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मृत्युंजय
Posted By : Tarushikha
Posted On :   (02:32:24 AM) 06, Dec, 2008, Saturday

मृत्युंजय शिवाजी सामंत की एक कालजयी कृति है. कर्ण की नज़र से महाभारत के पूरे घटनाक्रम को देखना खलनायकों की एक दूसरी छवि प्रस्तुत करता है. आम तौर पर खलनायक बस एक बुरा व्यक्ति होता है जिसमें आम मानवीय भावनाएं नहीं होती हैं. मृत्युंजय इस मिथक को तोड़ते हुए वह पक्ष उजागर करता है जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हर बात सिर्फ ब्लैक और व्हाइट में नहीं होती बल्कि हर खलनायक के पीछे शायद कोई महानायक ही होता है. इतना सब वर्णित करते हुए भी यह उपन्यास बुराई को महिमामंडित नहीं करता. बुरे का अंत बुरा ही होगा, यह निश्चल सत्य दिखाता है. पूरे उपन्यास में कर्ण का आत्मवर्णन मुख्यतः है, उसके अलावा कृष्ण, कुंती, दुर्योधन, द्रौपदी आदि के भी आत्मवर्णन हैं जो बहुत खूबसूरती से लिखे गए हैं.

 
Posted by: pradeep parihar On: July 30, 2009
ये सच है की हर खलनायक के अंदर एक नायक छुपा रहता है लेकिन वो नायक अपनी शक्तियों का दूरउपयोग कर बाहर आ जाता है। आपने कम शब्दों में मृत्युंजय पुस्तक का वर्णन बहुत सुंदर किया है।

Posted by: Meet On: July 20, 2009
is se parichay karane ke liye thnx.... age kuch or bhi padhna chahunga... meet

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