आतंकी भी करते हैं कार्ड करेंसी से लेन-देन

पुष्परंजन : कानपुर में मिठाई का एक मशहूर ब्रांड है-‘ठग्गू के लड्डू!’ इसके डिब्बे पर एक स्लोगन छपा है-‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं।’ ...

पुष्परंजन

कानपुर में मिठाई का एक मशहूर ब्रांड है-‘ठग्गू के लड्डू!’ इसके डिब्बे पर एक स्लोगन छपा है-‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं।’ कुछ दिन पहले बैंकों, एटीएम के आगे भूखे-प्यासे, बेहाल लोगों को बिस्कुट बांटने का अभिनय सबसे पहले कांग्रेस ने आरंभ किया था, फिर कुछ जगहों पर आम आदमी पार्टी ने उसका अनुसरण किया। कैमरा, लाइट, एक्शन के साथ बिस्कुट वितरण कार्यक्रम पता नहीं कब गायब हो गया। फिर दिल्ली भाजपा के अभी-अभी अध्यक्ष बने मनोज तिवारी लड्डू बांटने के आइडिया के साथ उतरे। पश्चिम दिल्ली के कुछ बैंकों, एटीएम पर इसका अभिनय हुआ। अब कैमरा गायब है, और लड्डू भी। क्या यह राजनीति का अभिनय युग है?
बिस्कुट और लड्डू से लैस नेताओं को उन दरवाजों पर जाना चाहिए जिनके सगे-संबंधी बैंक, और एटीएम की लाइन में दम तोड़ गये। चैनलों पर, अखबारों में ऐसे मरने वालों बदनसीबों की हम सिर्फ संख्या गिनने के आदी हो गये हैं। दुर्भाग्य है कि इस देश में प्राकृतिक आपदा, दुर्घटनाओं में मरे लोगों को सरकारें फौरन मुआवजा देने की घोषणा करती है, मगर सौ के आसपास जो आम नागरिक नोटबंदी के कारण मौत हो चुके, उनके परिजनों को मुआवजा देने का प्रश्न नहीं उठाया जाता। क्या उनका गुनाह यही था कि ये लोग दो-दो हजार के लाखों-करोड़ों नोट का जुगाड़ करने वाले ‘गुलाबी गैंग’ के सदस्य नहीं थे? 8 नवंबर की अद्र्धरात्रि के बाद कुछ-कुछ घंटों में बदल रहे कायदे-कानून का पालन करने वाले ये वे लोग थे, जिन्होंने भ्रष्टाचार, कालेधन, आतंकियों के विरूद्ध तथाकथित युद्ध की वजह से अपने प्राणों की आहुति दी थी। ऐसे लोगों की ‘शहादत’ पर हमारी संवेदना क्यों कुंद हो जाती है? क्या इनके बलिदान पर किसी ने मोमबत्ती जलाई, किसी के आंख भी नम हुए? दरअसल, मुद्रा लाइन में दिवंगत हुए व्यक्ति में से कोई प्रधानमंत्री, उनके मंत्री, प्रतिपक्ष के किसी नेता, या किसी बड़े उद्योगपति का सगा नहीं था। होता, तो संसद से सडक़ तक आग लग जाती। नोटबंदी को सही बताने वाले प्रवक्ताओं की प्रतिक्रिया तो ऐसी  है, जैसे बैंकों, एटीएम की लाइन में इंसान नहीं, कीड़े-मकोड़े मर गये हों। दूसरी ओर टीवी चैनलों पर मिमिक्री करने वाले कुछ अंग्रे•ाीदां जोकर, इस त्रासद स्थिति का मजाक उड़ाने में लगे हैं।
यह बहस का विषय होना चाहिए कि लकी ड्रा, लाटरी भारत में प्रतिबंधित है, या नहीं? अपनी सुविधा के अनुसार कानून की व्याख्या करने वाले बेशर्म लोग कह सकते हैं कि जो लकी ड्रा, लाटरी देशहित में है, वह जुआ नहीं है। क्योंकि इससे देश आगे बढ़ेगा। देश के बारह राज्यों में लॉटरी का धंधा ताल ठोक के चल रहा है, जिससे सालाना 50 हजार करोड़ की आमदनी का आकलन किया गया है। भाजपा उसके मित्र दलों द्वारा शासित महाराष्ट्र, गोवा, पंजाब, हरियाणा में लॉटरी का धंधा जारी है, मगर उसे राज्य सरकारों ने ऑन लाइन किया हुआ है। भाजपा शासित राजस्थान में दारू का ठेका ऑन लाइन लाटरी के जरिये आबकारी विभाग देता है। गोवा में जुआ वैध है, वहां कैसिनो से डेढ़ सौ करोड़ से अधिक की आय होती है। ‘सुपर लो_ो’, ‘फास्ट लो_ो’, ऑन लाइन लाटरी के ऐसे ब्रांड रहे हैं, जिसे यूरोप से भारत पहुंचने में देर नहीं लगी। मतलब, ऑन लाइन से लॉटरी, ‘लकी ड्रा’ जैसा गोरखधंधा कीजिए, तो सब कुछ वैध है।
