'आप' में महाभारत

डॉ. गौरीशंकर राजहंस : देखते ही देखते 'आपÓ पार्टी की जैसी दुर्दशा हो गई उसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। दिल्ली विधानसभा के चुनाव में 'आपÓ पार्टी को अप्रत्याशित सफलता मिली थी जिसे देखकर लोग हैरान थे। आज लोग यह देखकर हैरान हैं कि देखते ही देखते इस पार्टी में घमासान मच गया है और इसके नेता एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक बयान देकर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। मूक जनता सब कुछ चुपचाप देख रही है और उसे घोर निराशा हो रही है कि 'आम आदमी पार्टीÓ भी अन्त में अन्य पार्टियों के कदमों पर ही चल पड़ी है। ...

डॉ गौरीशंकर राजहंस

देखते ही देखते 'आपÓ पार्टी की जैसी दुर्दशा हो गई उसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। दिल्ली विधानसभा के चुनाव में 'आपÓ पार्टी को अप्रत्याशित सफलता मिली थी जिसे देखकर लोग हैरान थे। आज लोग यह देखकर हैरान हैं कि देखते ही देखते इस पार्टी में घमासान मच गया है और इसके नेता एक-दूसरे के खिलाफ  सार्वजनिक बयान देकर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। मूक जनता सब कुछ चुपचाप देख रही है और उसे घोर निराशा हो रही है कि 'आम आदमी पार्टीÓ भी अन्त में अन्य पार्टियों के कदमों पर ही चल पड़ी है।
प्रकृति का नियम है कि जो वस्तु जितनी तेजी से ऊपर जाती है वह उतनी ही तेजी से नीचे गिरती है। न्यूटन का प्रसिद्ध सिद्वांत है कि 'एवरी एक्सन हैज इक्वल और आपोजिट रिएक्शनÓ अर्थात् जो काम जितनी तेजी से किया जाएगा उसका विपरीत परिणाम भी उतनी ही तेजी से मिलेगा। जब प्रकृति के नियम की बात करते हैं तो हाल में दिल्ली के एक राष्ट्रीय दैनिक ने एक दिलचस्प कार्टून निकाला था जिसमें दिखाया गया कि अरविन्द केजरीवाल बैंगलोर में एक वट वृक्ष के नीचे योगासन कर रहे हैं और बगल में 'आपÓ पार्टी कह रही है कि आप तो प्रकृति में लीन हो गये। इधर लोगों ने मेरी सर्जरी कर डाली।
मैं प्राय: प्रतिदिन संसद के सेन्ट्रल हॉल में जाता हूं। 14 फरवरी को केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उसके दो-तीन दिन बाद सेन्ट्रल हॉल में एक पूर्व सांसद कह रहे थे कि वे नई दिल्ली की एक पॉश कालोनी में रहते हैं। 15 फरवरी की सुबह में 15-20 लड़के 'झाड़ू छाप पार्टीÓ की टोपी पहने हुए और 'झाड़ू छाप झण्डाÓ लिए हुए नारा लगाते हुए कॉलोनी में यह कहते हुए घुस गये कि 'अब सरकारÓ हमारी है, नहीं किसी से यारी हैÓ। जगह-जगह कॉलोनी में रूककर उन्होंने लोगों से कहा कि अब उनकी सरकार आ गई है इसलिए वे जैसा हुकम देंगे वैसा ही करना होगा। कॉलोनी के लोग घर से बाहर निकलकर यह अजीबो-गरीब तमाशा देख रहे थे। अन्त में कुछ लोगों ने कॉलोनी के दर्जनभर सेक्युरिटी गार्डों से कहा कि इन उत्पातियों को मार भगाओ। जब सेक्युरिटी गार्डों ने उन्हें खदेड़ा तो वे भाग खड़े हुए। मुझे ऐसा लगता है कि ऐसी घटनाएं दूसरी कॉलोनियेां में भी हुई होंगी।
इस संदर्भ में मुझे 1977 की एक घटना याद आती है। जब सभी विपक्षी पार्टियां एक हो गई थीं और उन्होंने कांग्रेस को धूल चटा दी थी। उस समय कोई गांधी टोपी पहनने की हिम्मत नहीं करता था। संयोग से मैं दिल्ली से टे्रन में पटना जा रहा था। हमारे कंपार्टमेंट मेें एक बुजुर्ग व्यक्ति गांधी टोपी पहने हुए थे। अलीगढ़ में कुछ अराजक तत्वों ने 'जनता दल जिन्दाबादÓ का नारा लगाया और उस बुजुर्ग को बाहर घसीटकर पीट डाला और उनकी टोपी को बाहर जमीन पर फेंक दिया। उसके बाद तो ऐसी अनेक घटनाएं समाचारपत्रों में छपीं। बिहार और उत्तर प्रदेश में अराजक तत्व सड़क घेर लेते थे और लोगों से कभी पार्टी के लिए और कभी दुर्गा पूजा के नाम पर तो कभी सरस्वती पूजा के नाम पर जबरन चन्दा वसूलते थे। जो चन्दा नहीं देता था उसके साथ मारपीट करते थे। इन बातों का हश्र क्या हुआ? यह सबको पता है। शीघ्र ही जनता दल के नेता आपस में लड़ पड़े। पहले तो वे मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री नहीं बनने देना चाहते थे परन्तु जयप्रकाश