हर साल की तरह इस साल भी दिल्ली के जिस अपार्टमेन्ट में मैं रहती हूँ, गणतंत्र दिवस मनाने का निश्चय किया गया. बच्चे सबसे ज्यादा उत्साहित थे क्योंकि उन्होंने अपनी तैयारी कर रखी थी. तैयारी इस बात की कि कौन से गाने गए जायेंगे, कौन सा नाटक खेला जायेगा, इत्यादि. गणतंत्र दिवस कि सुबह दिल्ली में कोहरे का ज़बरदस्त आलम था. बच्चों के उत्साह में फिर भी कोई कमी नहीं थी. यहाँ यह भी बता दूं कि ये बच्चे ४-१२ वर्ष के थे. उनसे बड़े बच्चो की बात बाद में करूंगी.
खैर, तकरीबन १०-१०.३० बजे बच्चे पार्क में इकठ्ठा हो गए. बड़ों में अपार्टमेन्ट के सचिव, गार्ड और एकाध माता-पिता को छोड़कर कोई नहीं था. ११ बजे बुलावा शुरू हुआ कि झंडावंदन किया जायगा, सभी से अनुरोध है कि पार्क में आ जाएँ. बच्चों में कुलबुलाहट बढ़ रही थी, परन्तु लोग अपने-अपने घरों से निकलकर पार्क में आने को तैयार ही नहीं दिख रहे थे. शायद सर्दी और कोहरे में गणतंत्र से ज्यादा दम है. इंडिया गेट और राजपथ तो कोहरे के आगे नहीं झुके, परन्तु उच्च मध्यम वर्गीय परिवार के लिए गणतंत्र सिवाय छुट्टी के और कुछ नहीं होता.
पौने बारह बजे कुछ लोगों के इकठ्ठा हो जाने पर कार्यक्रम शुरू हुए. बच्चों ने तो अच्छी प्रस्तुति दी, किन्तु किसी भी बड़े के पास अपने बच्चों से गणतंत्र के बारे में कहने के लिए दो शब्द भी नहीं थे. वे फ़िल्मी गानों और नृत्यों पर अपने बच्चों के करतब देखकर ही बहुत खुश थे. टीन एजर को तो किसी भी बात से जैसे कोई मतलब ना था, वे रोजाना की तरह अपनी ही गप्पों में उलझे थे. ek -दो लोगों ने कुछ deshbhakti के geet गाने की pahal की भी तो saath dene vaalon की betarah कमी थी.
kul milakar हर २६ जनवरी और 15 august की khanapoorti इस baar भी nipat gayee. desh ने क्या khoya और क्या paaya, ये तो nai peedhi के बड़े hone पर pata chal ही जायेगा. |