आईआईटी-मद्रास प्रकरण : धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक भारत के लिए बढ़ते खतरे

सीताराम येचुरी आ ईआईटी-मद्रास ने छात्रों के अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर जो पाबंदी लगायी है, आरएसएस की उस वृहत्तर परियोजना का ही हिस्सा लगती है, जो धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक भारतीय गणराज्य को उसकी कल्पना के घोर असहिष्णु, फासीवादी ‘हिंदू राष्टï्र’ में तब्दील करना चाहती है...

सीताराम येचुरी

आईआईटी-मद्रास ने छात्रों के अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर जो पाबंदी लगायी है, आरएसएस की उस वृहत्तर परियोजना का ही हिस्सा लगती है, जो धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक भारतीय गणराज्य को उसकी कल्पना के घोर असहिष्णु, फासीवादी ‘हिंदू राष्टï्र’ में तब्दील करना चाहती है। यह पाबंदी जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देश पर लगाई गई बताते हैं, जो इस स्टडी सर्किल के खिलाफ एक गुमनाम शिकायत के चलतेे आया था। मीडिया की सुर्खियां बताती हैं कि छात्रों के प्रतिबंधित ग्रुप पर आरोप यह है कि वह ‘प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ घृणा’ फैला रहा था और सरकार की आलोचना कर रहा था। अगर हम इस तरह के तकनीकी नुक्तों को छोड़ भी दें कि केंद्रीय सतर्कता आयोग के स्पष्टï निर्देश हैं कि, ‘गुमनाम/ छद्मनाम शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाए’, इस तरह की पाबंदी तो हमारे संविधान में की गयी गारंटियों की ही जड़ पर कुठाराघात करती है। यह पाबंदी उच्च शिक्षा के संस्थानों में ‘विचारों की खोज’ की भावना को ही नकारती है और हमारी मिली-जुली सभ्यता के इतिहास की जगह पर, हिंदू मिथकों को बैठाना चाहती है।
सामाजिक रूप से उत्पीडि़त तबकों की बराबरी, आधुनिकता की ओर बढऩे के हमारे देश के प्रयासों का हिस्सा है। जातिवादी उत्पीडऩ के खिलाफ अनेक दशकों से नारे लगाए जा रहे है, फिर भी इस अभिशाप ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा है। अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद, उनका दर्जा दयनीय ही बना हुआ है। स्कूलों में बीच में पढ़ाई छोडऩे वालों में सबसे ऊंचा अनुपात उन्हीं का है। उच्च शिक्षा की संस्थाओं में और सरकारी सेवाओं में उनका अनुपात अब भी कम है। इस मामले में कुछ सरकारी आंकड़े तो चिंता में डाल देते हैं। हर एक सप्ताह में औसतन अनुसूचित जाति के 13 लोगों की हत्या कर दी जाती है, 6 को अगवा कर लिया जाता है या उनका अपहरण कर लिया जाता है और इतने ही अर्से में इस तबके की 21 महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया जाता है। हमारे देश के खेत मजदूरों, शहरी कंगालों और सिर पर मैला ढोने वालों में बहुमत अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोगों का ही है। क्या छात्रों के किसी ऐसे निकाय को जो इस तरह के सवाल उठाता हो और जातिवादी हिंसा के खिलाफ जागरूकता की जरूरत बताता हो, प्रतिबंधित किया जाना चाहिए? उल्टे, जैसा कि आईआईटी-मद्रास के छात्रों का कहना है, हमें ‘एक राष्टï्र के नाते, जातिवादी घृणा तथा राजनीति का मुकाबला करना चाहिए।’
बहरहाल, यह आरएसएस की नकारों में पाप है। वह तो हिंदू धर्म के अखंड ढांचे के रूप में जातिवादी ऊंच-नीच को पालने-पोसने के जरिए, ‘हिंदू राष्टï्र का महिमामंडन’ करना चाहता है। आरएसएस के एक दिवंगत शीर्ष नेता ने, जिन्हें इस संगठन में ‘गुरुजी’ के रूप में जाना जाता है, अपनी पुस्तक बंच ऑफ थाट्स में लिखा है: ‘ब्राह्मïण सिर है, राजा (क्षत्रिय) भुजा है, वैश्य जंघा है और शूद्र, पांव है। इसका अर्थ है इस तरह की चतुर्वण्य व्यवस्था वाला जनगण यानी हिंदू जन, हमारा ईश्वर है।’
आर्थिक सुधार के पिछले ढाई दशकों में हमारे देश में आर्थिक असमानताओं की खाई बहुत चौड़ी हुई है। हमारे देश के सभी परिवारों की कुल संपदा में सबसे संपन्न एक फीसद परिवारों का हिस्सा, जो 2000 में 36.8 फीसद था, 2014 तक बढक़र पूरे 49 फीसद हो गया था। खाद्य व कृषि आयोग की रिपोर्ट, ‘दुनिया में खाद्य असुरक्षा की स्थिति-2015’ बताती है कि भारत में दुनिया भर में सबसे ज्यादा भूखे रहते हैं—19.4 करोड़। जैसे-जैसे हमारी जनता के विशाल हिस्से के लिए संपदा का हिस्सा सिकुड़ रहा है, वैसे-वैसे इस संपदा में अपने हिस्से को बचाने की आपा-धापी जातिवादी परवर्जन तथा शत्रुभाव की धार तेज कर रही है।
