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बाबा की अथाईं और बाबा का ही न्याय
Posted By : Dr. Purushottam Meena
Posted On :   (09:39:41 AM) 12, Dec, 2009, Saturday

आदिवासी गाँवों में पंचों द्वारा संयुक्त रूप से बैठकर जिस स्थान पर पंचायत कर स्थानीय मामलों में निर्णय लेकर न्याय किया जाता है, उस स्थान को स्थानीय बोली में अथाईं कहा जाता है और गाँव में बड़े-बुजर्गों को सम्मान सूचक सम्बोधन ''बाबा'' कहकर बुलाया जाता है। अपने पिता के बड़े भाई को तथाा दादा को भी वहाँ पर ''बाबा'' सम्बोधन दिया जाता है। इसलिये गाँव में न्याय करने वाले पंच पटेलों को भी 'बड़े' मानकर सम्मान तथा आदर देने के लिये ''बाबा'' कहा जाता है। 

 हमारे देश के संविधान में किसी भी व्यक्ति के लिये सुप्रीम कोर्ट न्याय की अन्तिम आशा का केन्द्र है, जहाँ से हर आम-ओ-खास द्वारा संविधान सम्मत न्याय की प्राप्ति के साथ-साथ निष्पक्षता और सम्पूर्ण पारदर्शित की उम्मीद भी की जाती रही है। यही नहीं समाज का हर वर्ग यह मानकर निश्चिन्त रहता ??ै कि देश में आजाद न्यायपालिका के चलते किसी के साथ अन्याय हो ही नहीं सकता। न्यायपालिका ने अनेकों बार इस बात को बखूबी प्रमाणित भी किया है। न्यायपालिका ने अनेक निर्णयों में संविधान के अनुच्छेदों की गूढ व्याखा करके समाज, सरकार एवं विधायिका का भी मार्ग प्रशस्त किया है। जिसके लिये भारतीय समाज अपनी न्यायपालिका पर गर्व करता है। लेकिन अनेक बार सुप्रीम कोर्ट से भी ऐसे निर्णय आते हैं कि व्यक्ति सोचने का विवश हो जाता है कि यह जो निर्णय हुआ है, क्या इसमें न्याय भी हुआ है? कानून का ज्ञान रखने वाले जानते हैं कि न्यायशास्त्र का एक मौलिक सिद्धान्त है कि केवल इससे काम नहीं चलता है कि कोर्ट द्वारा फैसला सुना दिया जाये, बल्कि जो फैसला सुनाया गया है, उससे न्याय होते हुए भी दिखना चाहिये। इस पवित्र सिद्धान्त को स्वीकार करते हुए हमारे देश की न्यायपालिका द्वारा अनेक बार अनेक मामलों में इसका उल्लेख एवं अनुपालन भी किया गया है। जिससे देश के आम व्यक्ति के हृदय में न्यायपालिका की शाख एवं प्रतिष्ठा बढी है। लेकिन पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक ऐसा फैसला सुनाया गया, जिसे पढकर आश्चर्य के साथ, बार-बार मन में यह सवाल उठा कि क्या वाकई इस फैसले में न्याय हुआ है?

