अमर आत्मा वाले पेड़ की छांव में

भारत और जापान के बीच बौध्द धर्म एक बड़ा सेतु है जो धार्मिक समानता को परिभाषित करता है। कई चौक-चौराहों पर भगवान बुध्द की पूजा के लिए चबूतरानुमा स्थान टोक्यो में दिख जाते हैं। ...

राजीव रंजन श्रीवास्तव

(गतांक से आगे)
भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के साथ जापान और थाईलैंड की पांच दिवसीय यात्रा पर मीडिया दल के सदस्य के रूप में पिछले माह देशबन्धु के समूह संपादक राजीव रंजन श्रीवास्तव भी गए थे। प्रस्तुत है श्री श्रीवास्तव की जापान यात्रा की दूसरी और आखिरी किश्त-
भारत और जापान के बीच बौध्द धर्म एक बड़ा सेतु है जो धार्मिक समानता को परिभाषित करता है। कई चौक-चौराहों पर भगवान बुध्द की पूजा के लिए चबूतरानुमा स्थान टोक्यो में दिख जाते हैं। परन्तु  अपने भारत की तरह नहीं जहाँ कहीं भी एक पत्थर रखकर शिवजी या किसी पेड़  के नीचे लाल सिन्दूर से रंगकर हनुमानजी की पूजा करना शुरू कर दिया जाता है। यहाँ के बौध्द काफी संगठित और सुव्यवस्थित हैं। कहा जाता है कि 6वीं शताब्दी में कोरियाई राजकुमार ने जापान को बौध्द धर्म से परिचित करवाया था। जिसे बाद में जापानी सम्राट ने आगे बढ़ाया। टोक्यो के मध्य में जापान का सबसे पुराना बौध्द मंदिर है। सेंसोजी अथवा असाकुसा कैनन टेम्पल के नाम से विख्यात इस मंदिर को लगभग 1400 वर्ष पहले अर्थात् 7वीं सदी में बनवाया गया था। सेंसोजी का निर्माण बोधिसत्व के सम्मान में हुआ था। सन् 1945 में  द्वितीय विश्व युध्द के दौरान अमेरिका द्वारा जापान पर गिराए गए बम के कारण टोक्यो के कई हिस्से भी क्षतिग्रस्त हुए थे जिनमें इस मंदिर के कई महत्वपूर्ण भाग भी विखंडित हो गए थे। बाद में जापानी श्रध्दालुओं द्वारा दान इकठ्ठा करके इस मंदिर का जीर्णोध्दार हुआ। मंदिर के ही प्रांगण में एक क्षतिग्रस्त वृक्ष है। कहा जाता है कि बम के कारण यह पेड़ भी नष्ट हो गया था लेकिन धीरे-धीरे इसमें जीवन का संचार हुआ और अब इसकी कई शाखाएं आ चुकी हैं। इस पेड़ को श्रध्दालु मंदिर की अमर आत्मा के रूप में पूजते हैं।
बुलेट ट्रेन के लिए प्रसिध्द जापान में कोलकाता की भांति हाथ रिक्शे को देखना अचंभित करने वाला दृश्य था। टोक्यो के खास पर्यटन स्थलों पर इन दिनों हाथ रिक्शा खींचते जापानी नागरिक देखे जा सकते हैं। जापान ने हाल ही में 500 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने वाली बुलेट ट्रेन का सफल परिक्षण किया है। जबकि 350 से  400 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के ट्रेन में सफ़र का आनंद जापानी प्रतिदिन उठा रहे हैं। भारत में भी जापानी मदद से बुलेट ट्रेन को मुंबई से अहमदाबाद के बीच लाने की बात चल रही है। दरअसल एक ओर जापान जहाँ आधुनिक तकनीक के बल पर विकास को गति दे रहा है वहीँ दूसरी तरफ साइकिल, हाथ रिक्शा आदि के साथ पर्यावरण सुरक्षा के लिए भी जिम्मेदार की भूमिका निभा रहा है।
उत्तरी प्रशांत महासागर के किनारे बसे जापान की राजधनी टोक्यो के बीचों-बीच सुमिदा नदी गुजरती है जो हर रूप में इस शहर के लिए वरदान है। माल ढुलाई, परिवहन, मत्स्य व्यवसाय, पर्यटन आदि सहित कई प्रमुख व्यापार में सुमिदा सहायक नदी है। टोक्यो को दुनिया का सबसे महंगा शहर माना जाता है। जापानी बताते हैं कि उनके देश में निर्मित सामान नकली नहीं होते इसलिए वे महंगे होते हैं। आज भारत सहित कई देशों के बाजारों में नकली सामानों की बाढ़ सी आयी हुई है ऐसे में अगर बाजार में उपलब्ध वस्तुओं की गुणवत्ता पर जापान अपनी पैनी नज़र रखता है तो उसके लिए उचित दाम वसूलना उसका हक ही माना जायेगा।
