वार्ताओं का आयोजन तत्कालीन सोवियत नेताओं ने किया था। ताशकंद में ही शास्त्रीजी की आकस्मिक मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु को लेकर तरह-तरह की शंकाएं भी व्यक्त की गई थीं, जो शायद बेबुनियाद थीं। शास्त्रीजी की मृत्यु से देश पर एक गंभीर राजनैतिक संकट आ गया था। किसे प्रधानमंत्री बनाया जाए, यह सवाल अत्यधिक उलझनपूर्ण था। प्रधानमंत्री पद के लिए मोरारजी भाई का दावा पेश किया गया। परंतु कांग्रेस के अनेक दिग्गज उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहते थे। मोरारजी भाई एक अत्यधिक दृढ़प्रतिज्ञ व्यक्ति थे। वे जिस बात का फैसला कर लेते थे तो उससे पीछे नहीं हटते थे। उनके व्यवहार में अधिनायकशाही के तत्व भी थे। इसलिए कांग्रेस के अनेक नेताओं ने इंदिरा गांधी का समर्थन किया। जिनने इंदिरा गांधी का समर्थन किया वे सोचते थे कि इंदिराजी उनके नियंत्रण में ही देश का शासन चलाएंगी। जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी थीं, तब उनको अनेक लोग गुडिय़ा प्रधानमंत्री कहते थे।
प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिराजी को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रपति पद के चयन को लेकर थी। कांग्रेस के अनेक बड़े नेताओं ने संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति बनाने की पहल की। इंदिराजी को शंका थी कि संजीव रेड्डी के माध्यम से उन्हें कमजोर करने का प्रयास किया जाएगा और ऐसा प्रयास शुरू हुआ भी। प्रारंभ में इंदिराजी ने संजीव रेड्डी को अपना समर्थन दिया परंतु बाद में उन्होंने अपना समर्थन वापिस ले लिया और व्ही.व्ही. गिरी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया गया। इस मामले में भी इंदिराजी ने कूटनीतिक दक्षता दिखाई और सार्वजनिक रूप से व्ही.व्ही. गिरी को अपना समर्थन घोषित नहीं किया। इसके स्थान पर उनकी ओर से यह घोषणा की गई कि राष्ट्रपति के चुनाव के लिए सभी सांसद और विधायक अपनी आत्मा की आवाज के अनुसार मतदान करें। इस रणनीति को भारी सफलता मिली और व्ही.व्ही. गिरी राष्ट्रपति चुन लिए गए। अपनी इस चुनावी नीति को जनसमर्थन पाने के लिए इंदिराजी ने एक अत्यधिक मौलिक रास्ता अपनाया। उस समय तक देश के सभी बैंक पूंजीपतियों के नियंत्रण में थे। बैंकों में जमा पैसा राष्ट्र के विकास में कम ही काम आता था। गरीब लोगों के लिए तो बैंक के दरवाजे लगभग बंद रहते थे। इंदिराजी ने अनेक प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इससे देश की जनता में इंदिराजी की लोकप्रियता पर चार चांद लग गए।
बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर उन्होंने देश के औद्योगिक एवं व्यावसायिक निहित स्वार्थों को कमजोर कर दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने राजा-महाराजाओं के प्रिवीपर्स समाप्त कर दिए। जब देश के सभी राजे-रजवाड़ों का भारतीय संघ में विलय किया गया तब उस समय सरदार वल्लभ भाई पटेल ने उन्हें प्रिवीपर्स की सुविधा दी थी। इस प्रिवीपर्स के माध्यम से सभी राजे-रजवाड़ों को बड़ी तादाद में पैसा मिलता था। ये सभी राजे-रजवाड़े उन सारी नीतियों के विरोध में थे जिन पर कांग्रेस चलना चाहती थी। इनमें विशेषकर भूमि सुधार से संबंधित पहल थी। इस बात की पूरी संभावना थी कि इन नीतियों के विरोध करने के लिए उद्योगपति और सामंत एक हो सकते थे। परंतु इस एकता के लिए जो आर्थिक संसाधन उनके पास थे उन्हें इंदिरा गांधी ने एक झटके में छीन लिए। बैंकों की सुविधा गरीबों को मिल गई और राजे-रजवाड़े सुविधाविहीन हो गए। बहुसंख्यक राजा और महाराजा अपनी जनता के साथ मानवीय व्यवहार नहीं करते थे इसलिए उन्हें उन राज्यों की जनता नापसंद करती थी। प्रिवीपर्स लेने के बाद इन क्षेत्रों की आम जनता प्रसन्न हुई। इस तरह बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवीपर्स की समाप्ति से नेहरू और इंदिराजी की लोकप्रियता में वृद्धि हुई। इसी दौरान पाकिस्तान के शासकों ने उस समय के पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर तरह-तरह की ज्यादतियां प्रारंभ कीं। पाकिस्तान के शासकों ने पूर्वी पाकिस्तान तो आज का बांग्लादेश है, के ऊपर उर्दू को लादने की कोशिश की।  