 सूचना अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पढकर बरबस मुझे अपने पैतिृक आदिवासी गाँव की एक कहावत याद आ गयी, जो इस प्रकार है-''बाबा की अथाईं और बाबा की ही न्याय''। आदिवासी गाँवों में पंचों द्वारा संयुक्त रूप से बैठकर जिस स्थान पर पंचायत कर स्थानीय मामलों में निर्णय लेकर न्याय किया जाता है, उस स्थान को स्थानीय बोली में अथाईं कहा जाता है और गाँव में बड़े-बुजर्गों को सम्मान सूचक सम्बोधन ''बाबा'' कहकर बुलाया जाता है। अपने पिता के बड़े भाई को तथाा दादा को भी वहाँ पर ''बाबा'' सम्बोधन दिया जाता है। इसलिये गाँव में न्याय करने वाले पंच पटेलों को भी 'बड़े' मानकर सम्मान तथा आदर देने के लिये ''बाबा'' कहा जाता है। आमतौर पर गाँव के पंच सार्वजनिक अथाईं पर बैठकर ही निर्णय करते हैं, लेकिन यदा-कदा किसी अत्यन्त प्रभावशाली पंच के प्रभाव के चलते ऐसे पंच (पटेल या जिसे बाबा कहते हैं) के निवास पर भी पंचायत बुला ली जाती है, (जिसे यद्यपि ठीक नहीं माना जाता है, क्योंकि ऐसी सम्भावना बनी रहती है कि किसी के घर बैठकर, घर के मालिक के प्रभाव एवं दबाव में आकर पंच गलत निर्णय कर सकते हैं) और यदि ऐसी पंचायत में प्रभावशाली पंच द्वारा ही निर्णय लिया जाता है तो फिर उक्त कहावत चरितार्थ होती है कि-''बाबा की अथाईं और बाबा का ही न्याय''। जो लोग सूचना अधिकार से जुड़े हुए हैं, उन्हें मालूम होगा कि कुछ समय पूर्व भारत के मुख्य न्यायाधीश श्री बालाकृष्णनजी ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि उनका कार्यालय सूचना अधिकार के दायरे में नहीं आता है। इसलिये वे सूचना अधिकार के तहत चाही गयी जानकारी नहीं देंगे। जानकारी भी वो जो सुप्रीम कोर्ट के अन्य साथी न्यायाधीशों की सम्पत्ति से सम्बन्धित है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के अधिकतर जज सार्वजनिक नहीं करना चाहते। मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय का संचालन, मुख्य न्यायाधीश के प्रशासकीय नियन्त्रण में सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार द्वारा किया जाता है। मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय के प्रभारी रजिस्ट्रार ने सम्भवतः मुख्य न्यायाधीश के बयान को ध्यान में रखते हुए मुख्य सूचना आयुक्त के निर्देशानुसार सूचना अधिकार कानून के तहत चाही गयी सूचना प्रदान करने के बजाय, इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके मुख्य सूचना आयुक्त के निर्देश को उन जजों के समक्ष चुनौती दी, जिनके या जिनके साथियों के बारे में सूचना दी जानी थी।

पहली बात तो ऐसे मामले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुना जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के उस सिद्धान्त के प्रतिकूल है, जिसमें कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति स्वयं अपना न्यायाधीश नहीं हो सकता, लेकिन यहाँ एक संवैधानकि सवाल यह भी उठता है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट का रजिस्ट्रार यदि मुख्य सूचना आयुक्त के निर्णय से असन्तुष्ट है तो क्या उसे सुप्रीमकोर्ट में जाने का हक नहीं होना चाहिये? जब सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी निकायों एवं नागरिकों को किसी निर्णय को न्यायालय में चुनौती देने का हक है तो फिर सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को यह हक क्यों नहीं? संविधान में ऐसी कोई रुकावट नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट, अपने रजिस्ट्रार द्वारा दायर मामले की सुनवाई नहीं करेगा। फिर भी आम व्यक्ति की भांति रजिस्ट्रार से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती थी कि वह सीधा सुप्रीम कोर्ट जाने के बजाय, पहले हाई कोर्ट में जाते, लेकिन ऐसा करने में समय लग सकता था और विपरीत निर्णय भी आ सकता था, जैसा कि दिल्ली हाई कोर्ट पूर्व में निर्णय सुना चुका है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एक लोक सेवक हैं और किसी भी लोक सेवक के कार्यालय में उपलब्ध सूचना को, सूचना अधिकार के तहत जानने का देश के नागरिकों को पूरा-पूरा अधिकार हैं। इस निर्णय के विरुद्ध दिल्ली उच्च न्यायालय की संविधान पीठ के समक्ष अपील विचाराधीन रहते हुए, इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा रजिस्ट्रार की याचिका की सुनवाई करते हुए सूचना देने पर रोक लगा दी गयी है। जबकि जैसा कि ऊपर लिखा गया है कि पहली बात तो ऐसे मामले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुना जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के प्रतिकूल है।

