लोकतंत्र का महापर्व यानी आम चुनाव का शंखनाद होते ही राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने गठबंधन को मजबूत करने में लग गई है। देश में पिछले दो दशक से गठबंधन दलों का शासन रहा है और ऐसा लगता है कि अवाम इस बार भी किसी एक दल के हाथ में सत्ता की बागडोर देने के मूड में नहीं है। मौजूडा राष्ट्रीय परिदृश्य में सबसे बड़े राजनीतिक दलों के दो गठबंधन एक कांग्रेस की नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) और भाजपा की अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) है। राजनीतिक परिदृश्य पर तीसरा मोर्चा एक बार फिर आकार लेता दिखाई पड़ रहा है। इस बार मोर्चे को बढ़ाने की पहल माकपा महासचिव प्रकाश कारात व भाकपा के ए बी वर्धन कर रहे हैं। यूपीए का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पांच साल तक केंद्र में सत्तारूढ़ रही है, उसकी पहली प्राथमिकता है कि अपने गठबंधन को बनाए रखना और सरकार की उपलब्धियों के आधार पर जनता के बीच जाना। यूपीए में शामिल कई घटक अलग शासन के दौरान पहले ही अलग हो चुके हैं। जिनमें आंध्र से टीआरएस, उत्तरप्रदेश में मायावती और पश्चिमबंगाल और केरल सहित देशभर में उपस्थिति दर्ज कराने वाले पार्टी वामपंथी भी उससे किनारे हो गए हैं। हालांकि वामदल यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे लेकिन उसकी उपस्थिति कांग्रेस और खासकर यूपीए के लिए काफी महत्वपूर्ण थी। मौजूदा यूपीए में महाराष्ट्र से शरद पवार की पार्टी एनसीपी का कांग्रेस से सीटों का समझौता हो गया है। वहीं बिहार की राजनीति कर रहे आरजेडी प्रमुख लालू यादव और लोकजनशक्ति के बीच अब भी सीटों को लेकर खींचतान जारी है। इस्से पहले 2004 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ी, वहीं पासवान अपना अलग ही उम्मीदवार उतारे थे। इस बार लालू यादव की कोशिश है कि पासवान किसी तरह उनके साथ हो जाये। लेकिन आरजेडी के सामने कांग्रेस और लोजपा द्वारा ज्यादा सीटों की मांग से मुश्किलें आ रही है। लोकसभा में सबसे ज्यादा सांसदों को भेजने वाले उत्तरप्रदेश में स्थिति अब भी साफ नहीं है। कांग्रेस यहां पर कभी बसपा सुप्रीमो तथा प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के सहारे राजनीति कर रही थी, लेकिन राजनीतिक मजबूरी के चलते अब वो पाला बदल चुकी है। पर अब हालत् बदल चुके है अब कांग्रेस उप्र में मायावती की घोर राजनीतिक विरोधी समाजवादी पार्टी के साथ है। हालांकि सपा के साथ कांग्रेस का गठबंधन नहीं हो पाया है। सपा के साथ उसका केवल कुछ सीटों के लिए समझौता हो पाया है। कांग्रेस के साथ सपा का यह समझौता राजनीतिक मजबूरी ही कहेंगे। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ चुनाव लडऩे का फैसला किया है। बनर्जी को कांग्रेस के नजदीक लाने में विदेश मंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रणव मुखर्जी की भूमिका अहम रही है। आंध्रप्रदेश में कांग्रेस सत्तासीन रही है। लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा का चुनाव हो रहा है और राज्य में सत्तासीन कांग्रेस के कामकाज का असर पडऩा स्वाभाविक है। इस बार चुनाव में टीआरएस भी नहीं है जो पिछले लोकसभा व विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ था। राज्य के मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी पर हाल ही में वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगा है जो चुनावी बेला में अच्छा नहीं माना जा सकता। अब देखना है कि राज्य की जनता इसे किस रूप में लेती है। तमिलनाडु में यूपीए के घटक डीएमके का शासन है और वह घटक में पूर्व