इसी दरम्यान संपन्न हुए चुनाव में मुजीबुर्रहमान और उनकी आवामी लीग को बहुमत प्राप्त हो गया। इसके बावजूद उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया और तरह-तरह के षडय़ंत्र कर मुजीबुर्रहमान को परेशान किया गया। जब बांग्लादेश में असंतोष भडक़ने लगा तो मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर देश से बाहर भेज दिया गया। बांग्लादेश की जनता की स्थितियां देखते हुए श्रीमती गांधी ने हस्तक्षेप करना उचित समझा और लगभग पाकिस्तान से युद्ध जैसी स्थिति निर्मित हो गई। अंतत: पूर्वी पाकिस्तान, पाकिस्तान से अलग हो गया और उसके बाद इंदिराजी ने भारतीय संसद में घोषणा की कि शीघ्र ही ढाका एक नए देश की राजधानी बनने वाली है। इस घटना से इंदिराजी की लोकप्रियता में भारी वृद्धि हुई और पाकिस्तान को कमजोर करने की उनकी मुहिम का सभी जगह स्वागत हुआ। इसी बीच उनके विरूद्ध चुनाव याचिका के चलते उनकी लोकसभा की सदस्यता निरस्त कर दी गई। इस निर्णय के तुरंत बाद सारे देश में उनके इस्तीफे की मांग होने लगी। उनके विरूद्ध अनेक विपक्षी पार्टियां एक हो गईं और सारे देश में असंतोष भडक़ाने का प्रयास जारी हो गया। इस स्थिति का सामना करने के लिए इंदिराजी ने आपातकाल की घोषणा कर दी। आपातकाल के साथ-साथ उन्होंने अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी। इससे उनकी लोकप्रियता का ग्राफ  एकाएक नीचे गिर गया। वैसे इस संदर्भ में इस बात का भी स्मरण रखना चाहिए कि विपक्षी पार्टियों की तरफ  से कुछ ऐसी बातें कही जाने लगी थीं जिनका मुकाबला करने के लिए आपातकाल लगाना आवश्यक समझा गया था। विशेषकर कई विपक्षी दलों ने फौज और पुलिस से भी विद्रोह करने की अपील की थी, जो शायद किसी भी दृष्टि से उचित नहीं था। लोकतंत्र व्यवस्था में यदि एक बार फौज का हस्तक्षेप हो जाए तो फिर ज्यादा दिन तक लोकतंत्र नहीं टिकता है, जैसा कि पाकिस्तान समेत अनेक उन देशों में हुआ जहां फौज ने सत्ता संभाली थी। वर्ष 1977 के आते-आते इंदिराजी ने स्वयं आपातकाल की घोषणा को वापस ले लिया, चुनाव करवाए जिसमें विपक्षी दलों की मिलीजुली सरकार बनी। मोरारजी भाई को प्रधानमंत्री बनाया गया। परंतु यह सरकार तीन साल के भीतर ही ताश के पत्तों के समान बिखर गई और 1980 में चुनाव हुए और इंदिराजी फिर से प्रधानमंत्री बनीं।
आपातकाल के दौरान विशेषकर संजय गांधी के व्यवहार से इंदिराजी को ज्यादा बदनामी झेलना पड़ी। परंतु कुछ समय के बाद संजय गांधी एक आकस्मिक दुर्घटना में मारे गए। जब श्रीमती गांधी विपक्ष में थीं उस समय उन्होंने अत्यधिक साहस से प्रतिपक्ष की नेता की भूमिका निभाई थी। बिहार के बेलची नामक स्थान में अनेक हरिजनों की हत्या कर दी गई थी। श्रीमती गांधी उस स्थान पर स्वयं गईं और दुखी परिवारों से मिलीं। बेलची पहुंचने के लिए एक नदी को पार करना पड़ता था। जिस समय इंदिराजी वहां जाना चाहती थीं नदी में भयंकर बाढ़ थी और किसी भी तरह नदी पार करना मुश्किल था परंतु इंदिराजी •िाद पर थीं कि मैं जाऊंगी और अंतत: एक हाथी पर बैठकर वे वहां गईं। उनके इस साहसपूर्ण कदम ने उन्हें जबरदस्त लोकप्रियता प्रदान की। इसी तरह के अनेक कामों के कारण वे चुनाव जीतीं और फिर से प्रधानमंत्री बनीं। इसी दरम्यान उन्हें आपरेशन ब्लू स्टार करना पड़ा क्योंकि इस बात की संभावना प्रकट की जा रही थी कि सरदार भिंडरवाले खालिस्तान के रूप में एक पृथक राष्ट्र की घोषणा करने वाले थे। इस संभावना को नष्ट करने के लिए अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर फौजी हमला करना पड़ा। इस हमले से सिक्खों में भारी नाराजगी फैली और स्वयं इंदिराजी के सिख अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी। इस तरह हमारे देश के इतिहास के एक प्रमुख अध्याय का अंत हुआ।
अगले एक वर्ष तक हम लोग इंदिराजी के योगदान पर चर्चा करेंगे। इस दरम्यान यह उचित होगा कि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर गहराई से विचार हो। इस समय आपातकाल के नाम पर इंदिराजी को एक क्रूर शासक के रूप में पेश किया जाता है। मेरी राय में किसी भी महान व्यक्ति के मूल्यांकन में किसी एक घटना को लेकर उनके बारे में निर्णय नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उसके समग्र जीवन की निष्पक्षता के रूप में विश्लेषण किया जाना चाहिए। आशा है कि अगले एक वर्ष में हम ऐसा कर पाएंगे।


 

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