अच्छे दिन कैसे आएंगे!

एच एल दुसाध : सोलहवीं लोकसभा चुनाव में प्रचंड विजय हासिल करने वाले नरेंद्र मोदी अपनी सरकार बनाकर चुनाव के दौरान दिखाए गए सपनों को मूर्तरूप देने के मोर्चे पर डट चुके हैं।...

एच.एल. दुसाध

सोलहवीं लोकसभा चुनाव में प्रचंड विजय हासिल करने वाले नरेंद्र मोदी अपनी सरकार बनाकर चुनाव के दौरान दिखाए गए सपनों को मूर्तरूप देने के मोर्चे पर डट चुके हैं। चुनाव के दौरान यूँ तो उन्होंने कई सपने दिखाए किन्तु जिस सपने ने लोगों को गहराई से स्पर्श किया वह था, 'अच्छे दिन आएंगेÓ। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि किन समस्याओं से राष्ट्र को निजात दिलाकर कर वे अच्छे दिन लायेंगे, फिर भी लोगों को लगा कि उनके आने से सचमुच राष्ट्र के अच्छे दिन आ सकते हैं। और ऐसा लगना ही उनकी जीत का अन्यतम प्रधान कारण बन गया। मोदी को भी अच्छे दिन के सपनों के असर का इल्म था इसलिए काल विलम्ब किये बिना वे इस सपने को आकार देने में जुट गए हैं। इसके लिए उन्होंने अपने मंत्रिमंडल की तीन प्राथमिकताएं-सुशासन, निष्पादन और कार्यान्वयन-तय करने के साथ ही अपना दस सूत्रीय विजन प्रस्तुत कर दिया है, जिसे लेकर मुख्यधारा के बुद्धिजीवियों में सकारात्मक भाव है। लेकिन मोदी के शुरुआती कदम में मुख्यधारा के बुद्धिजीवियों को अच्छे दिन आने की जितनी भी आहट सुनाई पड़े, बहुजन बुद्धिजीवियों के लिए इसमें अच्छे दिन के लक्षण ढूंढना मुश्किल है। कारण उनके विजन में आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के खात्मे लायक तत्वों का नितांत अभाव है, जिसके कारण ही देश के वंचित बहुजन का जीवन अंधकारपूर्ण है।
काबिलेगौर है कि चिरकाल से आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या रही है। इसके खात्मे के लिए ही सम्पूर्ण विश्व में ढेरों महामानवों का उदय व भूरि-भूरि साहित्य का सृजन हुआ एवं करोड़ों लोगों ने अपना प्राण बलिदान किया। आर्थिक और सामाजिक विषमता के गर्भ से ही  भूख, कुपोषण, गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, विच्छिन्नता व आतंकवाद जैसी तरह-तरह की समस्याओं की सृष्टि होती रहती है। मोदी सरकार एक ऐसे समय में वजूद में आई है जब देश में व्याप्त भीषणतम विषमता के कारण हमारे लोकतंत्र पर गहरा संकट मंडरा रहा है। विषमता का आलम यह है कि परम्परागत रूप से सुविधासंपन्न और विशेषाधिकारयुक्त अत्यन्त अल्पसंख्यक तबके का जहां शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, सांस्कृतिक-शैक्षणिक इत्यादि प्रत्येक क्षेत्र में 80-85 प्रतिशत कब्जा है, वहीं परम्परागत रूप से तमाम क्षेत्रों से ही वंचित बहुसंख्यक तबका, जिसकी आबादी 85 प्रतिशत है, 15-20 प्रतिशत अवसरों पर आज भी जीवन निर्वाह करने के लिए विवश है। विषमता का ऐसा साम्राज्य विश्व में कहीं और नहीं है। किसी भी डेमोक्रेटिक कंट्री में परम्परागत रूप से सुविधासंपन्न तथा वंचित तबकों के मध्य आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक व सांस्कृतिक  इत्यादि क्षेत्रों में अवसरों के बंटवारे में भारत जैसी असमानता नहीं है। इस असमानता ने देश को 'अतुल्यÓ और 'बहुजनÓ-भारत में बांटकर रख दिया है। चमकते अतुल्य भारत में जहां तेजी से लखपतियों-करोड़पतियों की संख्या बढ़ती जा रही है, वहीं जो 84 करोड़ लोग 20 रुपये रोजाना पर गुजर-बसर करने के लिए मजबूर हैं, वे मुख्यत: बहुजन भारत के लोग हैं।
अवसरों के असमान बंटवारे से उपजी आर्थिक और सामाजिक विषमता का जो स्वाभाविक परिणाम सामने आना चाहिए, वह सामने आ रहा है। देश के लगभग 200 जिले माओवाद की चपेट में आ चुके हैं। लाल गलियारा बढ़ता जा रहा है और दंतेवाड़ा जैसे कांड राष्ट्र को डराने लगे हैं। इस बीच माओवादियों ने एलान का दिया है कि वे 2050 तक बन्दूक के बल पर लोकतंत्र के मंदिर पर कब्जा जमा लेंगे। इसमें कोई शक नहीं कि विषमता की  खाई यदि इसी तरह बढ़ती रही तो कल आदिवासियों की भांति ही अवसरों से वंचित दूसरे तबके भी माओवाद की धारा से जुड़ जायेंगे, फिर तो माओवादी अपने मंसूबों को पूरा करने में जरूर सफल हो जायेंगे और यदि यह अप्रिय स्थिति  सामने आती  है तो हमारे लोकतंत्र का जनाजा ही निकल जायेगा। ऐसी स्थिति सामने न आए इसके लिए डॉ. आंबेडकर ने संविधान सौंपने के पूर्व 25 नवम्बर, 1949 को राष्ट्र को सतर्क करते हुए एक अतिमूल्यवान सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था-'26 जनवरी 1950 को हम लोग एक विपरीत जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति के क्षेत्र में हम लोग समानता का भोग करेंगे किन्तु सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में मिलेगी गहरी असमानता। राजनीति के क्षेत्र में हम लोग एक नागरिक को एक वोट एवं प्रत्येक वोट के लिए एक ही मूल्य की नीति को स्वीकृति देने जा रहे हैं। हम लोगों को निकटतम समय के मध्य इस विपरीतता को दूर कर लेना होगा, अन्यथा यह असंगति कायम रही तो विषमता से पीडि़त जनता इस राजनैतिक गणतंत्र की व्यवस्था को विस्फोटित कर सकती है।Ó