की तरह इस बार भी बना रहेगा। श्रीलंका में लिट्टे के खिलाफ सैनिक अभियान का यहां की राजनीति पर प्रभाव पडऩा स्वाभाविक है। श्रीलंका के सैनिक अभियान को लिट्टे के खिलाफ रोकने के लिए तमिलनाडु के राजनीतिक पार्टी केंद्र पर खासा दबाव डाल रहे थे। भारत सरकार लिट्टे के खिलाफ अभियान को रोकपाने में नाकाम रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए इस घटनाक्रम का तमिलनाडु की राजनीति से खासा जुड़ाव रहा है। नए परिप्रेक्ष्य में यह घटना यहां के जनमानस पर कितना असर डाल पाएगी यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा। लोकसभा चुनाव में यूपीए के बाद भाजपा के नेतृत्व वाले दूसरे गठबंधन एनडीए पर नजर डालते हैं तो अब पहले वाली बा तो रही नहीं, अब यानी अटल बिहारी वाजपेयी का नेतृत्व वाला गठबंधन तो रहा नहीं। इसका नेतृत्व अब लालकृष्ण आडवाणी कर रहे हैं जो घटक की ओर से प्रधानमंत्री उम्मीदवार हैं। इस गठबंधन के नवनियुक्त संयोजक और जद-यू अध्यक्ष शरद यादव के कंधों पर एनडीए के बिखरे घटक को एकजुट करने की है। हालांकि भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और खुद आडवानी भी इसके लिए काफी सक्रिय हैं। कोशिश यह की जा रही है कि चुनाव पूर्व ही एनडीए में ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रीय दलों को शामिल कर इसे मजबूत किया जाए। चुनाव से पूर्व के गठबंधन का लाभ सीटों की संख्या में बढ़ोत्तरी के साथ ही साथ सरकार के गठन में मिलता है। जबकि चुनाव के बाद हुए समझौते का वैसा लाभ सरकार गठन के वक्त नहीं मिल पाता। एनडीए में श्री आडवाणी हाल ही में ओमप्रकाश चोटाला की पार्टी को तोड़ने में सफल हुए हैं, वहीं पश्चिमी उत्तरप्रदेश में मजबूत जनाधार वाले जाट नेता चौधरी अजीत सिंह की पार्टी अब इसके गठबंधन में शामिल है। हालांकि अजीत सिंह पर कांग्रेस और सपा दोनों की नजर लगी हुई थी। कांग्रेस ने इसके लिए प्रयास भी किया लेकिन वह विफल रही। भाजपा के साथ अजीत सिंह के आ जाने का फायदा पश्चिमी उत्तरप्रदेश में अवश्य मिलेगा। भाजपा अब पश्चिमी उत्तरप्रदेश में 20 सीटों पर अपना उम्मीदवार खड़ा करेगी और अजीत सिंह 7 सीटों पर। एनडीए के पाले में असम गण परिषद (उल्फा) जैसा राजनीतिक दल एक बार फिर शामिल हो गया है। एनडीए में शामिल सबसे पुराने दल शिवसेना और भाजपा के बीच एक बार फिर सीटों को लेकर खींचतान जारी है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि दोनों पार्टियों के शीर्ष नेता इसे सुलझाने में सफल होंगे। यही स्थिति कमोबेश बिहार में सत्तारुढ़ जनता यू और सहयोगी भाजपा की है। दोनों दलों के बीच सीटों को लेकर वाकयुद्ध चल रहा है। भाजपा बिहार में 18 सीटों की मांग कर रही है वहीं जद-यू इतना देने को तैयार नहीं है। लेकिन लगता है कि एनडीए संयोजक शरद यादव इस मसले को निपटा लेंगे और दोनों मिलकर लोकसभा की 40 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। उड़ीसा में आठ मार्च को हुए नए घटनाक्रम में भाजपा और बीजू जनदा दल के बीच समझौता टूट गया है। उड़ीसा की बात करें तो वहां लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी हो रहे हैं। भाजपा के लोकसभा की ज्यादा सीटों पर लडऩे के प्रस्ताव को बीजेडी ने खारिज कर दिया है। बीजेडी एनडीए के पुराने सहयोगियों में रहा है। दोनों दलों के बीच गठबंधन केंद्रीय ही नहीं राज्य स्तर पर भी सत्ता में भागीदार रहा है। एनडीए और खासकर भाजपा के लिए इस गठबंधन का टूटना काफी नुकसानदेह होगा। भाजपा के बीजेडी से समर्थन वापस लेने के बाद सरकार अल्पमत में आ गई है। राज्यपाल एमसी भंडारे ने मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से 