अजित सिंह का नया गठबंधन और उसके प्रभाव

शीतला सिंह चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल ने जनता दल (यू) और बीएस-4 से मिलकर उत्तर प्रदेश विधानसभा की सभी सीटों पर चुनाव लडऩे की घोषणा की है।...

शीतला सिंह

चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल ने जनता दल (यू) और बीएस-4 से मिलकर उत्तर प्रदेश विधानसभा की सभी सीटों पर चुनाव लडऩे की घोषणा की है। सपा के रजत जयंती समारोह में उसके सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को अपना नेता स्वीकार कर उससे गठबंधन के प्रयास में विफल रहे अजित सिंह का ताजा आरोप है कि मुलायम डॉ. लोहिया और चौधरी चरण सिंह की नीतियों से भटक गये हैं। इसीलिए पहले जहां वे पार्टियों के गठबंधन की बात करते थे, अब उससे हटकर विलयन की बात करने लगे हैं और अब वे हमारे इस सुझाव के समर्थक नहीं रह गये हैं कि चरण सिंह और लोहिया के अनुयायियों को एक होना चाहिए।
यही अजित सिंह हैं, जिन्होंने सपा के उक्त समारोह में अपनी ओर से आगे बढक़र ऐलान कर दिया था कि वे उसके साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे।  हालांकि समारोह में न इसका कोई प्रस्ताव आया और न यह उसके एजेंडे में ही था। तभी अटकलें लगने लगी थीं कि उनकी घोषणा के निहितार्थ क्या हैं? इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि सपा के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने पार्टी प्रतिनिधि के रूप में पुराने लोहियावादियों को निमंत्रित करने के लिए दिल्ली व अन्य स्थानों की यात्रा की थी। तब यह सवाल भी उठा था कि क्या उत्तर प्रदेश में बिहार जैसा महागठबंधन सपा की आवश्यकता बन गया है? यदि हां, तो इसमें कांग्रेस को शामिल क्यों नहीं किया जा रहा?
 इस सम्बन्ध में कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशान्त किशोर, मुलायम सिंह और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से भेंट वार्ताएं भी कर रहे थे, जबकि कांग्रेस के कुछ नेता कह रहे थे कि वे सपा के साथ गठबंधन के पक्षधर नहीं हैं क्योंकि सपा-बसपा को मजबूत करना कांग्रेस के लिए हितकर नहीं है। तब भी समझा जाता था कि कांग्रेस के शीर्ष नेता प्रदेश में उसके अस्तित्व की रक्षा के लिए सपा से समझौता चाहते हैं और अखिलेश व राहुल गांधी की बहुचर्चित मित्रता भी इसमें भूमिका निभाएगी। लेकिन फिर न तो कांग्रेस को सपा के रजत जयंती समारोह में बुलाया गया और न उसने आने की आवश्यकता समझी। फिर मुलायम का दो टूक ऐलान सामने आया कि सपा किसी से गठबंधन करेगी ही नहीं।
अजित सिंह फिलहाल जाट नेता के रूप में ही जाने जाते हैं। जाट भी अरसे तक यही मानते थे कि चौधरी साहब के बेटे अजित का चुनाव हारना जाटों की हार होगी। लेकिन बाद में एक बार वे बागपत में सोमपाल शास्त्री से हारे और दूसरी बार मुम्बई के भूतपूर्व पुलिस कमिश्नर से, जो भाजपा के उम्मीदवार थे। उनकी पार्टी को लोकसभा में एक भी सीट नहीं मिल पाई, जो चौधरी चरण सिंह के बंगले पर उनका कब्जा बचाने में मददगार हो सके। इससे पहले वे भाजपा के समर्थक व सहयोगी के रूप में भी चुनाव लड़ चुके थे और पश्चिमी उप्र के जाट भी मुजफ्फरनगर दंगों के बाद आमतौर से भाजपा के समर्थक थे।
