Last Updated: 10:51:22 PM 14, Mar, 2010, Sunday
साइन इन   संपर्क करें
खबरे लगातार 10:51:22 PM 14, Mar, 2010, Sunday समाचार सेवाएँ डेस्कटॉप पर मोबाइल पर घर पर आर एस एस फीड
होम आज का अंक पिछले अंक      ब्लॉग्स
ताजा समाचार
    हत्या मामले में शिबू की सुनावाई 18 को    मध्य प्रदेश : युवती को जिंदा जलाया, हालत गंभीर    ग्रेनेड हमले में सीआरपीएफ का जवान शहीद, 5 घायल    उड़ीसा में मिसाइल परीक्षण स्थगित    आतंकवादियों की मुंबई पर हमले की योजना थी     आईपीएल : रॉयल चैलेंजर्स मुश्किल में, 4 विकेट गिरे    कंधार में तालिबान का हमला, 35 की मौत    महिला विधेयक 'अंतर्राष्ट्रीय साजिश' : मुलायम    हिमाचल और पंजाब में भूकंप के झटके    साइकिल सवार हवाई पट्टी पर आया, बाल-बाल बचे मुलायम    आईपीएल : तेंदुलकर, संगकारा और गंभीर पर 20-20 हजार डॉलर का जुर्माना     बांग्लादेश की पहली पारी 296 रनों पर सिमटी    आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने नहीं टूटने दिया पूर्ववर्तियों का रिकार्ड    मुस्लिम सांसदों ने की आरक्षण की मांग     तीस्ता नदी जल बंटवारे पर अंतरिम समझौता चाहता है बांग्लादेश    खसरे के टीके से हुई बच्चों की मौत के मामले में एक गिरफ्तार    मुंबई में तेल टैंकों पर हमले की साजिश में 2 गिरफ्तार   
  Top Blogers
मोदी के सामने है गुरु दक्षिणा देने की
By sanjay vatsa
दो कदम आगे, तीन कदम पीछे
By tesuashish
मृत्युंजय
By Tarushikha
Sharing &
By priyanka.singhal
गठबंधन राजनीति का
By omprakash
  New Blogers
बाबा की अथाईं और
By Dr. Purushottam Meena
बुंदेलखंड के
By shibbubhai
Parchment
By priyanka.singhal
How to
By dryogeshmathur
सुरक्षित परिवहन
By anilsagar
 ब्लॉग्स
आसपास

   रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से लिए गए रोचक वाकिये
दोनों बीवी राजी, क्या करेगा काजी?
Posted By : Dr. Purushottam Meena
Posted On :   (12:10:38 PM) 29, Nov, 2009, Sunday

दुर्भाग्य है, इस देश का और इस देश की स्त्रियों का कि आज 21वीं सदी में भी कानून उसी प्रकार से काम कर रहा है, जैसे कि 17वीं और 18वीं शताब्दी में करता था। ------------------------------------------------------------------------------------------------- हम सबने कहावत पढी और सुनी है कि "मियां बीवी राजी, क्या करेगा काजी?" लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में सुनाये गये एक निर्णय की गहराई में जाने पर जो बात निकलकर सामने आयी है, उसके आधार पर मैं एक नयी कहावत का सृजन करने का दुस्सहस कर रहा हूँ-"दोनों बीवी राजी, क्या करेगा काजी (कानून)?" 

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में ठक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका दूरगामी परिणाम क्या होगा? यह अभी कहना जल्दबाजी होगा, लेकिन चूंकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध किसी भी अदालत में अपील नहीं की जा सकती। इसलिये प्रत्येक भारतीय के लिये मामनीय सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को मानना संविधान द्वारा निर्धारित बाध्यता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा है कि किसी पुरुष की मृत्यु के बाद यदि उसकी पहली पत्नी को कोई आपत्ति नहीं हो तो उसकी दूसरी पत्नी को भी सरकारी नौकरी में अनुकंपा नियुक्ति पाने का कानूनी अधिकार है। जबकि हम सब जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के ठीक विपरीत हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के तहत एक विवाहित पुरुष, एक समय में केवल एक ही पत्नी रख सकता है। एक विवाहित स्त्री पर भी यही बात लागू होती है।

