अम्बेडकर-पेरियार से कौन डरता है?

सुभाष गाताड़े : आ ईआईटी मद्रास के प्रबंधन ने अन्तत: छात्रों के समूह ‘अम्बेडक़र पेरियार स्टडी सर्कल’ की मान्यता को बहाल कर दिया है और संस्थान के एक प्रोफेसर को उसके संकाय सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया है और लगभग दो सप्ताह से चले आ रहे विवाद पर पर्दा डालने का प्रयास किया है। ...

सुभाष गाताड़े

आ ईआईटी मद्रास के प्रबंधन ने अन्तत: छात्रों के समूह ‘अम्बेडक़र पेरियार स्टडी सर्कल’ की मान्यता को बहाल कर दिया है और संस्थान के एक प्रोफेसर को उसके संकाय सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया है और लगभग दो सप्ताह से चले आ रहे विवाद पर पर्दा डालने का प्रयास किया है। मालूम हो कि प्रबंधन ने अपने आप को विवादों के केन्द्र में ला खड़ा किया था जब उसने मुख्यत: दलित, आदिवासी एवं बहुजन तबके के उपरोक्त समूह को ‘अमान्य’ कर दिया था। खबर आई थी कि उसने यह कदम मानव संसाधन मंत्रालय के एक नौकरशाह द्वारा भेजे गए एक पत्र के बाद उठाया था, जिसमें किसी अनाम शिकायत का हवाला देते हुए यह कहा था कि उपरोक्त समूह ‘जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति आलोचनात्मक रुख रखता है’ वह ‘सामाजिक दुर्भावना’ फैला रहा है या ‘नफरत के बीज’ बो रहा है।
प्रबंधन के अनुमानों के बिल्कुल विपरीत इस मनमाने कदम की राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रिया हुई थी, छात्रों के इस समूह के समर्थन में मद्रास/चेन्नई में तथा देश के कई प्रमुख शहरों में प्रदर्शन हुए थे। देश विदेश के अग्रणी वैज्ञानिकों ने अपने हस्ताक्षरित ज्ञापन में शिक्षा संस्थानों के परिसरों में स्वस्थ बहस की परम्परा को बनाए रखने एवं अकादमिक संस्थानों की स्वायत्तता की हिफाजत के लिए आईआईटी प्रबंधन को इस निर्णय की समीक्षा करने का आग्रह किया था। इतना ही नहीं, यह मुद्दा जिस तरह चर्चा में आया था उसने पश्चिम के अकादमिक जगत में भी बेचैनी के स्वर दिखाई दिए थे।
अब भले ही मामले पर पर्दा गिरने की बात प्रबंधन द्वारा कही जा रही है, मगर इस बहाने सामने आया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन, शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता में दखल, उच्च शिक्षा में जाति का प्रभुत्व या केन्द्र में सत्तासीन सरकार द्वारा संस्थानों, प्रक्रियाओं को दी जा रही तिलांजलि जैसे मसलों पर बात होती रहेगी।
ध्यान रहे कि मामले की उग्र प्रतिक्रिया के बाद भले ही मानव संसाधन मंत्रालय ने यह कहा कि उसने इस मामले में कोई निर्देश संस्थान को नहीं दिया, मगर यह बात सबके सामने थी कि साल भर पुराने छात्रों के समूह-अम्बेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल की गतिविधियों- को लेकर मंत्रालय अतिसंवेदनशील था मगर उसी परिसर में दक्षिणपंथी समूहों की गतिविधियों का वह मौन दर्शक रहा था, जो परिसर में अतार्किकता, अंधश्रद्धा फैलाने में लगे हैं, और नि:संकोच आईआईटी का नाम और उसके संसाधनों का दुरुपयोग करते रहे हैं।
