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मोदी के सामने है गुरु दक्षिणा देने की चुनौ
Posted By : Sanjay vatsa
Posted On :   (01:33:28 PM) 10, Apr, 2009, Friday

विधानसभा की पिच पर छक्कों की बारिश करने वाले भाजपा के शीर्ष नेताओं में शुमार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी संपन्न होने जा रहे लोस चुनाव की पिच पर किस तरह की बल्लेबाजी करेंगे पर सभी की निगाहें टिकी हैं। मसलन क्या वो भाजपा की झोली में लोस की ज्यादा सीटें जीतकर अपने शीर्ष नेता अडवानी को अंतिम बार गुरु दक्षिणा दे पाएंगे। यदि लोस सीटों के रूप में गुरु दक्षिणा में कमी रही तो यह स्वयं मोदी के राजनीतिक कद को मापने का पैमाना तो बनेगा ही साथ ही पार्टी का विरोधी खेमा भी सक्रिय होगा। मोदी की राजनीतिक चुनौती लोस चुनाव के बाद तब और बढ़ सकती है जब हिंदू कार्ड को दरकिनार कर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह व मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान विकास के राजनीजिक कार्ड पर भाजपा का परचम लहरा देंगे। वो भी उन स्थितियों में जब भाजपा के इन दोनों मुख्यमंत्रियों ने मोदी को अपने यहां स्टार प्रचारक के रूप अस्वीकार कर दिया है। यह चुनाव भाजपा के लिए कई अन्य मामलों में भी महत्वपूर्ण होगा। काफी लंबे समय से अपनी हिंदूवादी छवि से निकलने का प्रयास कर रही भाजपा को यह तय करना पड़ेगा कि वो रमन सिंह व शिवराज सिंह चौहान के 'विकासवाद' का चोला पहनेगी या मोदी का 'रामनामी चादर लपेटेगी। राजग के प्रमुख साथी नीतीश कुमार भी भाजपा के सहयोगी के रूप में बिहार से अधिक लोस सीटें निकालकर भाजपा के 'रामनामी' मोदी खेमे को करारा जबाब दे सकते हैं। बिहार में नीतीश कुमार भी विकास के मुद्दे पर चुनावी बाजी मारने के लिए कमर कस चुके हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि अडवानी के प्रधानमंत्री बनने का सपना अब बहुत कुछ गुजरात, छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश व बिहार की सीटों पर मिली जीत से ही तय होगा। इस कड़ी में उत्तरप्रदेश की भूमिका सबसे ज्यादा निर्णायक है किंतु भाजपा को यहां ज्यादा उम्मीद नहीं है। वो भी उन स्थितियों में जब सूबे में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह बड़ा कद तो रखते हैं पर सपा व बसपा के जातिगत किलेबंदी को भेदने में सक्षम नहीं हैं। इस लोस चुनाव में अडवानी की निगाह इन्हीं राज्यों पर ज्यादा है। यदि इन राज्यों में भाजपा अच्छा कर गई तो अडवानी की प्रधानमंत्री की राह थोड़ी आसान हो सकती है। बिहार में 40, मघ्यप्रदेश में 29, छत्तीसगढ़ में 11 लोस सीटें हैं। इस तरह से भाजपा की निगाहें कुल मिलाकर इन राज्यों की 80 सीटों पर जाकर ठहर गई हैं। जहां तक इन राज्यों में विगत के लोस चुनावी नतीजों का है तो बिहार में भाजपा ने 5 व इसके सहयोगी जेडयू ने 6 लोस सीटें को हथियाया था। वहीं मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में उम्दा प्रदर्शन करते हुए क्रमश: 25 व 10 लोस सीटों पर विजय हासिल की थी। जबकि गुजरात में 14 लोस सीटों पर कब्जा किया था। प्रेक्षकों के अनुसार इस लोस चुनाव के बाद जहां नरेन्द्र मोदी को गुरुदक्षिणा और अपने कद का भय सता रहा है वहीं इसके विपरीत छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह व मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी कुछ इसी तरह की है चिंता सता रही है। दोनों राज्यों में इन नेताओं ने भाजपा को जिस तरह से परिभाषित कर पार्टी का झंडा गाड़ा है, उसी तरह लोस चुनाव में भी उनके सामने इसे कायम रखने की बड़ी चुनौती है। प्रेक्षकों के अनुसार यदि यहां ये दोनों नेता फलाप हुए तो न सिर्फ इनका राजनीतिक कद कम होगा बल्कि भाजपा को सैद्घांतिक रूप से गहरा झटका लगेगा। इन स्थितियों में भाजपा फिर से 'राम' व 'विकास' के दो धुर विरोधी विचारधारा में तैरने को विवश होगी। जिसका सबसे ज्यादा राजनीतिक फायदा कांग्रेस व अन्य तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों को होगा।

 
Posted by: sudhirti On: November 12, 2009
ये और रोचक लिखा जा सकता था. काफी जगह व्याकरण की अशुद्धि है.

Posted by: Kaushal Kishore Singh On: August 18, 2009
हाय संजय, मैंने ये सामयिक पढ़ा, अच्छा लगा . मैं आपसे संपर्क करना चाहता हूँ . प्लीज आप अपना संपर्क सूत्र दे . कौशल किशोर सिंह

Posted by: kumar On: August 02, 2009
eksnh ds lkeu

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