विवाहित होते हुए दूसरी शादी करना भारतीय दण्ड संहिता (आईपीसी) की धारा 494 और हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 17 के तहत अपराध माना गया है। जिसमें सात साल तक के कड़े कारावास की सजा दिये जाने की व्यवस्था है। इन दोनों कानूनों के विद्यमान होने के बावजूद भी सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि पहली पत्नी की अनुमति से दूसरी पत्नी को मृतक पति के स्थान पर अनुकम्पा नियुक्ति दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय समाज और कानून को ऐसे रास्ते पर ले जाता हुआ प्रतीत हो रहा है, जिसका अन्त न जाने कितने भयावह परिणामों को जन्म दे सकता है! कल को सुप्रीम कोर्ट यह भी कह सकता है कि यदि पहली पत्नी को किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है, तो कोई पुरुष दूसरी पत्नी रख सकता है। बल्कि देखा जाये तो यही निर्णय दूसरी पत्नी को मान्यता प्रदान कर चुका है। केवल अन्तर इतना सा है कि दूसरी पत्नी को सुप्रीम कोर्ट ने जो मान्यता प्रदान की है, वह पति के मरने के बाद प्रदान की है। यद्यपि मुद्दा यह नहीं है, मान्यता कब प्रदान की है, बल्कि मुद्दा यह है कि पहली विवाहिता पत्नी के होते हुए, जब एक पुरुष को दूसरी पत्नी रखने का कानून में प्रावधान है ही नहीं तो फिर, दूसरी पत्नी को किसी भी सूरत में मृतक पति की वारिस कहलाने का कानून द्वारा अधिकार कैसे प्रदान किया जा सकता है? परन्तु, चूंकि सुप्रीम कोर्ट तो सुप्रीम कोर्ट है! आदेश दे दिया तो दे दिया, कोई क्या कर सकता है? अब दूसरी पत्नियों को सरकारी सेवा में रहे मृतक पतियों के स्थान पर नौकरी पाने के लिये केवल, पहली पत्नी की अनुमति लेनी होगी और मिल जायेगी, अनुकम्पा के आधार पर सरकारी नौकरी। इस निर्णय के प्रकाश में मृतक के स्थान पर अनुकम्पा नियुक्ति दिये जाने के नियम पर भी विचार करने की आवश्यकता है।

मैं जितना समझता हँू, किसी लोकसेवक की असामयिक मृत्यु हो जाने पर, उसके परिवार को सहारा देने के लिये सहानुभूति के आधार पर, मृतक के कानूनी वारिसों को अनुकम्पा नियुक्ति दी जाती है। सम्भवतः यह प्रावधान पूरी तरह से मानवीय आधार कोदृष्टिगत रखते हुए बनाया गया है। जिस सरकारी विभाग में एक व्यक्ति अपना पूरा जीवन सेवा करता है, उस विभाग की भी उस व्यक्ति के परिवार के प्रति कुछ मानवीय जिम्मेदारी होनी चाहिये, यह मानकर इस जिम्मेदारी को अनुकम्पा नियुक्ति प्रदान करके पूरी करने का प्रयास किया जाता रहा है। लेकिन इसके लिये केवल कानूनी वारिसों को ही परिवार के सदस्य माना जाता है, जिनमें मृतक की पत्नी, पुत्र, पुत्री, पोत्र, विशेष परिस्थितियों में पति भी अनुकम्पा नियुक्ति के हकदार हो सकते हैं। इस माले में तो सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी महिला को अनुकम्पा नियुक्ति प्रदान करने का आदेश दिया है, जो मृतक के जिन्दा रहने तक, मृतक के परिवार की कानूनी सदस्य भी नहीं थी। ऐसे में मृतक के परिवार को सम्बल प्रदान करने के लिये ऐसी पत्नी को अनुकम्पा के आधार पर नौकरी प्रदान करने से मृतक के परिवार को क्या हासिल होगा, यह भी विचारणीय विषय है? एक ऐसी महिला को, किसी ऐसे मृतक पुरुष की मृत्यु के बाद, जो उसका वैध पति नहीं था, को उस मृतक की पत्नी का दर्जा देना, जिसने एक वैध विवाहिता पत्नी के अधिकारों पर बलात अतिक्रमण किया हो कहाँ का न्याय है? समझ से परे है? इस निर्णय में सुप्रीम कार्ट के न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू और न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा की पीठ ने कर्नाटक सरकार की एक अपील को खारिज करते हुए कहा कि जब दोनों पत्नी राजी हो गई हैं तो आप आपत्ति करने वाले कौन होते हैं। यदि एक पत्नी अनुकंपा नियुक्ति चाहती है और दूसरी मुआवजे संबंधी लाभ चाहती है तो आपको क्या परेशानी है? यहाँ पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इसी तर्ज पर कल को यह भी कहा जा सकता है कि जब दो औरतें एक पुरुष से विवाह करने को राजी हैं, तो सरकार होती कौन है, आपत्ति करने वाली? यद्यपि व्यवहार में पहले से भी यही होता आ रहा है।