जुए की वजह से महाभारत हुआ था, और आज का भारत उसी दिशा में जा रहा है। अंतर यही है कि सरकार ने इस जुए को ‘लकी ड्रा’ का ब्रांड दे दिया है। सरकार से दो कदम तेज इन दिनों चीनी निवेश वाली एक कार्ड कंपनी चल रही है, नाम है ‘पेटीएम’। ‘पेटीएम’ ने 13 दिसंबर को पूरे पेज का विज्ञापन देश के कई सारे अखबारों में निकाला। स्लोगन था-‘पेटीएम करो, करोड़पति बनो! करिये पेटीएम से भुगतान, और पाइये एक करोड़ का बंपर प्राइज तथा कई और आकर्षक ईनाम जीतने का मौका।’ अब कोई पूछ सकता है कि पेटीएम को ‘बंपर प्राइज’ और एक करोड़ की लॉटरी के सपने दिखाने का लाइसेंस किसने दिया है? क्या इस देश में पेटीएम जैसी कंपनियां, कार्ड करेंसी महाभियान के नाम पर जुआ, लाटरी जैसा कोई भी कर्म कर सकती हैं?
फिर सरकार किस मुंह से ‘लकी ड्रा’ को गलत कह कहेगी? नीति आयोग ने जिस तरह से डिजिटल लेन-देन करने वालों को एक करोड़ लकी ड्रा के जरिये ईनाम देने की घोषणा की है, वह कई सारे सवालों को खड़ा करता है। इस लकी ड्रा कार्यक्रम पर सरकार को 340 करोड़ उड़ा देना है। नोटबंदी ने हमारे नीति निर्माताओं को कहां से कहां पहुंचा दिया! प्रधानमंत्री ने खुले मंच से जन-धन कार्डधारियों को बैंक अकांउट में जमा पैसे न देने का आह्वान किया है। काश! जन-धन वालों को मोदी ये कहते कि सरकार को सूचित कीजिए, और ईनाम पाइये। लेकिन हुआ उल्टा। देश में जो गरीब हैं, उन्हें कपट, धोखाधड़ी, बेईमानी के मार्ग पर चलने का मंत्र दिया जा रहा है। क्या एक प्रधानमंत्री के लिए इस तरह का बयान देना शोभा देता है?
अब जुए की शक्ल में ‘लकी ड्रा’ को सरकार की ओर से प्रोत्साहित किया जा रहा है। कार्ड करेंसी को प्रोमोट करने के लिए कितने हजार करोड़ विज्ञापन के रूप में स्वाहा किये जाएंगे? यह जानना भी दिलचस्प होगा। उतने पैसे को गांव-कस्बों तक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के वास्ते सरकार खर्च करती, तो देश में डिजिटल साक्षरता भी बढ़ती। लोग स्वस्फूर्त ई-भुगतान के लिए आगे आते। कार्ड करेंसी के वास्ते प्रचंड प्रचार में देश के करदाताओं के पैसे किस बेरहमी से बहाये जा रहे हैं, उस पर कोई सवाल नहीं उठाता। तर्क क्या दिया जा रहा है? इससे भ्रष्टाचार समाप्त हो जाएगा, कालेधन को बाहर निकाल लेंगे। आतंकवादियों की फंडिग को रोक देंगे। अभी तो चंद बिल्डरों, ज्वेलरों, व्यापारियों, कानून की आड़ में काले का सफेद करने वाले धंधेबाजों के यहां छापेमारी में कुछ सौ करोड़ निकले हैं। क्या दिल्ली के लटियन जोन में जाने की किसी की हिम्मत है?
देश में बहुत बड़ी संख्या बेईमान अधिकारियों से लेकर चपरासियों तक की फौज है, जिन्हें ऊपर की कमाई चाहिए। इनके आगे दस-पन्द्रह फीसद ईमानदार सरकारी कर्मी नक्कारखाने में तूती की तरह हैं। ढाई साल में मोदी ने कितनों को ठीक कर दिया, बता दें। जो घूसखोर अफसर हैं, उनके लिए सातवें वेतन आयोग का वेतन, मुफ्त में विमान से घूमने, फाइव स्टार में ठहरने का पैकेज कुछ भी नहीं है। उनका पेट नहीं भरने वाला। किसी रीयल इस्टेट वाले, बुलियन व्यापारी, सीए से पूछिये जमीन-जायदाद, सोने-हीरे को सबसे अधिक कौन लोग खरीद रहे हैं? किसानी के नाम पर हजारों करोड़ का आयकर डकारने वाले कौन लोग हैं?