हमारे गणतंत्र के विस्फोटित होने लायक स्थिति सामने आ रही है तो इसलिए कि आजाद भारत के हमारे शासकों ने संविधान निर्माता की सावधानवाणी की पूरी तरह अनदेखी कर दिया। वे स्वभावत: लोकतंत्र विरोधी थे। अगर लोकतंत्रप्रेमी होते तो केंद्र से लेकर राज्यों तक में काबिज हर सरकारों की कर्मसूचियां मुख्यत: आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे पर केन्द्रित होतीं। तब आर्थिक और सामाजिक विषमता का वह भयावह मंजर कतई हमारे सामने नहीं होता जिसके कारण हमारा लोकतंत्र विस्फोटित होने की ओर अग्रसर है। इस लिहाज से मोदी के पूर्ववर्ती डॉ. मनमोहन सिंह ही नहीं, पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गाँधी, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, जयप्रकाश नारायण, ज्योति बसु जैसे महानायकों की भूमिका का आकलन करने पर निराशा और निराशा के सिवाय और कुछ नहीं मिलता। बहरहाल हमारे राष्ट्र नायकों से कहां चूक हो गई जिससे विश्व में सर्वाधिक विषमता का साम्राज्य भारत में व्याप्त हुआ।
एक तो ऐसा हो सकता है कि गांधीवादी-राष्ट्रवादी और माक्र्सवादी विचारधारा से जुड़े हमारे तमाम राष्ट्र नायक ही समग्र वर्ग की चेतना से समृद्ध न होने के कारण, ऐसी नीतियां बनाए जिससे परम्परागत सुविधासंपन्न तबके का वर्चस्व अटूट रहे। दूसरी यह कि उन्होंने आर्थिक और सामाजिक विषमता की उत्पत्ति के कारणों को ठीक से जाना नहीं, इसलिए निवारण का सम्यक उपाय न कर सके। प्रबल सम्भावना यही दिखती है कि उन्होंने ठीक से उपलब्धि ही नहीं किया कि सदियों से ही सारी दुनिया के शासक शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक और धार्मिक-सांस्कृतिक) का लोगों के विभिन्न तबकों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारा कराकर ही आर्थिक और सामाजिक विषमता की समस्या पैदा करते रहे हैं। इसकी सत्योपलब्धि कर ही अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड इत्यादि जैसे लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देश ही नहीं, दक्षिण अफ्रीका जैसे कल के आज़ाद मुल्क ने भी अपने देश में शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-टीवी-मीडिया इत्यादि अर्थात शक्ति के समस्त स्रोतों का विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य बंटवारे की ठोस कार्ययोजना बनाई और मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या से पार पाया। किन्तु उपरोक्त देशों से लोकतंत्र का प्राइमरी पाठ पढऩे सहित कला-संस्कृति-फैशन-टेक्नोलॉजी इत्यादि सब कुछ ही उधार लेनेवाले मोदी के पूर्ववर्तियों ने शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की उनकी नीति से पूरी तरह परहेज किया। अब चुनाव प्रचार के दौरान स्वामी विवेकानंद की भूमिका में अवतीर्ण होकर जो मोदी बार-बार घोषणा करते रहे कि आने वाला दशक दलित, पिछड़ों, आदिवासियों और वंचितों का होगा, वे अगर अपनी इस घोषणा के प्रति गंभीर हैं तो उन्हें वह काम करना होगा जो उनके पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों ने किया। अर्थात उन्हें शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया, पौरोहित्य इत्यादि शक्ति के समस्त स्रोतों का भारत के प्रमुख सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य न्यायोचित बंटवारे का ठोस विजन प्रस्तुत करना तथा उसे रूपायित करवाने की प्रबल इच्छाशक्ति प्रदर्शन करना होगा। चूंकि मोदी के दस सूत्रीय विजन में शक्ति के स्रोतों के न्यायोचित बंटवारे की कोई रूप-रेखा  ही नहीं है इसलिए अंतत: यह तो दावे से कहा जा सकता है कि वंचित बहुजन समाज के अच्छे दिन आने से रहे।
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)

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