इस यात्रा के दौरान जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे के कार्यालय जाने का अवसर तब आया जब दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के संयुक्त बयान मीडिया के सामने जारी होने थे। प्रधानमंत्री कार्यालय के पीछे ही प्रधानमंत्री निवास भी है और दोनों एक दूसरे से जुड़े हैं। कार्यालय के प्रांगण  में बांस के पेड़ और कुछ पत्थरों के लम्बे टुकड़े विशेष प्रयोजन से लगाये गए हैं। कहा जाता है कि बार-बार प्राकृतिक आपदाओं को झेलने वाला जापान बांस से ऊपर की ओर अग्रसर रहने की सीख लेता है जबकि पत्थर से हर तरह की मुसीबत को झेलकर मजबूत बने रहने की प्रेरणा लेता है। प्रधानमंत्री कार्यालय के भूतल की तीसरी मंजिल में शानदार सभागार दोनों प्रधानमंत्रियों का इंतजार कर रहा था। हम भारतीय पत्रकार अपने-अपने नोटपैड और कलम के साथ तैयार बैठे थे। दूसरी तरफ जापानी मीडिया के साथी थे जिनके हाथ में न तो पेन था और न ही नोटपैड। सभी नवीनतम लैपटॉप, टेबलेट और डाटा कार्ड के साथ अपनी-अपनी कुर्सी पर विराजमान थे। भारतीय और जापानी मीडिया दल का यह फर्क जापान की तकनीकी तरक्की को दर्शा रहा था। सभागार के पिछले हिस्से में रोबोटिक कैमरे हर पल की फोटो लेने के लिए तैयार थे। हालांकि उन कैमरों के बीच जापानी और भारतीय फोटो और वीडियो पत्रकार भी थे। यों ही दोनों प्रधानमंत्रियों का वक्तव्य प्रारंभ हुआ जापानी मीडिया के की-बोर्ड की ध्वनि मधुर ताल के साथ सुनाई पड़ने लगीं। पत्रकारिता-खासकर रिपोर्टिंग में आधुनिक तकनीक का शत-प्रतिशत उपयोग समय की गति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की प्रेरणा दे रहा था। कार्यम के समापन के बाद जब हम प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर आये तो ठीक सामने सड़क पर कुछ भीड़ विरोध प्रदर्शन के लिए जुटी थी। सामान्यत: जापान के लोग शांत और गंभीर होते हैं। सड़कों पर अनावश्यक भीड़ नहीं लगती। उनके हाथों में या तो किताबें होती हैं या स्मार्ट फोन। लेकिन यहाँ वे हाथ में कुछ तख्तियां और बैनर लिए अनुशासित और शालीनता के साथ नारेबाजी कर रहे थे । बैनर और तख्तियों पर जापानी और अंग्रेजी में लिखा था- प्लीज स्टॉप एक्सपोर्ट ऑफ़ न्युक्लिअर वीपन्स ( परमाणु हथियारों का निर्यात बंद करो )। दरअसल, दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु समझौते की बात चल रही थी। जापानी अख़बारों में इस बावत कई आलेख भी दो दिनों से प्रकाशित हो रहे थे। इसलिए जापान के एक वर्ग विशेष द्वारा यह प्रदर्शन लाजिमी था। और हो भी क्यों न?  जिस देश ने परमाणु बम की विभीषिका को झेला हो। जिनके ऊपर प्राकृतिक आपदा का प्रकोप कभी भूकंप तो कभी सुनामी बनकर मंडराता रहता हो, उन्हें इस प्रकार के विरोध का पूरा हक होना ही चाहिए।
जापान की यादों के साथ 30 मई की सुबह हम थाईलैंड की राजधानी बैंकाक के लिए रवाना हुए।                                   
 (समाप्त)

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