अभी गडकरी जी के मंत्रालय के कई सारे अफसर परिवहन व्यवस्था को समझने यूरोप गये थे। जाना था ऑस्ट्रिया, मगर स्वीट्जरलैंड समेत अगल-बगल के कई देशों में परिवार के साथ पहुंच गये, और मजे किये। अब इन अफसरों के परिवार वालों का इस सर्वे से क्या लेना-देना? इस पर पूरी किताब लिखी जा सकती है कि किस तरह परिवहन व्यवस्था, स्वास्थ्य, स्कूल जैसे विषयों को समझने के लिए विभिन्न राज्यों के नेता, अफसर हर साल विदेश यात्राएं करते रहे हैं। सर्वे के नाम पर ‘फॉरेन टूअर’ का सरकारी फ्राड न तो सत्तर साल में कोई रोक पाया, न ढाई साल के ‘ईमानदार शासन’ के निरंतर नाद में रुका है। हम टैक्स किसलिए दे रहे हैं, यह कोई ठीक से समझा दे।
जूते से बात करने वाले सरकार के एक मंत्री हैं किरण रिजिजू। रिजिजू ने नोटबंदी के दूसरे दिन ही कहा था, ‘इससे आतंकवाद एकदम रुक गया।’ दोष रिजिजू का नहीं है। दोष, उनके अल्पकालिक अनुभवों, और अब तक जिस अहंकारी परिवेश में वे रह रहे हैं, उसका है। किरण रिजिजू को पता होना चाहिए कि 9/11 के आत्मघातियों खालिद शेख मोहम्मद, रेमजी युसूफ, वली खान अमीन शाह को एक लाख 20 हजार डॉलर यूएई और दुबई से ऑन लाइन ट्रांसफर किये गये थे। इस मनी ट्रांसफर में रॉयल बैंक ऑफ कनाडा, सिटीबैंक, वेस्टर्न यूनियन तक के नाम आये थे। मुंबई में 26/11 के आतंकियों ने भी कार्ड करेंसी का इस्तेमाल किया था। इस घटना के कई साल बाद मुंबई स्थित ताजमहल पैलेस एंड टावर होटल के एक वरिष्ठ अधिकारी से मेरी बात हुई। उसने चौंकाने वाली जानकारी दी कि ताज पैलेस होटल में ठहरे दहशतगर्दों ने सिटी बैंक, एचएसबीसी, आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक, स्टेट बैंक ऑफ मॉरिशस के क्रेडिट कार्डों का इस्तेमाल किया था।
एफबीआई के पूर्व एजेंट, टेरर फाइनेंसिंग के एक्सपर्ट डेनिस लोरमेल ने दो वजहों से अतिवादियों द्वारा कार्ड करेंसी के इस्तेमाल की बात कही है। एक, क्रेडिट कार्ड के जरिये फ्राड कर वे फंड जुटा सकते हैं। दूसरा, दुनिया के किसी कोने में आतंक फैलाने के वास्ते उन्हें करेंसी बदल कर ले जाने की असुविधा नहीं होती। सच में ऐसा हो भी रहा है। लेबनीज़ कनाडियन बैंक (एलबीसी) के कई कर्मी, हिजबुल्ला आतंकियों के पैसे कार्ड के जरिये परिवर्तित करने के जुर्म में पकड़े गये। सऊदी अरब का अल-र•ाही बैंक चेचन अतिवादियों को इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसफर के कारण विवाद में फंसा। यमन शहद के व्यापार के लिए प्रसिद्ध है। यहां से कई आतंकियों ने शहद निर्यातकों को पेमेंट के नाम पर इलेक्ट्रॉनक लेन-देन किये। अमेरिकी खुफिया एजेंसियां यमन स्थित अल नूर हनी सेंटर, अल नूर हनी प्रेस, अल शिफा हनी प्रेस जैसे व्यापारिक संगठनों के पीछे लग गईं। दुनियाभर में हवाला, अवैध पैसों की आवाजाही पर न•ार रखने वाली ट्रेड ट्रांस्परेंसी यूनिट (टीटीयू) के बड़े अधिकारी मानते हैं कि अलकायदा, आइसिस, और पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठन कार्ड करेंसी का इस्तेमाल अरसे से कर रहे हैं। इसलिए, कृपया कुतर्क ना करें, और कार्ड करेंसी को ठग्गू के लड्डू की तरह पेश करने से परहेज करें!  
pushpr1@rediffmail.com


देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

Deshbandhu के आलेख