दूसरे संविधान में सुप्रीम कोर्ट को न्याय दिलाने की अन्य कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिये मेरा मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले को सबसे पहले तो निरस्त कर देना चाहिये था, अन्यथा संसद को भेजकर आग्रह करना चाहिये था कि जिस मामले में सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के अधिकतर जज व्यक्तिगत रूप से जुड़े हुए हैं, उस मामले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुना जाना उचित नहीं है। अतः जरूरी हो तो संसद इस बारे में निर्णय करे या संसद ऐसी किसी संवैधानिक निकाय की स्थापना करे जो ऐसे मामलों में निर्णय कर सकने में सक्षम हो। परन्तु दुःखद पहलु यह है कि सूचना अधिकार के क्रियान्वयन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने वह सब नहीं किया, जिसकी भारतीय की न्यायपालिका के इतिहास को देखते हुए अपेक्षा की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने मुख्य न्यायाधीश द्वारा सार्वजनिक रूप से सूचना नहीं दिये जाने की घोषणा कर दिये जाने के बाद, स्वयं सुप्रीम कार्ट द्वारा अपने मुख्य न्यायाधीश की सार्वजनिक धारणा पर, न्यायिक निर्णय की मोहर लगा देने से न तो मुख्य न्यायाधीश के सार्वजनिक बयान को वांछित वैधानिकता प्राप्त होती है और न हीं, इससे न्यायपालिका की छवि में निखार आया है।

हम सभी जानते हैं कि सूचना का अधिकार अधिनियम भ्रष्टाचार के दलदल में फंस चुकी देश की व्यवस्था को बचाने हेतु आजादी के बाद संसद द्वारा उठाया गया सबसे महत्वपूर्ण ऐसा कानून है, जिससे पहली बार जनता को अपनो नौकरों (लोक सेवकों) से सवाल-जवाब करने का अधिकार मिला है। इस पवित्र कानून को सर्वोच्च न्यायपालिका का समर्थन नहीं मिलना संविधान निर्माताओं की भावनाओं और देश की जनता के लिये दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा। अब सूचना अधिकार से जुड़े लोगों को इस विषय में अपनी रणनीति फिर से बनानी होगी। यदि न्यायपालिका इस कानून के बीच में आकर, जनता एवं लोक सेवकों के बीच में खड़ी हो गयी है, तो फिर आम लोगों को अपनी सारी आशाएँ या तो उसी संसद पर छोड़नी होंगी, जहाँ पर हमारे जनप्रतिनिधि हमारी आवाज उठाने के लिये चुने गये हैं। जिन्होंने साहस करके इस कानून को बनाया है। या फिर सड़कों पर उतरकर जनान्दोलन छेड़ने के लिये तैयार रहना होगा। न्याय के मार्ग पर चलने वालों को हर कदम पर अग्नि परीक्षा देने के लिये तैयार रहना चाहिये। इसके बिना कुछ भी नहीं मिल सकता सकता।

अन्त में एक बात और, कि केवल अधिकार मिल जाने मात्र से कुछ नहीं होता, अधिकारों की सुरक्षा करने में सक्षम कौम ही अपने अधिकारों को सुरक्षित रख सकती हैं। लापरवाह एवं असंगठित लोगों के अधिकार छीन लिये जाते हैं। यह बात सार्वेच्च न्यायालय के निर्णय से सिद्ध हो चुकी है। इसलिये मैं भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान के कार्यक्रमों और सभाओं में, अकसर अपने साथियों से कहता रहता हँू कि- एक साथ आना शुरूआत है, एक साथ रहना प्रगति है और एक साथ काम करना सफलता है। मैं समझता हूँ कि अब आम व्यक्ति के पास इसके अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं बचा हैं।

 साभार / स्त्रोत - लेखक होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसमें 09 दिसम्बर, 2009 तक, 3927 रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के 17 राज्यों में सेवारत हैं। संपर्क : सायं - 07 से 08 के बीच फोन न. 0141-2222225, Mobile : 098285-02666.

 
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