लेकिन नई स्थितियों में हरियाणा के जाट यह मानने लगे कि केन्द्र और उस प्रदेश में भाजपा की सरकारें जाटों का विरोध कर रही हैं, तो संभावना जागी कि जाट अस्मिता की रक्षा के नाम पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट भाजपा के हराने के लिए फिर अजित सिंह का नेतृत्व स्वीकार कर सकते हैं। इसके मद्देन•ार माना जा रहा था कि अजित व मुलायम का सहयोग वहां नया चुनावी समीकरण बना सकता है और मुसलमान भी उसके पक्ष में एक हो सकते हैं। चरण सिंह के समय भी जाट और मुस्लिम मिलकर शक्ति के प्रतीक बन जाते थे। अजित सिंह सपा के बगैर भी अपनी ओर से भी मुसलमानों को जोडऩे का प्रयत्न कर रहे थे, लेकिन मुस्लिम सोच यह थी कि साथ उसी का देना चाहिए जो भाजपा को हराने का लक्ष्य पूरा कर सके।
यहां याद रखना चाहिए कि अवसरवादिता रालोद के पूरे इतिहास से जुड़ी है। सत्ता में भागीदारी के लिए उसे किसी का भी साथ स्वीकार है। इसलिए उसने वक्त-वक्त पर भाजपा और सपा दोनों से बेमेल साझेदारियां कीं। जहां तक उसके नये गठबंधन का सम्बन्ध है, उसके घटक जद यू का प्रदेश में अस्तित्व ही नहीं है। जातीय समीकरण बने तो भी नीतीश की जाति के लोग आमतौर से भाजपा या बसपा के साथ हैं। कभी सपा छोड़ गये उनके स्वजातीय बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेता घर वापस आ गये हैं तो बुन्देलखण्ड में भी वे उसके सहयोगी हैं। लेकिन यह नहीं माना जा सकता कि आम मतदाता उद्देश्यपूर्ण राजनीति के बजाय जाति आधारित व्यवस्था की रक्षा के लिए ही एकजुट होंगे। नीतीश की गतिविधियां पहले कभी उत्तर प्रदेश केन्द्रित नहीं रहीं, इसलिए उनकी छवि बाहरी वाली ही है।
इसी प्रकार कुछ नेताओं ने बसपा से निकलने के बाद बीएस-4 के पुराने नाम से संगठन चलाने का प्रयास किया था लेकिन परिणामों से हताश होकर वे पुन: बसपा में चले गये थे। अब बसपा से असंतुष्टि के चलते वे अजित और नीतीश के साथ हैं। लेकिन इस आशय की घोषणा वाली प्रेस कान्फ्रेंस में उनकी अनुपस्थिति से नये गठबंधन के सहयोगी के रूप में उनकी सक्रियता संदेहास्पद हो गई है। ऐसे में अंदेशा है कि इस गठबंधन का वही हश्र न हो जो सपा को बिहार के गत विधानसभा चुनावों में हुआ। वह एक भी सीट पर जमानत बचा पाने में भी सफल नहीं हुई। कई लोगों को तो इस गठबंधन को सभी 403 सीटों पर प्रत्याशी मिल पाने में भी संदेह है।
ऐसे में यह गठबंधन रालोद की किसी नई शक्ति का परिचायक नहीं है। इसके उलट उसका संदेश है कि रालोद एक बार मुलायम के नेतृत्व को स्वीकार करके भी इसलिए उसका विरोध करेगा क्योंकि उसके लिए अपनी राजनीतिक दुकान बन्द करना कठिन है।  मुलायम के विलय प्रस्ताव को वह इसलिए नहीं स्वीकार कर सकता कि यह उसके नेता के अहं और स्वाभिमान के अनुकूल नहीं पड़ता क्योंकि विलय एक प्रकार का समर्पण ही है। यह किसी राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति की भावना से सोच समझकर किया गया हो तभी प्रभावी होता है। फिर जैसे हाथी के दांत बाहर निकल आयें तो उनका अन्दर जाना संभव नहीं होता, उसी प्रकार विलगाव के बाद एकता भी नहीं होती और सबसे अधिक विलगाव तो अपने को समाजवादी बताने वालों का ही हुआ है। वे कहते भी हैं कि कोई और लडऩे वाला न मिले  तो हम आपस में लड़ते रहते हैं।
प्राय: सारे सत्तालोलुप दलों की यही  हालत होती है। भाजपा में भी ऐसे तत्व बड़ी संख्या में शामिल हैं, जो सामंती और शासक श्रेणी के माने जाते हैं। इसलिए वहां सत्ता संघर्ष की प्रवृत्ति सबसे अधिक है, जो सांगठनिक चुनाव के समय भी दिखती है, जब जीतने के लिए शक्ति का इस्तेमाल भरपूर होता है। ऐसे में यह सवाल चुनाव तक बना रहेगा कि रालोद, जदयू और बीएस-4 का गठबंधन क्या पश्चिमी उप्र के जाटों में किसी नई आशा के रूप में देखा जायेगा और क्या प्रदेश की जनता में इस गठबंधन की किन्हीं सार्थक उद्देश्यों के लिए स्वीकार्यता की उम्मीद की जा सकती है?


 

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