यह बात भी सामने आ रही है कि केन्द्रीय सतर्कता आयोग द्वारा अनाम शिकायतों पर तवज्जो न करने के निर्देश के बावजूद मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा आईआईटी के कामकाज में हस्तक्षेप करने का प्रस्तुत निर्णय अपवाद नहीं था। कुछ माह पहले मध्य प्रदेश के एक संघ कार्यकर्ता द्वारा भेजे गए पत्र के आधार पर सुश्री ईरानी की अगुआई वाले इस मंत्रालय ने विश्वविद्यालय परिसरों के रसोईघरों की निगरानी करने का निर्णय लिया था ताकि यह पता किया जा सके कि वहां क्या पक रहा है। आईआईटी और आईआईएम के निदेशकों को पत्रा भेज कर पूछा गया कि वह संस्थान में खाना बनाने और खाना परोसने के बारे में जानकारी भेजें और उन्हें यह भी कहा गया कि शाकाहारी और मांसाहारी छात्रों के लिए अलग-अलग मेसों की संघ स्वयंसेवक की मांग को वह पूरा करें। संघ कार्यकर्ता का तर्क था कि ‘ये संस्थान पश्चिम के बुरे संस्कार फैला रहे हैं और माता-पिताओं को परेशान कर रहे हैं।’’
निश्चित ही ऐसी मनमानी कार्रवाई के लिए महज मानव संसाधन मंत्रालय को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दरअसल मोदी सरकार के अन्तर्गत ऐसी ही संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब दूरदर्शन न्यूका के निदेशक को बदलने के मामले में खुद यह सरकार कटघरे में आई थी। हुआ यह कि किसी अलसुबह सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने दूरदर्शन न्यूज के निदेशक के पद पर एक सूचना अधिकारी की ‘नियुक्ति’ कर दी और उसे सीधे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में रिपोर्ट करने के लिए कहा गया, जबकि ऐसा कदम उठाने का उसे कोई अधिकार ही नहीं था। स्वायत्त कही जानेवाली प्रसार भारती ही ऐसा कोई कदम उठाने के लिए अधिकृत है। एक तरह से इस कदम से यही सन्देश दिया गया कि जब तक मौजूदा सरकार बनी रहेगी तब तक प्रसार भारती की स्वायत्तता मुल्तवी रहेगी।
यहां इस बात पर जोर देना अहम् है कि अम्बेडक़र पेरियार स्टडी सर्कल की मान्यता को समाप्त करने के इस प्रसंग में शिक्षा संस्थानों के परिसरों  में जनतांत्रिक दायरों के संकुचन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते हमले और असहमति की हर आवाज को कुचलने की मोदी सरकार की नापाक कोशिशों की अवश्य चर्चा चली है, मगर इस सिलसिले में दो अहम् मुद्दों पर बात नहीं हो सकी है: पहले का ताल्लुक शिक्षा के ‘भारतीयकरण’ की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विजन अर्थात् भविष्यदृष्टि से है और दूसरा मसला उच्च शिक्षा में जातिवाद की मौजूदगी का है।
अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब संघ के मुखपत्र ‘आर्गनायजर’ ने अपने ताजा सम्पादकीय में शिक्षा के रूपांतरण पर निगाह डाली है जिसमें उसने इस बात पर जोर दिया है कि ‘शिक्षा के भारतीयकरण’ को ‘हमारी सामाजिक सांस्कृतिक जड़ों पर आधारित होना होगा और वही एकमात्र रास्ता है भारत की आबादी को मानवीय विकास के केन्द्र में तब्दील करने का।’ भारतीयों को उनके पारम्पारिक ज्ञान प्रणाली से उखाडऩे के लिए शिक्षा देने के लिए ब्रिटिशों को जिम्मेदार ठहराते हुए वह कहता है: ‘‘उन्होंने जिस व्यवस्था का निर्माण किया वह राज्य मशीनरी के संचालन के लिए थी जिसे उन्होंने अपनी सुविधा के लिए बनाया था...इस ब्रिटिश विरासत का परिणाम यह हुआ कि हम लोगों ने अपने ज्ञान, रचनाशीलता के खजाने को खो दिया।’’ सम्पादकीय इस बात पर जोर देता है कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था ‘‘न इधर की है और न उधर की है।’’ इसका नतीजा यही हुआ है कि स्नातक ‘‘इस दुनिया में उतने उत्पादक’’ नहीं होते और उच्च स्तर के प्रोफेशनल्स/पेशेवर ‘‘सामाजिक और नैतिक तौर पर उखड़े होते है।’’