पुरुष की आदिकाल से एकाधिक स्त्रियों का भोग करने की प्रवृत्ति रही है, जो हमारे देश के कानूनों में भी स्पष्ट रूप से झलकती है। हिन्दू विवाह अधिनियम में साफ लिखा गया है कि यदि एक विवाहित पुरुष द्वारा पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह किया जाता है तो यह कानूनी तौर पर अपराध तो है, लेकिन इस अपराध के खिलाफ पुलिस या सरकार या कोर्ट को स्वयं संज्ञान लेने का कोई अधिकार नहीं है। दूसरा विवाह करने वाला पुरुष तब ही कानून के शिकंजे में आ सकता है, जबकि उसकी पहली विवाहिता पत्नी, उसके (अपने पति के) खिलाफ कानून के समक्ष लिखित में शिकायत लेकर जाये! अन्य कोई शिकायत नहीं कर सकता है और यदि कोई शिकायत करता भी है तो ऐसी शिकायत पर, ऐसे पुरुष के विरुद्ध कानून को हस्तक्षेप करने का कोई हक नहीं है। यही वजह है कि प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र की पहली पत्नी के रहते, धर्मेन्द्र हेमा मालिनी से दूसरा विवाह रचाकर भी न मात्र एक सम्मानित नागरिक का जीवन जी रहे हैं, बल्कि सरेआम कानून को धता बताकर गैर-कानूनी विवाह रचाने के अपराधी होते हुए दोनों ही संसद के सदस्य भी रह चुके हैं। यह सब इसलिये हो सका, क्योंकि धर्मेन्द्र की पहली पत्नी ने कानून के समक्ष इसकी कोई शिकायत नहीं की। और भी अनेक ऐसे ही मामले अनेक सुप्रसिद्ध लोगों के हैं।जिनमें पूर्व मन्त्री राम विलास पासवान, श्रीमती जसकौर मीणा आदि अनेक लोग शामिल हैं। ये तो वे मामले हैं, जिनमें धनवान लोगों या प्रसिद्ध लोगों द्वारा धन के बल पर या अपनी छवि को नुकसान नहीं हो, इस बात की दुहाई देकर या अपने बच्चों के भविष्य की दुहाई देकर, अपनी पहली पत्नी का मुःह बन्द कर दिया जाता है, लेकिन भारत जैसे देश में औरतों की जो दशा है, उसमें ९५ प्रतिशत से अधिक औरतें तो इस हालत में होती ही नहीं कि वे कानून के समक्ष खड़ी होकर, अपने पति के विरुद्ध मुकदमा दायर कर सकें। जिसके पीछे एक ओर तो जहाँ आर्थिक कारण होते हैं, वहीं दूसरी ओर अनेक सामाजिक एवं धार्मिक कारण भी होते हैं। जिनके चलते एक-एक पाई को मोहताज रहने वाली और पति को परमेश्वर मानने वाली पत्नी, कानून के समक्ष गुहार करके अपने पति को कारावास में डलवाने के लिये कदम उठाने से पूर्व १० बार नहीं, १०० बार सोचती है। पुरुष ने स्त्री की इसी कमजोरी का लाभ उठाकर ऐसा कानून बनाया, जिसमें दूसरे विवाह को कानूनी तौर पर अवैधानिक घोषित करके भी दूसरी पत्नी रखने का प्रावधान कर लिया। अन्यथा पुरुषों को, केवल पुरुष मानकर नहीं, बल्कि एक पुत्री के पिता, एक बहिन के भाई बनकर सोचना चाहिये कि जहाँ पूर्व पति या पूर्व पत्नी के रहते दूसरा विवाह करना कानूनी तौर पर निषिद्ध है और वहाँ इस कानून को तोड़नकर दूसरा विवाह रचाने वाले अपराधी को सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिये? ऐसे अपराधी को सजा देने के लिये कानून में किसी भी प्रकार के किन्तु, परन्तु को जगह क्यों दी गयी है?