11 मार्च को विधानसभा में बहुमत साबित करने का निर्देश दिया है। दक्षिण भारत में भाजपा का कोई खास जनाधार नहीं है। वहां पर वह क्षेत्रीय दलों के साथ गठजोड़ करती रही है। आंध्र में जहां विधानसभा चुनाव लोकसभा के साथ ही हो रहे हैं। आंध्र में पिछले चुनाव में एनडीए का सहयोग तेलुगु देशम पार्टी को था जो अब इस गठबंधन से बाहर हो गया है और वह अकेले ही चुनाव लड़ रही है। वहीं तेलंगाना राष्ट्र के मु्द्दे पर बनी तेलंगाना राष्ट्र समिति पर भाजपा की नजर है। भाजपा चाहती है कि टीआरएस के साथ समझौता होंने पर आंध्र के साथ-साथ लोकसभा में भी उसका लाभ मिल सके। तमिलनाडु में भी एनडीए को अब तक कोई सहयोगी नहीं मिल पाया है। हालांकि तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री के साथ गठबंधन की बात भाजपा ने आगे बढ़ायी थी पर उसका कोई सार्थक परिणाम अब तक नहीं सामने आ पाया है। दक्षिण भारत में सीटों से तालमेल का जिम्मा भाजपा ने अपने पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू को दिया है। अब देखना है कि नायडू अपने इस जवाबदेही को कितना अंजाम दे पाते हैं। हालांकि इस बार खुद भाजपा के अंदर ही सबकुछ ठीक नहीं है। उत्तरप्रदेश में लोधी जाति और पिछड़ों में पैठ रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अब भाजपा से अलग होकर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है। इसका असर पार्टी के जनधार पर कितना पड़ता है यह आने वाला वक्त ही बताएगा। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी की स्टार प्रचारक रही साध्वी उमा भारती इस बार अपनी जनशक्ति पार्टी बना चुकी है। हालांकि मध्यप्रदेश की जनता में जनाधार वाली उमा को हाल के विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना पड़ा है, फिर लोकसभा चुनाव में भाजपा को कितना नुकसान पहुंचाएंगी यह अहम मसला है। इस बीच तीसरे मोर्चे से एक बार फिर गति मिलने की संभावना व्यक्त की जा रही है। माकपा महासचिव प्रकाश कारात इस मोर्चे को अस्तित्व में लाने में लगे हुए हैं। कारात बीजेडी प्रमुख नवीन पटनायक के संपर्क में हैं और उम्मीद की जा रही है कि एनडीए से अलग होने के बाद तीसरे की तरफ रूख करें। माकपा उड़ीसा में बीजेडी से चुनावी तालमेल करने को इच्छुक है। दूसरी ओर पूर्व प्रधानमंत्री और जेडी एस प्रमुख एचडी देवेगौड़ा भी तीसरे मोर्चे की कवायद की ओर बढ़ रहे हैं और शीघ्र ही इसकी घोषणा करने वाले हैं। यूएनपीए जो अब तक बनता बिगड़ता रहा है उसमें शामिल दल भी तीसरे मोर्चे की ओर आ सकते हैं। इस मोर्चे में जो दल आ स�ते हैं उनमें तेलुगु देशम पार्टी, आईडीएमके, समाजवादी पार्टी, हरियाणा से ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी और झारखंड में बाबूलाल मरांडी की पार्टी। कारात का कहना है कि बसपा प्रमुख व उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती उनके संपर्क में हैं। दो दशकों के राजनीतिक गतिविधि को देखे तो भारत की राजनीति में इस बार भी गठबंधन दलों का वर्चस्व रहेगा। राजनीतिक दल अपने-अपने गठबंधन दलों को खोजने में लगे हैं। उन्हें चुनावी मुद्दों की तलाश है। देश इस वक्त संकट से जुझ रहा है। आर्थिक बदहाली के चलते बेरोजगारी की समस्या आ खड़ी हुई है। उड़ीसा में चर्च पर हमले से लेकर नागपुर बम विस्फोट से जुडे अभियुक्त सेना के पूर्व अधिकारी पुरोहित और साध्वी के संलिप्तता जैसे मामले हैं। वहीं देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में आतंकवादी हमले का जख्म देश की जनता अभी तक नहीं भूल पायी है। यह चुनाव वाकई चौंकाने वाला हो सकता है, जब अवाम की जनता अपना फैसला देगी। |