वैसे ऐसा कोई भी व्यक्ति जो भारत के इतिहास की थोड़ी बहुत जानकारी रखता है वह बता सकता है कि किस तरह ज्ञान की पारम्पारिक प्रणाली में, शिक्षा से व्यापक समुदाय को वंचित रखा जाता था। उत्पीडि़त जातियां और स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार नहीं था और वह ऊंची जातियों का विशेषाधिकार थी और यह प्रणाली धर्म द्वारा स्वीकृत थी। हिन्दुओं की चर्चित किताब ‘मनुस्मृति’ में इन नियमों का उल्लंघन करने की सजा भी मुकरर की गयी है। हकीकत यही है कि ब्रिटिशों के आगमन के बाद ही इस पारम्पारिक व्यवस्था में पहली बार दरारें पडऩे लगीं और आजाद भारत में संविधान के लागू होने के साथ, जबकि विभिन्न आधारों पर भेदभावों के समाप्ति का ऐलान किया गया और सामाजिक तौर पर उत्पीडि़त तबकों के लिए शिक्षा एवं रोजगार में विशेष अवसरों की योजना बनी, तभी इन तबकों की स्थितियों में गुणात्मक अंतर आ सका।
वैसे पारम्पारिक ज्ञान के प्रति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सम्मोहन कोई नया नहीं है। दरअसल इस बात के दस्तावेजी प्रमाण उपलब्ध है कि किस तरह उसने एक व्यक्ति के एक मत पर आधारित आधुनिक संविधान निर्माण का विरोध किया और इस बात पर लगातार जोर दिया कि स्वाधीन भारत को मनुस्मृति को ही संविधान के तौर पर अपनाना चाहिए। संघ के तत्कालीन सुप्रीमो गोलवलकर और ‘हिन्दुत्व’ के विचारक अग्रणी सावरकर दोनों ने ही संविधान निर्माण के दिनों में मनुस्मति की तारीफ में कसीदे पढ़े थे। इस बात की महज कल्पना ही की जा सकती है कि अगर उन दिनों संघ इतना ताकतवर होता और वह संविधाननिर्माताओं पर दबाव डालने में सफल होता तो उसकी क्या शक्ल बनती। जाहिर है कि दलित, आदिवासी या बहुजन तबकों से शायद ही कोई इन अभिजात संस्थानों में पहुंच पाता।
संघ को अपने आप से यह पूछना चाहिए कि क्या वह इसी रास्ते पर लौटना चाहता है और इन तबकों को अवसरों से इन्कार पर मुहर लगाना चाहता है?
इस प्रश्न को उठाना जरूरी है क्योंकि साठ साल से अधिक समय से चल रही आरक्षण की नीति के बाद भी जाति आधारित अलगाव और उससे जुड़ा भेदभाव हमारे दैनंदिन जीवन में, यहां तक कि आईआईटी, आईआईएम, एम्स जैसे अभिजात शिक्षा संस्थानों में भी बना हुआ है। और जहां आईआईटी मद्रास का सवाल है तो आरक्षण की नीतियों को लागू करने के मामले में वह निचले पायदान पर खड़ा दिखता है।
कुछ साल पहले ‘तहलका’ ने ‘कास्ट इन कैम्पस: दलितस नाट वेलकम इन आई आई टी मद्रास’ शीर्षक से एक स्टोरी की थी जिसमें उसने ‘इस अभिजात संस्थान के चन्द दलित छात्रों और शिक्षकों के बारे में विवरण दिया था, जिन्हें व्यापक प्रताडऩा का शिकार होना पड़ता है।’’ रिपोर्ट के मुताबिक:
क्या यह कहना उचित है कि जितनी तीव्रता से आईआईटीएम ने इस मसले पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी और अम्बेडक़र पेरियार स्टडी सर्कल की गतिविधियों पर पाबन्दी लगा दी उसका ताल्लुक इस बात से भी था कि वर्ण मानसिकता से लैस लोगों एवं हिन्दुत्व की असमावेशी विचारधारा के हिमायतियों में आपस में काफी सामंजस्य है? क्या यह कहा जा सकता है कि यह एक तरह से दमित जातियों की दावेदारी के प्रति वर्चस्वशाली जातियों के ‘गुस्से’ का ही प्रतिबिम्बन है?


 

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