यदि हम अपराधमुक्त समाज की स्थापना करना चाहते हैं तो हम सबका यह कर्त्तव्य है कि अपराधियों को हर हाल में सजा मिलनी ही चाहिये, उन्हें तो हर हाल में जेल में होना ही चाहिये। आखिर अपराधी को क्यों कर खुलेआम समाज में घूमने और सम्मानित जीवन जीने का हक होना चाहिये? परन्तु दुर्भाग्य है, इस देश का और इस देश की स्त्रियों का कि आज २१वीं सदी में भी कानून उसी प्रकार से काम कर रहा है, जैसे कि १७वीं और १८वीं शताब्दी में करता था। यदि हालात ऐसे ही रहे तो आज नहीं तो कल ऐसा कानून बन ही जाना है, जब पहली पत्नी के रहते, पहली पत्नी की सहमति से कोई भी पुरुष कानूनी रूप से दूसरी शादी कर लेगा। मामनीय सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय मुझे तो यही मार्ग दिखाता प्रतीत हो रहा है। फिर एक दिन ऐसा आयेगा कि हम, हमारा कानून और हमारी न्यायपालिका कहेंगे

-"दोनों बीवी राजी, क्या करेगा काजी (कानून)?" -लेखक होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 में राष्ट्रीय स्तर पर पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। दिनांक : 26.11.2009 तक, बास के 3905 रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के 17 राज्यों में सेवारत हैं।

 
Posted by: dr.aok dayaram,bolia-garoth,mp On: December 03, 2009
इस ब्लॉग के विद्वान लेखक श्री मीना ने कानूनी प्रावधान के तहत एक स्त्री के जीवित रहते दूसरी पत्नी रखना हिन्दू विवाह नियम का उल्लंघन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर अपने बेबाक विचार व्यक्त किये हैं| समाज पर आदिकाल से पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है| बदलते युग की हवा का साथ देने की छद्म इच्छा के अनुकूल मर्दों ने स्त्रियों के हक़ में ऐसे कानून बनाने का स्वांग रचा है जिनका लाभ लेने में ९९ प्रतिशित स्त्रियां असमर्थ और असहाय सी हैं| मेरी तो मान्यता है कि देश के विवाह संबंधी कानूनों में साम्य होना चाहिए| इस्लाम के अनुयाई ४ स्त्रियों का भोग कर सकेंगे और हिन्दू दूसरी पत्नी रखने पर कठोर कारावास की सजा पायेगा , ऐसा क़ानून कूड़ेदान के हवाले करने योग्य है ,लेकिन आजादी के 62 साल बीतने पर भी यह अंधा क़ानून बदस्तूर जारी है|

Refine By Category
 
 
Home About us Sitemap Contact
Privacy Policy Terms & Conditions Disclaimer