भारत में सामाजिक परवर्जन की विरासत का एक अध्ययन हमारी आंखें खोल सकता है। सुखदेव थोराट तथा पॉल एट्टïेवेल का, ‘परवर्जन की विरासत’ पर लेख कहता है, ‘हमारे अध्ययन के नतीजे यह दिखाते हैं कि सामाजिक परवर्जन महज अतीत का अवशेष नहीं है जो भारतीय अर्थव्यवस्था के हाशियों से चिपका हुआ हो और न ही यह कम पढ़े-लिखे लोगों तक सीमित है। उल्टे ऐसा लगता है कि जातिगत पक्षपातीपन तथा दलितों व मुसलमानों का सामाजिक परवर्जन, भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे गतिमान क्षेत्रों में भी पैठा हुआ है।’ (इकॉनमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, 13 अक्टूबर 2007) आधुनिक भारत में सामाजिक परवर्जन की सदियों पुरानी संस्थाओं और जातिवादी उत्पीडऩ, सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों तथा लैंगिक भेदभाव में बारीकी आ रही है।
एक ‘समावेशी भारत’ के निर्माण की कोई भी कोशिश इस सच्चाई को अनदेखा नहीं कर सकती है। क्या आज ऐसी सच्चाइयों की ओर ध्यान खींचने को ‘प्रधानमंत्री के खिलाफ घृणा फैलाना’ करार देकर, उस पर रोक लगायी जा सकती है? यह तो इस सच्चाई को पहचानने का वक्त है कि पिछले अनेक वर्षों में जातियों के अंदर तथा जातियों के बीच आए सारे बदलावों तथा उनमें आए सारे परिष्कारों के बावजूद, सामाजिक दमन का बुनियादी ढांचा अब भी कायम है।
महात्मा गांधी ने ‘हरिजन’ की संज्ञा गढ़ी थी और सामाजिक उत्पीडऩ के प्रति रुख के मामले में हृदय परिवर्तन की अपील की थी। जातिविरोधी शक्तिशाली आंदोलनों के महायोद्घाओं में ज्योतिबा फुले एक थे। उन्होंने जो सत्यशोधक आंदोलन छेड़ा था, उसका असर आज तक नकार आता है। जातिवादी शोषण के विरुद्घ संघर्ष के अनथक योद्घा, बाबा साहेब अंबेडकर को अंतत: अपने अनुयाइयों यह कहना पड़ा था कि हिंदू समाज के जातिवादी अन्यायों से बचने के लिए, बौद्घ धर्म अपना लें। पेरियार ई वी रामास्वामी नाइकर के नेतृत्व में शक्तिशाली दलित आंदोलन ने, जातिवादी उत्पीडऩ तथा छुआछूत के खिलाफ जबर्दस्त तरीके से भावनाएं जगाई थीं।
फिर भी, इतने बड़े-बड़े नेताओं और उनके छेड़े शक्तिशाली आंदोलनों के बावजूद, जातिवादी उत्पीडऩ आज भी हमें जकड़े हुए है। आखिर, क्यों? सिर्फ हृदय परिवर्तन या आचरण में बदलाव की अपीलों से, इस तरह के उत्पीडऩ के खिलाफ नैतिक आक्रोश से या इस तरह के उत्पीडऩ के सामाजिक आधारों की सही समझ भर से भी, यह जघन्य व्यवस्था खत्म होने वाली नहीं है। इसके लिए तो इन तबकों की आर्थिक अधिकारिता के पक्ष में मूलगामी पुनर्संतुलन लाना होगा। इस भाजपा सरकार की आर्थिक तथा सामाजिक नीतियां इससे ठीक उल्टी दिशा में ले जा रही हैं।
भारतीय संविधान के मसौदे को अनुमोदन के लिए संविधान सभा के सामने पेश करते हुए अपने भाषण के अंत में डॉ. अंबेडकर ने जो कहा था, उसे आज याद करना जरूरी है। ‘26 जनवरी 1950 को हम अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हम समता स्थापित करेेंगे और सामाजिक व आर्थिक जीवन में हमारे यहां असमानता रहेगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक वोट और एक वोट, एक मूल्य के सिद्घांत को मान्यता दे रहे होंगे। अपने सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में, अपने सामाजिक व आर्थिक ढांचे के चलते हम, एक व्यक्ति, एक मूल्य के सिद्घांत को नकारना जारी रखेंगे। हम अंतर्विरोधों का यह जीवन कब तक जीते रहेंगे? हम अपने सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में समता को कब तक नकारते रहेेंगे? अगर हम लंबे समय तक इसे नकारते रहते हैं, तो हम अपने राजनीतिक जनतंत्र को खतरे में डालते हुए ही ऐसा कर रहे होंगे।’
छात्रों के इस तरह के मुद्दों पर बहस-मुबाहिसा करने वाले मंचों पर पाबंदी लगाना पक्के तौर पर ऐसे रास्ते पर चलना है, जिस पर चलकर हमारे धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक भारत को और ज्यादा खतरे का सामना करना पड़ रहा होगा।


 

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