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दो कदम आगे, तीन कदम पीछे
Posted By : Tesuashish
Posted On :   (02:22:10 PM) 14, Apr, 2009, Tuesday

भाजपा को आखिर क्या हो गया है। एक अच्छी पार्टी अपने अतंद्वंद्व में फंसी हुई है। नारा हो या प्रस्तुतीकरण। हर जगह भ्रम दिखता है। 'मजबूत नेतृत्व- निर्णनायक सरकार' भाजपा यह जानती है कि वह अकेले सरकार नहीं बना सकती। उसे गठबंधन की राजनीति करनी है। ऐसे में उसे अडवानी को समझौतावादी नेता की छवि प्रस्तुत करनी चाहिए थी। राजनीति में मजबूत का उलटा कमजोर नहीं होता। यहां मजबूत का अर्थ कट्टर या समझौता नहीं करनेवाला होता है। अडवानी और अटल में यही अंतर है। अटल एक समझौतावादी नेता हैं। वह मु्द्दों को बखूबी टाल देते थे। राजनीति में चुप रहना भी कभी-कभी बहुत बोलने का काम करता है। यह गुण भी अडवानी से कहीं अधिक अटल में है। कांग्रेस की कृपा से भाजपा को मुद्दों की कभी कमी नहीं रही। भाजपा के अंदर जो लोग उसकी मार्केंटंग का काम देखते हैं, उनकी समझ में ये बात शायद नहीं आती। यही कारण है कि भाजपा की छवि बदलने की छटपटाहट के बीच उसे उसी पुरानी सूरत में लोगों के सामने लाने का काम किया गया। बाजार का एक साधारण का नियम है। आदमी उसी वस्तु को उठाता है, जिसमें कुछ नया हो। भाजपा के पास बहुत कुछ नया है। उसका घोषणापत्र में उठाए गए कई मुद्दे भारत के प्रति उसकी गंभीर चिंतन का प्रस्तुत करता है। दुख इस बात की है कि इसके बावजूद जिस कागज से उसको लपेटा गया है, उस पर राम और अन्य विवादास्पद मुद्दे मौजूद हैं। 'नई शराव पुराने बोतल मेंӠडालने की नीति समझ से परे है।

 
Posted by: rajesh jain rajnandgaon On: February 27, 2010
राजेश जैन जनप्रतिनिधि या धन्प्रतिनिधि जनता की गाढ़ी कमी से जन्प्रतिनिध्यो को सुविधा दी जा रही हे जिस वजह से जन प्रतिनिधि की आये दिन दुनी रत चोगनी बर्ध

Posted by: Chandra Mohan Dwivedi On: July 04, 2009
Maine apake vichar padhe. Lagta hai aapne visay par gambhirta se sochahai. Nishit rup se yah vichar sarahniy hain.

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