नारायण के हस्तक्षेप करने पर मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाया गया। बहुत शीघ्र जनता दल के दूसरे नेताओं ने उनकी टांग खींच ली। चरण सिंह के नेतृत्व में मोरारजी देसाई के खिलाफ  विद्रोह हुआ और मोरारजी देसाई को लाचार होकर त्यागपत्र देना पड़ा। परन्तु कांग्रेस ने जो उस समय चतुराई दिखाई वह सबों को याद है। उसने वायदा किया था कि वह चरणसिंह को प्रधानमंत्री के रूप में समर्थन देती रहेगी। अचानक उसने समर्थन नहीं देने की घोषणा कर दी। चरणसिंह संसद का भी सामना नहीं कर सके और देखते ही देखते जनता दल का 'सर्वनाशÓ हो गया। कहते हैं कि इतिहास अपने को दोहराता है। भारत में कई बार ऐसी घटनाएं हुईं जिससे बड़ी से बड़ी पार्टियां ध्वस्त हो गईं।
राजीव गांधी के समय में कांग्रेस पार्टी को 400 से अधिक सीटें मिली थीं जो अब सिमट कर 44 सीटों पर रह गई। कारण स्पष्ट है। हाई कमान मु_ीभर खुशामदी लोगों से घिर गया था और पार्टी जनता से कट गई थी। पार्टी के नेता खुलेआम एक दूसरे के खिलाफ बयान दे रहे थे। अफसोस की बात है कि 'आम आदमी पार्टीÓ इन घटनाओं से भी सबक नहीं लेती है। हाल में 'आम आदमी पार्टीÓ के बारे में जो रहस्योद्घाटन हुआ उससे जनता भौंचक्क रह गई। 4 मार्च की कार्यकारिणी की बैठक में जिस तरह अपमानित करके प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को राजनीतिक मामलों की समिति से निकाल दिया गया उसके बारे में 'आम आदमी पार्टीÓ के एक वरिष्ठ नेता मयंक गांधी ने ब्लॉगों में विस्तार से लिखा है और यह भी रहस्योद्घाटन किया है कि अरविन्द केजरीवाल के इशारे पर ही इन दोनों नेताओं को निकाला गया जिन्होंने शुरू से ही पार्टी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। मयंक गांधी ने अपने ब्लॉग में लिखा कि अब उन्हें भी पार्टी से निकालने के लिए उन पर निशाना साधा जा रहा है। आशीष खेतान और उनके समर्थकों के बारे में मयंक गांधी ने लिखा कि आशीष खेतान जो बहुत बाद में पार्टी में शामिल हुए थे वे किसी तरह अरविन्द केजरीवाल के निकट आ गए और वे उन्हें गलत सलाह दे रहे हैं। उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा कि 'दिल्ली में बैठे कुछ नेताओं के समूह जो पार्टी के सारे फैसले करते हैं, मुझे बीबीएम ग्रुप से निकाल दिया हैÓ। इसके जवाब में आशीष खेतान ने अपने ट्वीटर में लिखा 'कुछ लोग सुबह शाम टीवी इन्टरव्यू देते हैं। कुछ दिल्ली और देश के विकास के लिए दिन-रात काम करते हैं। कुछ लोग केवल ब्लॉग लिखते हैं। कुछ इतिहास लिखते हैं। विडम्बना यह है कि हजारों लोग जिन्होंने अपने खून पसीने से आम आदमी पार्टी को बनाया है, वे न लेख लिख पाते हैं और न टीवी इन्टरव्यू दे पाते हैं।Ó
इसके जवाब में मयंक गांधी ने कहा कि उन पर कीचड़ उछाला जा रहा है और ऐसा षडय़ंत्र किया जा रहा है जिससे वे आजीज होकर पार्टी से त्यागपत्र दे दें। उधर महाराष्ट्र की एक प्रमुख नेता अंजली दमानिया ने अरविन्द केजरीवाल का पक्ष लेकर योगेन्द्र यादव, शांतिभूषण और मयंक गांधी की कटु आलोचना की। अरविन्द केजरीवाल के दूसरे मित्र आशुतोष ने भी अरविन्द केजरीवाल का पक्ष लिया और कहा कि अरविन्द केजरीवाल तो लोकसभा का चुनाव हारने के बाद राजनीति से सन्यास लेना चाहते थे। परन्तु उनके जैसे मित्रों ने उन्हें समझाया कि जल्दबाजी में कुछ नहीं करना चाहिये।
सच क्या है और झूठ क्या है, कहना कठिन है। परन्तु एक बात तो स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी की आन्तरिक कलह बहुत बढ़ गई है। लोगों ने इस पार्टी से बड़ी उम्मीदें पाल रखी थीं। अब जगह-जगह लोग बसों में और मैट्रो में यही कह रहे हैं कि जो पार्टी अपना घर नहीं संभाल पा रही है वह भला दिल्ली के लोगों का क्या कल्याण करेगी? आज दिल्ली की जनता और सच कहा जाए तो देश की  जनता निराश होकर देख रही है कि क्या 'आम आदमी पार्टीÓ का भी वही हश्र होगा जो अन्य पार्टियों का हुआ? 
(लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)

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